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समांतर संसार : बेटियां गम का सबब तो नहीं

सय्यद मुबीन ज़ेहरा  दक्षिण दिल्ली में इस सप्ताह हुई एक घटना ने दिल दहला दिया। एक मां ने अपनी तीन बेटियों की हत्या करने के बाद खुद को मारने की कोशिश की। कहा जा रहा है कि वह लगातार चौथी बेटी पैदा होने के बाद से बहुत मानसिक तनाव में थी। अब स्थिति यह है […]
Author March 15, 2015 08:08 am

सय्यद मुबीन ज़ेहरा 

दक्षिण दिल्ली में इस सप्ताह हुई एक घटना ने दिल दहला दिया। एक मां ने अपनी तीन बेटियों की हत्या करने के बाद खुद को मारने की कोशिश की। कहा जा रहा है कि वह लगातार चौथी बेटी पैदा होने के बाद से बहुत मानसिक तनाव में थी। अब स्थिति यह है कि छह लोगों का परिवार बर्बाद हो चुका है। मारी गई बच्चियों की आयु सात वर्ष, तीन वर्ष और आठ महीने थी। एक बेटी, जो स्कूल गई हुई थी, उसकी आयु दस वर्ष है। अब उसे भी मां का सहारा नहीं मिल पाएगा, क्योंकि मां बेटियों की हत्या के आरोप में पुलिस की हिरासत में है।

आखिर ऐसा क्या हो गया कि एक मां का अपनी मासूम बच्चियों को कथित रूप से मौत के घाट उतारते हुए दिल नहीं कांपा। इसका उत्तर हमें अपने समाज के उस संकीर्ण सोच में ढूंढ़ना होगा, जो बेटियों के जन्म को इस प्रकार लेता है कि जैसे घर में कोई मौत हो गई हो। जहां बेटी के जन्म पर खेद जताना और सांत्वना देना रिवाज बना दिया गया हो, सोच कर देखिए कि उस समाज में इस महिला के लगातार चार बेटियों को जन्म देने को किस प्रकार लिया गया होगा। अगर कोई बहुत पत्थर-दिल नहीं रहा होगा तब भी इस मां से मिलते समय जिस प्रकार के शब्द बोल रहा होगा उसमें भी कहीं न कहीं इन बेटियों को लेकर चिंता ही जताई जाती रही होगी।

कहा जा रहा है कि अपनी बच्चियों को मारने की आरोपी यह महिला अपनी चौथी बच्ची के जन्म के बाद से ही बहुत अधिक मानसिक तनाव का शिकार हो गई थी। संभव है कि वह चौथी गर्भावस्था के दौरान भी मानसिक दबाव में रही हो। उठते-बैठते मुहल्ले वाले या मिलने-जुलने वाले सगे-संबंधी और खुद उसका पति भी लड़के की इच्छा व्यक्त करता रहा होगा। उससे कहा जाता रहा होगा कि अब तो लड़का ही पैदा करना। वह जिस वातावरण में रहती थी वहां अधिक मनोवैज्ञानिक समझ का होना संभव नहीं लगता।

अब तो पढ़े-लिखे धनी लोगों तक में लड़कियों के जन्म को लेकर जो सोच मिलता है वह सराहनीय नहीं है। जरूरी नहीं कि समाज में पिछड़ गए वर्ग में ही ऐसी मानसिकता हो। खुद को सभ्य कहने वाले पढ़े-लिखे समाज में भी इस तरह की नासमझी दिखती है। लड़की पैदा होते ही लोग जिस प्रकार की सूरत बनाते हैं वह किसी से क्या छिपी है। हालांकि इसमें अब बदलाव आने लगा है, पर अभी इसे बदलने के लिए क्रांतिकारी प्रयास की आवश्यकता है। यह तब तक संभव नहीं है जब तक कि हमारा समाज महिलाओं को लेकर अपने सोच नहीं बदलता।

