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साहित्य और क्षोभ

मध्यकाल में क्षोभ के सबसे बड़े कवि कबीर हैं। अलंकारशास्त्री इसे बेशक न समझते हों, कबीर की रचनाओं को कंठहार बनाने वाली जनता इसे बखूबी जानती है।
Author April 23, 2017 05:37 am
प्रतीकात्मक चित्र।

बजरंग बिहारी तिवारी

क्षोभ सृजन के मूल में है। साहित्य सृजन के विविध रूपों में से एक है। साहित्य को सराहने, समझने की पारंपरिक औपचारिक विधि अलंकारशास्त्र है। ‘अलम्’ से उपजा है अलंकार। अलम् पर्याप्तता है। अपर्याप्तता का बोध सृजन की ओर ले जाता है। गहराता हुआ यह बोध ही क्षोभ का कारण है। अलंकार इस क्षोभ को चटक बना सकता है, निखार सकता है। वही इसे शमित कर सकता है, ढंक सकता है, उसे विवर्ण कर बदरंग भी कर सकता है। क्षोभ को साहित्य का अनिवार्य स्रोत मानना दिक्कततलब हो सकता है। क्षोभ के बगैर साहित्य रचा जा सकता है। शब्द-जगत में कौशल-विकास की संभावना होती ही है। शृंगार वर्णन और प्रशस्ति गान- इन दो क्षेत्रों में शब्द-कौशल से काम चलाया जा सकता है। तब स्थूल रूप में साहित्य-सृजन की दो धाराएं दिखाई देती हैं। एक क्षोभ सहित, दूसरी क्षोभ रहित। आचार्य भिखारीदास इन्हीं दो धाराओं को उनके प्रतिनिधि कवियों का नाम लेकर इस तरह चिह्नित करते हैं- तुलसी गंग दुवौ भये सुकविन के सरदार। जनता के चित्त और समय की गति की अंतर्क्रिया से इनकी सार्थकता का मसला तय होता है। बादशाह अकबर के दरबारी कवि गंग की धाक अपने जमाने में इतनी थी कि बाकी कवियों का नाम उनके बाद लिया जाता था। उत्तर मुगलकाल तक आते-आते वे पीछे पड़ने लगे। बाद में उनका क्या हश्र हुआ, यह बताने की जरूरत नहीं है।

गंग के उदाहरण से यह समझ लेना गलती होगी कि दरबार से जुड़े होने का आशय प्रशस्तिकार होना है। रहीम तो नौ रत्नों में थे, मगर उनकी छवि राज-स्तवन करने वाले कवि की नहीं है। मगर इतना ध्यान रखना चाहिए कि रहीम क्षोभ के कवि भी नहीं हैं। मध्यकाल में क्षोभ के सबसे बड़े कवि कबीर हैं। अलंकारशास्त्री इसे बेशक न समझते हों, कबीर की रचनाओं को कंठहार बनाने वाली जनता इसे बखूबी जानती है। क्षोभ का परिष्कार और उसका सर्जनात्मक उपयोग करने में संत रविदास का कोई सानी नहीं है। क्योंकि उनकी रचनाओं में क्षोभ उछलता नहीं है, इसलिए एकबारगी निगाह की पकड़ में नहीं आता। रविदास का क्षोभ कई स्रोतों से मिल कर बना है। पराधीनता की पीड़ा इनमें सर्वप्रमुख स्रोत है। भूख और राजसत्ता के अंतर्संबंध पर भी उनकी दृष्टि गई है। रविदास के क्षोभ की मुश्किल यह है कि उसका रूखापन चमकता नहीं। कवि उसे प्रेम की अंत:सलिला में भिगो कर ही जाहिर करता है।
कबीर के यहां क्षोभ और प्रेम की धाराएं बहुत दूर जाकर मिलती हैं। यही बात मीराबाई के यहां भी दिखाई पड़ती है। उनके यहां क्षोभ और प्रेम का सहभाव है, मगर उसकी पृथकता को मूंदने की कोशिश नहीं की गई है। दोनों अपनी इयत्ता बनाए रखते हुए ही साथ-साथ हैं। सूर ने क्षोभ का महत्त्व समझा है, मगर उसे ज्यादा जगह देने से बचे हैं। पुरुषसत्ता, राजसत्ता और देवसत्ता या धर्मसत्ता सूर की कविता में क्षोभ के स्रोत हैं। सूफी कवि ‘कंफ्लिक्ट जोन’ में जाने से हर मुमकिन बचे हैं। वे न तो राजसत्ता के अन्याय से क्षुब्ध होते हैं, न जातिभेद से, न धर्मतंत्र से और न ही पुरुषसत्ता से। जब दूसरी तरह के प्रेमाख्यान (आधुनिक काल के मनोरंजन प्रधान उपन्यास) उपलब्ध होने लगे तो जनता ने सूफी कविता से कन्नी काट ली।
प्रखरता में कबीर के बाद तुलसीदास क्षोभ के दूसरे बड़े कवि हैं। क्षोभ के जितने स्रोत उनके यहां हैं उतने शायद ही किसी और समकालीन या परवर्ती कवि के यहां होंगे। सौंदर्य क्षोभ का बड़ा कारण है, इसकी तरफ सबसे पहले उन्होंने ही ध्यान दिलाया। शिव को समाधि से उठाने के लिए सौंदर्य का सहारा लिया जाता है- ‘पठवहु काम जाइ सिव पाहीं/ करइ छोभ संकर मन माहीं।’ राम जनक वाटिका में सीता के असामान्य सौंदर्य को देख कर क्षुब्ध होते हैं- ‘जासु बिलोकि अलौकिक सोभा/ सहज पुनीत मोर मन छोभा।।’ क्षोभ सीता को भी होता है- ‘नख सिख देखि राम कै सोभा/ सुमिरि पिता पन मन अति छोभा।’ राम और सीता का क्षोभ एक-जैसा नहीं। राम अपनी भीतरी उथल-पुथल को संभाल न पाने के कारण क्षुब्ध हैं, तो सीता पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण।

