December 08, 2016

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तेरे अंजाम पे रोना आया

उच्च शिक्षा के संस्थानों की गुणवत्ता जांचने के लिए भी एक संस्था सक्रिय हो चुकी है। पता नहीं वह इस दिशा में कैसे क्या करती है।

Author November 6, 2016 04:39 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

विजय बहादुर सिंह

करीब डेढ़ दशक पहले एक पत्रिका में सर्वेक्षण छपा था कि हमारे देश में विज्ञान संकायों में किए गए शोधों में से शायद ही कोई मौलिक और बौद्धिक योगदान करता हो। इनमें न तो शोधकर्ता की प्रतिभा की कोई चमक है, न ज्ञान दिशा। बल्कि सच यह है कि यह सारा कबाड़ जिज्ञासा और शोध प्रवृत्ति के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन कर अड़ा और खड़ा है। उसी सर्वेक्षणकर्ता ने यह भी लिखा कि अठहत्तर प्रतिशत शोध निर्देशक खुले मन से यह मानते हैं कि सब खानापूर्ति है।

मजा यह कि अन्य विद्या अनुशासनों में भी स्थिति इससे भिन्न नहीं है। कला और समाज विज्ञान के अनुशासनों में भी शोध कार्य जिस-तिस तरह एक ऐसी कागजी उपाधि अर्जित करना है, जिससे कोई नौकरी पाई जा सके या फिर मिली हुई नौकरियों में अतिरिक्त वेतन वृद्धि हासिल की जा सके। इसके लिए जो कुछ भी करना पड़े, चतुर और दुनियादार शोधार्थी प्रत्येक मोर्चे पर हाजिर मिलता है। यह बात अब किसी से छिपी नहीं रही कि शोध लिखने का एक अलग धंधा भी चल निकला है। हजारों से लेकर लाखों रुपए तक लेने-देने वाले बाजार में हैं। शोध निर्देशकों की फीस अलग। यहां तक कि परीक्षकों और मौखिकी लेने वालों की भी। यह एक अलग स्वायत्त संसार है, गैर-कानूनी पुराने स्मगलिंग बाजारों की तरह। एक अन्य निगाह से देखें तो चीजें बिल्कुल फेयर और तयशुदा हैं। कइयों को यह जान कर भी बड़ा आश्चर्य होगा कि बड़े-बड़े नाम कैसे शामिल हो गए इस दल में!

सत्तर के दशक में हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि नौकरी पाने से पहले या फिर शादी होने तक लड़के-लड़कियां जो करते हैं, उसे शोध कहते हैं। अब वह परिभाषा पुरानी पड़ चुकी। कोई और परिभाषा बनानी या ढूंढ़नी पड़ेगी। आजादी के आसपास समाज के जो जीवन-मूल्य थे वे बाजारू समय में भला क्यों टिकने लगे! तब ढेर सारे शोध किए गए ज्ञान के क्षेत्र में, जिनकी आज भी प्रतिष्ठा है। न केवल शोध छात्रों, बल्कि दिग्गज माने गए आचार्यों ने भी अपने इस पुरुषार्थ से विद्या के क्षेत्र को भरपूर समृद्धि दी। तब शोध करना और शोध-उपाधियां पा लेना उच्च शिक्षा के लिए कोई अनिवार्य अर्हता भी नहीं थी। शोध और मौलिक चिंतन दोनों ही विद्या क्षेत्र में समान रूप से प्रतिष्ठा प्राप्त थे। हमारी पीढ़ी से पहले वाली पीढ़ी में ये दोनों ही धाराएं एक साथ फूली-पनपीं।

तभी एक बहस यह भी खड़ी हुई कि शोध कर्म और समीक्षा कर्म में क्या संबंध है या फिर क्या फर्क है। क्या दोनों के ही बल पर शोधोपाधि दी जा सकती है। उत्तर होगा क्यों नहीं। शोध एक प्रकार से किसी अज्ञात तथ्य को प्रकाश में लाने का काम है, जबकि समीक्षा में कवि-लेखक या कृति विशेष पर नई या मौलिक दृष्टि का प्रतिपादन आवश्यक हो जाता है। जिसे आम पढ़े-लिखों के बीच ‘थीसिस’ या शोध प्रबंध कहा जाता है, वह दोनों में से किसी एक प्रकार का काम हो सकता है- यानी शोधपरक और समीक्षात्मक। एक आचार्य चिंतक के शब्दों में शोधपरक थीसिस में तटस्थ विवेचन के आधार पर कोई निर्णय या निष्कर्ष दिया जाता है, जबकि समीक्षापरक शोध में समीक्षक की प्रातिभ मौलिक दृष्टि नई साहित्यिक दृष्टि के विकास में योगदान करती है। पर समकालीन और अधिकतर पहले के कामों में भी वह गुणवत्ता प्राय: नहीं ही दिखाई देती।

