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बारादरी: शरद यादव बोले- विपक्ष में बिखराव कोई नई बात नहीं

सत्ता पक्ष इस बात को भुनाने की कोशिश कर रहा है कि विपक्ष है ही नहीं, जबकि हकीकत यह है कि विपक्ष हमेशा बिखरा हुआ रहा है
पूर्व जयदू नेता शरद यादव।

बिहार में नीतीश कुमार ने महागठबंधन से नाता तोड़ कर भाजपा से हाथ मिला सरकार बनाई। नीतीश कुमार के इस फैसले का विरोध करने वालों में सबसे आगे रहे शरद यादव। नतीजतन उन्हें और उनका साथ दे रहे लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मगर शरद यादव ने अपनी लीक नहीं छोड़ी। वे सांप्रदायिकता के विरोध में लगातार मुखर रहे हैं। अब साझी विरासत मुहिम के जरिए बिखरे विपक्ष को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इस बार की बारादरी में उन्होंने कहा कि सत्ता पक्ष इस बात को भुनाने की कोशिश कर रहा है कि विपक्ष है ही नहीं, जबकि हकीकत यह है कि विपक्ष हमेशा बिखरा हुआ रहा है। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

 

अजय पांडेय : कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष का कोई ताकतवर चेहरा नहीं है। आपने विपक्ष को एकत्र करने की जो मुहिम शुरू की है, उसमें आप विपक्ष का मजबूत चेहरा बन सकते हैं?
शरद यादव : जब हम कांग्रेस के विरोध में हुआ करते थे, तब भी विपक्ष में कोई एंटी कांग्रेस चेहरा नहीं हुआ करता था। 1977 में मैंने बहुत पास से देखा था कि उस वक्त भी भीतर काफी तनाव था। मगर हम जीत गए। यहां तक कि प्रधानमंत्री कौन हो, इसे लेकर कई दिनों तक मंथन चलता रहा था। तब कांग्रेस एक तरह से खत्म ही हो गई थी। वह दौर भी मैंने देखा है। तब एक से एक बड़े नेता हुआ करते थे, स्वतंत्रता संग्राम से निकले हुए कई नेता थे। पर तब भी विपक्ष का कोई एक चेहरा नहीं था।

मनोज मिश्र: क्या अब कांग्रेस बदल गई है या उसकी सोच बदल गई है?
’मैं मानता हूं कि बाजार के बाद सबकी सोच बदली है। आज कोई ऐसी पार्टी नहीं है, जो जमीन में गहराई के साथ जड़ें जमा कर बैठी है। जो भी लोग बात कर रहे हैं, वह बातचीत भर है। जब हम लोग कांग्रेस का विरोध किया करते थे, तब वह पहाड़ थी, अब उसकी हालत ऊंट की-सी हो गई है। उसकी जगह पहाड़ बन कर खड़ी हो गई है भाजपा। इस तरह स्थितियां बदल गई हैं। पर कांग्रेस की उपस्थिति संपूर्ण भारत में है। अब विपक्ष में एकता लानी है, तो किसी को छोड़ कर नहीं लाई जा सकती। जब संविद सरकार थी, उसमें तो वामपंथ भी साथ था। हमारे देश की जैसी परिस्थिति है उसमें कोई सीधी चाल नहीं हो सकती।
मृणाल वल्लरी : आज जिस तरह सीबीआइ के जरिए विपक्ष को नियंत्रित कर भ्रष्टाचार को बहस की धुरी बनाई गई है, उसमें आने वाले समय में विपक्ष के सामने क्या मुद्दा रहने वाला है?
’मुद्दे बदलते रहते हैं। कभी कोई मुद्दा रहता है, कभी कोई मुद्दा रहता है। जैसे भ्रष्टाचार दो बार मुद्दा रह चुका है। इंदिराजी के जमाने में भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं था। 1989 में पहली बार भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा बना। आज हिंदुस्तान के सामने अर्थव्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है। आज आप किसान के पास जाएंगे तो देखेंगे कि वह तबाह है। भारतीय जनता पार्टी का जो सबसे बड़ा जनाधार व्यापारी वर्ग- दुकानदार- था, वह अब विरोध में हो गया है। अब वह पछता रहा है कि मैंने गलत वोट डाला।