व्यवस्थाजन्य क्षोभ बड़ा होता है, अधिक मूल्यवान होता है। शायद इसे समझ कर ही तुलसी एक स्त्री के रूप में सीता की कामना को विस्तार से प्रस्तुत करते हैं। सीता की दृष्टि में आदर्श स्त्री वह है, जो अपनी इच्छा से कहीं भी आ-जा सकती है। पार्वती ऐसी ही स्त्री हैं- ‘बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारनि।’ विश्व सुंदरियां आज भी चुनी जाती हैं, मगर वे अपनी मर्जी से क्या कहीं घूम सकती हैं? जिस दिन उन्हें विश्वसुंदरी का ताज पहनाया जाता है उसी दिन प्रायोजक कंपनियों के तमाम अनुबंध पत्रों पर राजीनामे के दस्तखत करने होते हैं! यह बंधनकारी सुंदरता है। बंधन मध्यकाल में कम नहीं थे। आज पितृसत्ता को चुनौती देने वाली स्त्रियों के पक्ष में संगठन आ जाते हैं तब इसकी कल्पना भी कठिन रही होगी। पुरुष मनभावन सौंदर्य को देख सकता है, मगर स्त्री को इसकी मोहलत नहीं। क्षोभ का यह सबसे विकट स्रोत है। अनायास नहीं है कि थोड़े से अंतराल के बाद तुलसी सीता के क्षोभ को फिर से प्रकट करते हैं- ‘नीके निरखि नयन भरि सोभा/ पितु पन सुमिरि बहुरि मन छोभा।’ स्त्री की परतंत्रता पर बल देने के कारण तुलसी ने एकाधिक बार यह बात दोहराई- ‘कत बिधि सृजी नारि जग माहीं/ पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।’ सुख स्वाधीनता में है। स्त्री यहां-वहां-सर्वत्र पराधीन है। उसे सुख कैसे मिले? तुलसी राह सुझाते हैं। स्त्री को मनमीत के साथ स्वतंत्रतापूर्वक रहने की व्यवस्था बने- ‘नाह नेह नित बढ़त बिलोकी/ हर्षित रहति दिवस जिमि कोकी।’ स्त्री पराधीनता का उक्त संदर्भ एक बार पार्वती विवाह के संदर्भ में आया है तो दूसरी बार सीता विवाह के संदर्भ में।

क्षोभ के दूसरे हेतुओं में तुलसी राजसत्ता, धर्मसत्ता को रखते हैं। सरस्वती के जरिए वे देवसत्ता (जहां शेष दोनों सत्ताएं अंतर्भुक्त हैं) की असलियत उजागर करते हैं। यह ऐसी सत्ता है जो छल पर टिकी हुई है- ‘पालु बिबुध कुल करि छल छाया।’ सरस्वती जब देवसत्ता की रक्षा में नहीं उतरतीं तो देवता स्वयं अपने छलतंत्र की रक्षा यों करते हैं- ‘सुर स्वार्थी मलीन मन, कीन्ह कुमंत्र कुठाटु/ रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।’ इन चार तरीकों से देवसत्ता की रक्षा होती है- भय फैला कर, भ्रम रच कर, लोगों को प्रेम करने से रोक कर और चित्त बिगाड़ कर।दरबार से जुड़ने के बावजूद जनता से नाभिनालबद्ध रीतिकालीन कवियों ने क्षोभ भरी कविताओं की परंपरा बनाए रखी, भले ही वह मुख्यतया सौंदर्य के प्रसंग में हो। मतिराम की काव्य-जगत की स्त्री कहती है कि इस गांव में जीना दुश्वार है, जहां देखने पर पहरा है, स्वस्थ भाव से निहारने पर तुरंत कलंकित कर दिया जाता है- ‘क्यों इन आंखिन सों निहसंक ह्लै, मोहन के तन पानिप पीजै/ नैकु निहारे कलंक लगे, यहि गांव बसे कहो कैसे को जीजै।’ देव की कविता में हिम्मती स्त्री है, जो अपने क्षोभ को जाति पंचायत के पंचों को ललकारने में लगाती है। उसने जाति से बाहर जाकर प्रेम किया है। पंचायत उसे सजा कैसे दे सकती है, जबकि वह अपने को उस तंत्र के बाहर रखती है। बिहारी के यहां स्त्री दमघोंटू माहौल में मुश्किल से सांस ले पा रही है- ‘पावक झरि सी झमकि कै, गई झरोखा झांकि।’ आग की तरह झरते हुए आना क्षोभ का ज्वालामुखी की तरह फूटना है। बिहारी कहते हैं कि जब प्रजा असह्य दुख में धकेल दी जाती है तो गृहयुद्ध की स्थिति बनती है- ‘दुसह दुराज प्रजान को क्यों न बढ़े दुख दंद।’

 

 

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