हिंदी में कराए और किए जा रहे शोध-व्यापार के बारे में यह तो कहा ही जा सकता है कि- तेरे अंजाम पे रोना आया। इस व्यापार को धड़ल्ले से जारी रखने के लिए जितने विश्वविद्यालयीन विभाग जिम्मेदार हैं, उतने ही संबंधित तमाम संबद्ध विद्या आचार्य और प्रबंधक भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग हालांकि दिन-प्रतिदिन इस चर्चा को प्रामाणिक बनाने के लिए नई-नई व्यवस्थाएं करता जा रहा है, पर उसे यह देखने-जांचने की शायद ही फुर्सत है कि इस विद्या अनुशासन में ज्ञान की कितनी खिड़कियां खुलीं, कितनी नई और मौलिक दृष्टियों का विकास संभव हो सका। कहने को उच्च शिक्षा के संस्थानों की गुणवत्ता जांचने के लिए भी एक संस्था सक्रिय हो चुकी है। पता नहीं वह इस दिशा में कैसे क्या करती है। हां, अध्यापकों को जरूर देखा गया है कि वे अपनी जांच के लिए मोटी-मोटी और खूबसूरत, प्रदर्शनीय महंगी फाइलें बनाते हैं, भले ही जिन-तिन नकली शोध पत्रिकाओं में छपे उनके लेख शोध या समीक्षा के निर्धारित मानदंडों के अनुरूप हों या नहीं। ऐसे लेखों को छापने वाले शोध-पत्रों को कहां से मान्यता मिलती है, उनके संपादकों की योग्यता क्या है, इस पर भी ध्यान देने के लिए किसी के पास समय नहीं है।

कई बार राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में शिरकत करने के बाद यही अनुभव होता है कि सबसे शोचनीय स्थिति हिंदी प्रदेशों की है। इन संगोष्ठियों में जो विशेषज्ञ बुलाए जाते हैं, जरूरी नहीं कि वे सभी सचमुच उस विषय के विशेषज्ञ हों, उसके बारे में सब कुछ जानते ही हों। पर किसी न किसी लज्जाहीन साठगांठ के तहत यह व्यापार चलता रहता है। उन पर निगरानी कभी की ही नहीं जाती कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने जिस बात के लिए अनुदान दिया है, उसमें आमंत्रित विद्वानों का संबंधित क्षेत्र में क्या योगदान है? कितने शोध-पत्र सचमुच शोध-पत्र थे और उनकी निष्पत्तियां क्या रहीं। किस ‘संगोष्ठी’ से अज्ञात तथ्य या ज्ञान की कौन-सी नई दिशा खुली?

एक तकनीकी संस्थान की प्रबंध कार्यकारिणी समिति के सदस्यों से मैंने चिंता जाहिर की थी कि आज जब हमारा देश पानी के संकट से जूझ रहा है, क्या आप सब इसके समाधान के लिए कभी शोधार्थियों को सक्रिय करते हैं। यह सवाल उन लोगों के लिए असमय के राग जैसा था। दरअसल, पाठ्यक्रम की सीमा और कबाड़ी जाने वाली उपाधियों के संदर्भ में उन लोगों के लिए इस सवाल का कोई अर्थ नहीं था। इन सबका अर्थ तो केवल एक ठहरी हुई व्यवस्था में औपचारिक उपाधियां देकर विद्यार्थी को रोजी-रोटी के लिए घुसपैठ लायक बनाना है। समाज या देश की चिंता से जुड़ी कोई चिंता या सवाल से शिक्षा-व्यवस्था का जैसे कोई सरोकार ही न हो।

आज भारतीय समाज अनेक प्रश्नों और समस्याओं से जूझ रहा है। जिन दिशाओं की ओर हड़बड़ी में वह भागा चला जा रहा है, उसमें उसकी अपनी अस्मिता के प्रश्न भी हैं। ये जितने आर्थिक-राजनीतिक हैं, उतने ही धार्मिक-सांस्कृतिक भी। क्या हमारे विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा संस्थान इनमें से किसी एक भी सवाल को लेकर चिंतित और संवाद-व्यस्त हैं? हमारे शोध कर्म अगर अपने संकल्पों और प्रतिज्ञाओं में इन बातों को भी शामिल कर आगे बढ़ें तो क्या यह हमारे बौद्धिक पुरुषार्थ की राष्ट्रीयता न होगी?

 

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First Published on November 6, 2016 4:39 am

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