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अभिमत : आलोचना का विवेक

मणींद्र नाथ ठाकुर गांधी की मूर्ति लंदन में लगी। भारतीयों में बेहद उत्साह था। हम इस खुशी में अभी झूम ही रहे थे कि एक न्यायविद ने घोषणा कर दी कि ये तथाकथित जननायक दरअसल हमारे आकाओं के दलाल थे, जिन्होंने उनके ‘बांटो और राज करो’ के सिद्धांत को अमली जामा पहनाने का काम किया। […]
Author March 22, 2015 07:37 am

मणींद्र नाथ ठाकुर

गांधी की मूर्ति लंदन में लगी। भारतीयों में बेहद उत्साह था। हम इस खुशी में अभी झूम ही रहे थे कि एक न्यायविद ने घोषणा कर दी कि ये तथाकथित जननायक दरअसल हमारे आकाओं के दलाल थे, जिन्होंने उनके ‘बांटो और राज करो’ के सिद्धांत को अमली जामा पहनाने का काम किया।

शायद वकालत के पेशे वाले लोगों के लिए गांधी को समझना आसान नहीं है। क्या आपने कभी किसी गांधीवादी वकील को देखा है? वकील और गांधीवादी दोनों एक साथ चल ही नहीं सकते। इसके दो कारण हैं। पहला यह कि वकालत वकालतखाने में ज्ञान की तिजारत होती है, हर वह प्रपंच यहां होता है, जिससे दूसरे की जेब से पैसा उनकी जेब में पहुंच जाए। तिजारत में निरंतर रत रहने के कारण उनका स्वाभाव भी ऐसा ही हो जाता है। गांधी इस बात को बखूबी समझते थे। इसलिए ‘हिंद स्वराज’ में उन्होंने इस पेशे के बाजारूपन की आलोचना की है। भले मौलिक रूप से वकालत जनकल्याण की भावना से पूर्ण था, लेकिन अब उसमें क्या चल रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिए उनके लिए गांधी को समझ पाना थोड़ा मुश्किल है। उन्हें गांधी को समझने के लिए थोड़ा ज्यादा प्रयास करना होगा।

दूसरा कारण यह है कि सोच की जिस परिधि में न्यायविद घूमते हैं, गांधी उससे बाहर निकलने के प्रयास में लगे थे। न्यायमूर्ति काटजू से थोड़ी उम्मीद थी, क्योंकि इलाहाबाद में किसी ने बताया था कि वे भारतीय दर्शन के ज्ञान मीमांसा से कानून को समझने का प्रयास करते हैं। खोजा तो पता चला कि आक्सफर्ड के टैगोर लॉ व्याख्यानमाला को प्रकाशित कर उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि भारतीय न्यायालय को कानून के अर्थ-निष्पादन के लिए मीमांसा के सिद्धांतों का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन उनके कई निर्णयों को पढ़ने से पता चला कि इस विषय पर कुल मिला कर उनके पास तीन पन्ने हैं और हर निर्णय में वही पन्ने लगा दिए जाते हैं। एक तरह से यह भारतीय ज्ञान परंपरा को गंभीरता से लेने का परिचायक है।

इसके विपरीत गांधी ने इस परंपरा को गहराई से समझा, बल्कि अंगरेजी राज के दार्शनिक आधार पर ही इसके माध्यम से आघात किया। यह आघात केवल अंगरेजी राज पर नहीं, बल्कि आधुनिकता के आधार-स्तंभ पर भी था। ब्रिटिश समाज और तत्कालीन औपनिवेशिक राज्य के दर्शन का मूल तत्त्व था ‘आत्मकेंद्रित व्यक्तिवाद’, जिसके अनुसार अपने जीवन, शरीर, श्रमशक्ति, ज्ञान और इस सबसे उत्पन्न फल, हर कुछ पर हमारा व्यक्तिगत स्वामित्व है। और इसलिए हम एक व्यक्ति हैं, जिसका कोई सामाजिक दायित्व नहीं है।

गांधी ने भारतीय दर्शन और उसके मीमांसात्मक तत्त्वों की सहायता से यह स्थापित किया कि मनुष्य अपने समाज का ऋणी है और उसके जीवन का उद्देश्य इस ऋण को चुकाना है। इस विचार ने ब्रिटिश सरकार के दर्शन को ही खारिज कर दिया और ‘आत्मकेंद्रित व्यक्तिवाद’ की जगह ‘रचनात्मक व्यक्तिवाद’ को स्थापित किया। यह अलग बात है कि गांधी के आधुनिक कानूनवेत्ता सहयोगियों को यह बात या तो समझ में नहीं आई या फिर उन्होंने जानबूझ कर इस पर ध्यान नहीं दिया।

जाहिर है कि गांधी के लिए इस तरह के विचारों का स्रोत आधुनिक दार्शनिक तो हो नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने धर्म-चिंतन से संवाद स्थापित किया। गांधी ने धर्म-चिंतन से सार तत्त्वों को निकाल कर आधुनिक दर्शन के उस खाली जगह को भरा, जिसकी वजह से उसमें मानवीयता, दया, करुणा जैसे तत्त्व गायब हो गए थे। यह गांधी का जवाब था आधुनिकता के महान चिंतक देकार्त को, जिसने मनुष्य को मन और शरीर में बांट कर समझने की सलाह दी थी। गौरतलब है कि गांधी ने धर्म के चिंतन और ज्ञान को महत्त्व दिया, न कि उसके ठेकेदारों और मंदिरों या पूजा पद्धति को। यह एक तरह से धर्म के सामान्य स्वरूप को खारिज किया जाना था। इसलिए जो लोग धर्म को राष्ट्र का आधार मानना चाहते थे, गांधी से नाराज रहने लगे।

‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने घोषित कर दिया कि ‘दया धर्म को मूल है’ और इसलिए गांधी के लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब राज्य और धार्मिक समुदायों के बीच फर्क रखना नहीं, बल्कि सभी धर्मों से संवाद करना था, उन्हें उनके मूल पर वापस ले जाना था। धर्म को मानवता से जोड़ना था और राजनीति को मानवीय बनाना था। गांधी इस बात से आश्वस्त थे कि कानून बना कर सामाजिक परिवर्तन करने की सीमा है, परिवर्तन के लिए तो जनमानस को प्रभावित करने की आवश्यकता होगी। और जनमानस में धर्म की सत्ता है, बिना उससे संवाद किए परिवर्तन संभव नहीं है।

गांधी की इन बातों को जिन लोगों ने नहीं समझा उनके लिए गांधी द्वारा उपयोग किए जाने वाले शब्द, पुस्तकें, विचार जैसे ‘रामराज्य’, ‘गीता’, ‘प्रार्थना’ आदि ही महत्त्वपूर्ण हो गए। और उनके अनुसार, इन शब्दों को सुनते ही मुसलमान भड़क गए और गांधी ने धर्मनिरपेक्षता का जनाजा निकाल दिया। गांधी ने इन सबके बावजूद मुसलमानों और ईसाइयों को प्रभावित किया। क्योंकि उन्हें गांधी की नीयत पर शक नहीं था। आप तर्क से लोगों को पराजित तो कर सकते हैं, लेकिन उनका दिल नहीं जीत सकते। प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब ने गांधी पर लिखते हुए यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक भारत में शायद केवल गांधी ऐसे नेता थे, जो आम लोगों के दिल से संवाद करते थे और खासकर मुसलमानों से। और इसका कारण यह था कि गांधी की नीयत पर किसी को शक नहीं था। इसलिए यह मानना अनुचित नहीं होगा कि गांधी ने धर्म-चिंतन से संवाद कर उसके जनतांत्रिक स्वरूप के लिए पहल की, जिससे संप्रदायों के बीच संवाद की संभावनाएं खुलीं। उन्हें सांप्रदायिक मानना और बिटिश हुकूमत के दलाल के रूप में देखना उस व्यक्ति की नासमझी मात्र हो सकती है, जिसने गांधी के राजनीतिक चिंतन को नहीं समझा है।

गांधी की मूर्ति ब्रिटेन में लगाए जाने का मतलब ऐसे लोग यह निकालते हैं कि जरूर गांधी ने उनकी सेवा की होगी। यह समझ का फेर है, क्योंकि दुनिया में गांधी की बढ़ती लोकप्रियता को समझने में वे विफल हैं। सच तो यह है कि शायद आधुनिकता के दर्शन का अंतिम समय आ गया है। पश्चिम उस दर्शन से उत्पन्न समस्या से जूझ रहा है। इस व्यवस्था का मूल मंत्र है अविश्वास, जिसका सैद्धांतिक आधार इस बात पर है कि हर मनुष्य स्वार्थी है और इन स्वार्थों को जोड़ कर ही जनहित का तंत्र तैयार होता है। लेकन अब बहुत से दार्शनिक पश्चिम में भी सवाल उठाने लगे हैं कि क्या स्वार्थ को मूल स्वभाव मान कर हम कभी निस्स्वार्थ या जनहित तक पहुंच सकते हैं।

गांधी ने अविश्वास की जगह विश्वास की राजनीति को महत्त्व दिया। उन्होंने पश्चिम के मूल तर्क को ही खारिज कर दिया था। पश्चिम को अब गांधी के दर्शन का महत्त्व समझ में आने लगा है। सौ साल पहले ही गांधी ने ‘आत्मकेंद्रित’ व्यक्तिवाद की समस्या पर चिंतन किया था, इसलिए इस दर्शन की सीमाओं के नजर आने से लोगों को गांधी की याद आती है।

गांधी को समझने के लिए गांधी के संघर्ष को अपनाना होगा। कानून की पुस्तकों और धार्मिक ग्रंथों को पढ़ कर भविष्य के दर्शन को गढ़ने की क्षमता नहीं मिलती है। उसके लिए मनुष्य की मुक्ति के संघर्ष का व्रत लेना होता है। इस संघर्ष में राष्ट्रवाद एक पड़ाव मात्र होता है।
ऐसा नहीं कि गांधी की हर बात से सहमत हुआ जा सके। ऐसा भी नहीं कि गांधी को देवता बना दिया जाए। लेकिन इतना जरूर है कि उनकी आलोचना का एक स्तर होना चाहिए। अगर कोई उनकी आलोचना अंगरेजों के साथ उनके संबंधों को लेकर करता है, तो उनके किसी एक वक्तव्य से न कर उनके जीवन और दर्शन के गंभीर अध्ययन से करना चाहिए। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि इस आलोचना के पीछे उनकी नीयत भी स्पष्ट होनी चाहिए। अगर गांधी से आगे का मुक्तिकामी दर्शन बनाना उद्देश्य हो तो सिर आंखों पर। लेकिन अगर एक विघटनकारी दर्शन और राजनीति नीयत हो तो सचेत रहने की जरूरत है।

कुल मिला कर आग्रह केवल इतना है कि गांधी को एक प्रयोगधर्मी या क्रियामार्गी और मुक्तिकामी चिंतक के रूप में देखने का प्रयास करें तो शायद एक सार्थक बहस की शुरुआत हो सकती है, जिसकी दुनिया को जरूरत भी है। क्योंकि जिस वैकल्पिक दर्शन की गांधी ने शुरुआत भर की थी उसे आगे बढ़ाने के लिए उनकी आलोचना भी जरूरी है। उस दर्शन के निर्माण की अभी नींव ही पड़ी है।

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