अभी निर्भया कांड पर बने वृत्तचित्र में उस अपराधी की बात हमने सुनी। विडंबना यह है कि कई बार वैसे भी कुछ लोग ऐसी बात कहते हैं जो सम्मानित समझे जाते हैं। जब तक यह अवांछित मानसिकता रहेगी, समाज में लड़कियों को बोझ समझने की रिवायत समाप्त नहीं हो सकती। लेकिन समाज बदल भी रहा है। जहां एक ओर लोग बेटी का जन्म दुर्भाग्य समझ रहे हैं वहीं कई माता-पिता बेटियों के जन्म पर जश्न भी मनाते हैं। उनकी शिक्षा और प्रशिक्षण पर पूरा ध्यान लगाते हैं। इसलिए जब कन्या भ्रूण-हत्या या बेटियों को इस तरह मार देने की खबर पढ़ती हूं तो मैं अपने माता-पिता और खासकर अपनी दिवंगत मां का शुक्रिया अदा करती हूं, जिन्होंने हम बहनों को दुनिया में आने से नहीं रोका। दुनिया में लाने के बाद हमें शिक्षा और संस्कार दिए। हम सब बेटियों को अपने माता-पिता को धन्यवाद देना चाहिए कि एक ऐसे समाज में, जहां बेटियों को बोझ समझने की परंपरा-सी हो, वहां उन्होंने हमारा पालन-पोषण इस प्रकार किया कि हम समाज को आगे ले जाने में योगदान दे पा रही हैं।

कुछ लोग बिना सोचे-विचारे कह बैठते हैं कि महिलाएं ही महिलाओं की जान की दुश्मन हैं। मां के पेट में बच्ची का दम घोंटे जाने की असल वजहों में वे नहीं जाते। चाहे मां किसी दबाव में ऐसा करती हो, मगर एक बच्ची को दुनिया में आने से रोकने में अगर मां ही अपराध में भागी हो तब समाज किस दिशा में जा रहा है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कई घटनाओं में तो पाया जाता है कि घर की कोई महिला ही आगे बढ़ कर पेट में पल रही जान को मार देने को उकसाती है, क्योंकि वह बेटी है। अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो या न आना इस देश लाडो जैसी उक्तियां ऐसे ही सोच के दंश को दर्शाती हैं। दहेज न लाने के लिए एक महिला ही दूसरी महिला को सबसे अधिक ताने मारती है।

महिलाओं की स्थिति के लिए पुरुषों को दोष देने से पहले हमें अपने समाज की, अपने घर की उन महिलाओं के बारे में भी सोचना होगा, जो खामोशी से कुछ ऐसा माहौल बना कर रखती हैं जिससे लड़कियों को निर्बल दर्शाने में समाज को सफलता मिलती है। रूढ़िवादी मानसिकता का पीछा करते हुए हम वह सब भूल जाते हैं, जो शक्ति महिलाओं को कुदरत देती है। यही कारण है कि हमारे समाज में महिलाओं को लेकर जिस प्रकार के चुटकुले हैं या उन्हें कमतर रूप में चित्रित करने की जो प्रवृत्ति है उस पर रोक लगा पाने में हम सफल नहीं हो पाते। सबसे पहले महिलाओं को ही महिला की शक्ति बनना होगा।

दिल्ली की इस दिल दहला देने वाली घटना के पीछे कहीं न कहीं लड़के-लड़कियों में जो भेदभाव बरता जाता है वह भी निश्चित रूप से रहा होगा। पड़ोसियों के अनुसार चौथी बच्ची के जन्म के बाद से ही इस मां के व्यवहार में अंतर महसूस किया जाने लगा था। वह चार लड़कियों को जन्म देने और कोई बेटा न होने के कारण मिलने वाले तानों को लेकर परेशान रहती थी। लगता है कि समाज से उसे वह समर्थन नहीं मिला, जिसमें कोई उसे समझा पाता कि बेटा-बेटी में कोई अंतर नहीं है। अब तो बेटियां पढ़-लिख कर हर वे काम कर रही हैं, जो कभी पुरुषों का क्षेत्र माने जाते थे। सवाल है कि क्या इस हत्या की आरोपी केवल वह मां है? या फिर इस घटना के लिए समाज को ही दोषी करार दिया जाए? यही हमारे लिए चिंता का क्षण है, क्योंकि इस घटना को लेकर अंगुली हम सबकी ओर भी उठ रही है। हम इसी समाज का हिस्सा हैं, जो गर्भ में बच्चियों को मारने में शर्म महसूस नहीं करता। इस समाज के लिए लड़कियां बोझ हैं, जबकि सच तो यह है कि लड़कियों के लिए अब यह समाज ही बोझ बनता जा रहा है।

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