मुकेश भारद्वाज : क्या नोटबंदी और जीएसटी भी इसका एक कारण है?
’दोनों ही इस देश की तासीर के खिलाफ हैं। नोटबंदी के बाद लोगों का ध्यान हटाने के लिए उन्होंने कहा कि नई तकनीक के सहारे काम चलाओ। अब जो आदमी सदियों से अपनी गांठ में पैसे रख कर निकलता रहा है, जिसे इस तरह की तकनीक पर भरोसा नहीं है, वह कैसे करेगा। जैसे मुझे कोई चेक दे और कहे कि बैंक से जाकर पैसे ले लो, तो मैं नहीं कर सकता, क्योंकि मैं जिंदगी भर बैंक नहीं गया। इसलिए यह नोटबंदी विफल रही। पता नहीं किसने यह विचार दिया ऐसा करने का। पूरा पैसा वापस आ गया। देश भर के जमीन-जायदाद के कारोबारी तबाह हो गए। फिर कई ऐसे रोजगार हैं, जिनमें कुछ जातियां लगी हुई हैं, जैसे सब्जी का कारोबार। उनका कारोबार ठप्प हुआ तो हालत यह हुई कि सब्जियां खेत में ही सड़ गर्इं। किसान तबाह हो गया। जो फसल बीमा योजना लागू हुई, वह लूट का जरिया बन गई है। बैंक पैसा काट लेते हैं, पर फसल बर्बाद हो तो उसका पैसा मिलना पटवारी के हाथ में है। इसी तरह इन्होंने कहा कि हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देंगे, लेकिन वह मुद्दा कहीं पीछे चला गया। हकीकत यह है कि रोजगार मिलना तो दूर, बेरोजगारी बढ़ गई। नोटबंदी और जीएसटी के चलते मेरा अनुमान है कि तीन करोड़ लोगों के रोजगार छिन गए।

आर्येंद्र उपाध्याय : क्या वजह है कि विपक्षी दलों में एका नहीं हो पा रहा?
’ऐसा सिर्फ बाहर धारणा बना दी गई है। अगर विपक्ष कहीं खड़ा है तो वह राज्यसभा में। बेशक लोकसभा में विपक्ष नहीं है। राज्यसभा में तीन बार सरकार को मुंह की खानी पड़ी। भूमि अधिग्रहण कानून के बारे में आपको पता है कि वह बहुत खतरनाक कानून था। उसके खिलाफ सारा विपक्ष एक साथ खड़ा हुआ था। सरकार को वह कानून वापस लेना पड़ा। इस तरह तीन बार सरकार राज्यसभा में हार चुकी है। जब इंदिराजी थीं, तब भी बहुत कठिनाई थी। उस समय तो इंदिराजी ने कहा था कि एक चिड़िया भी पर नहीं मार सकती। अब क्या है कि सत्ता पक्ष ने मीडिया के ऊपर ऐसा घेरा बनाया है कि वह ऐसा आभास देता रहता है कि इस वक्त विपक्ष कहीं है ही नहीं। जबकि विपक्ष अगर कहीं है तो वह राज्यसभा में है।

सूर्यनाथ सिंह : क्या इस वक्त मीडिया पर कोई दबाव है या जैसा कि हर सरकार मीडिया को अपने पक्ष में रखने की कोशिश करती है, उसके चलते ऐसा हो रहा है?
’मीडिया तो पाठक और दर्शक के बल पर चलता है। उसकी पूरी साख पाठक और दर्शक पर निर्भर करती है। मगर सरकार की भूमिका विज्ञापन के मामले में अधिक होती है। हर सरकार इसके जरिए मीडिया को अपने पक्ष में करने की कोशिश करती रही है। मगर वह इस सरकार में कुछ ज्यादा हो रहा है। जो कह रहे हैं कि विपक्ष एकजुट नहीं है, वह आधा सच है। सच्चाई यह है कि इसे फैलाया इन लोगों ने है। अब बताइए कि दिल्ली में सत्रह अगस्त को जो साझी विरासत का आयोजन मैंने किया, उसमें ऐसी कौन-सी पार्टी थी, जो नहीं आई!

राजेंद्र राजन : आपको क्या लगता है कि नीतीश कुमार लालू यादव के भ्रष्टाचार से परेशान होकर भाजपा के साथ चले गए या कोई और वजह थी?
’लालूजी के ऊपर तो पहले से मामले दर्ज थे। कुछ बाद में हुए। वे तो हमारे साथ आने को तैयार भी नहीं थे। उन्हें लाने का प्रयास हमारी पार्टी ने किया। इसके लिए हमारे दो लोग लगाए गए थे। नीतीशजी खुद उनके पास कई बार गए। एक-दो बार मुझे भी साथ लेकर गए। फिर परिस्थिति ऐसी बनी कि सब लोगों ने उन्हें किसी तरह से मना लिया। लालूजी तो कहते रहे कि चुनाव के बाद बात करेंगे। हमारे ऊपर जो कुछ मामला कराया नीतीशजी ने कराया। इसलिए वे नहीं मान रहे थे।… जब जनता से वोट मांगना था, तो भ्रष्टाचार के मामले होते हुए भी आपने जाकर उनके साथ गठबंधन किया और जब जीत गए, सरकार बन गई, तो आपने फिर से वही मामला उछाल दिया! इसीलिए तो हम विरोध में खड़े हुए। यह कहां की बात है कि जब वोट लेना था तब तो भ्रष्टाचार का आरोप आपको नहीं दिखाई दिया और सरकार बनते ही उसे मुद्दा बना लिया। भ्रष्टाचार का मामला तो उनके खिलाफ पहले से थे, और यह सब जानते हुए हमने उन्हें साथ जोड़ने का प्रयास किया था।

मुकेश भारद्वाज : इसके पीछे नीतीशजी की कोई दूरदृष्टि तो नहीं? क्योंकि उन्होंने भाजपा के साथ जाते समय कहा था कि 2019 में मोदी के सामने कोई नहीं टिक पाएगा।
’मैंने पहले कहा न कि उनमें यह जो अंतर्विरोध है कि वोट मांगते समय तो शुचिता का सवाल उन्हें नजर नहीं आया और जब सरकार में आ गए तो शुचिता की बात करने लगे। सृजन घोटाला तो चारा घोटाले से भी बड़ा है।

मनोज मिश्र : आज जैसा माहौल है, क्या नहीं लगता कि उसमें सन चौहत्तर की तरह लामबंद होने और वैसे ही आंदोलन की जरूरत है?
’जयप्रकाश नारायण का आंदोलन एक तरह से स्वतंत्रता आंदोलन के बहुत करीब था। उसमें सभी तरह की विचारधाराएं शामिल थीं। मगर उसके बाद बाजार आया, तो स्थिति थोड़ी बदल गई। यह दौर बाजार के बाद का है। अब बाजार हमारे ऊपर हावी हो गया है। आज हालत यह है कि बाजार ने हमारी हर चीज बदल दी है। इस तरह इंसान तक बदल गया है। यह अंतर है। जब तक कांग्रेस पार्टी थी, तब तक एक निरंतरता बनी हुई थी। उसमें हुआ यही कि उनके समय में भ्रष्टाचार का मामला बड़े पैमाने पर आया। मगर अब तो मामला दूसरा है। सन चौहत्तर वाला माहौल बनना मुश्किल है। उस समय और आज के आंदोलन में जमीन-आसमान का फर्क हो गया है। इसके बावजूद हमारे देश की जो तासीर है, उसमें दो तिहाई आज भी विपक्ष में हैं। अलबत्ता इन लोगों के बीच बिखराव है। बिखराव तब भी था, उसे जयप्रकाश जी ने गोलबंद किया। आज भी चुनौती तो बहुत है, पर स्थितियों में अंतर है।

दीपक रस्तोगी : एक तरफ विपक्ष का बिखराव है तो दूसरी तरफ अब भाजपा के भीतर ही यशवंत सिन्हा जैसे लोग विपक्ष की भूमिका में खड़े नजर आने लगे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह भाजपा के भीतर ही विपक्ष पैदा कर वास्तविक विपक्ष को खत्म करने की कोई रणनीति है?
’बिखरा विपक्ष हमेशा रहा है। दूसरा यह कि जब वीपी सिंह सरकार में थे और उन्होंने एक मुद्दे को उठाया, तो वह बात ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई। मनमोहन सिंह दुनिया में जानेमाने अर्थशास्त्री हैं। उन्होंने संसद में जो बोला था, वही बात आज भाजपा के भीतर से उठने लगी। उन्होंने कहा था कि यह ‘मान्युमेंटल डिजास्टर’ है। वही बात चिदंबरम कहते रहते हैं। अब वही बात यशवंत सिन्हा बोल रहे हैं। आप इनके स्वदेशी जागरण मंच जैसे वर्ग संगठनों के लोगों से बात कर लीजिए, वे भी यही बोलते हैं। ऐसी हालत कांग्रेस पार्टी में नहीं थी। उसके वर्ग संगठनों में ऐसी बात नहीं थी। भाजपा का सांगठनिक ढांचा अलग है। वह संघ द्वारा संचालित होती है। इसलिए यशवंत ने जो बात कही है, उससे संघ और उनके वर्ग संगठनों में एक तरह से जोश भरने वाला है।
सूर्यनाथ सिंह : जब नीतीशजी भाजपा के साथ गए, तो लालूजी ने कहा था कि शरदजी को हमारे साथ मिल कर सांप्रदायिकता के मुद्दे पर काम करना चाहिए। अब आप कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था बड़ा मुद्दा है। तो क्या सांप्रदायिकता को आपने किनारे कर दिया?
’मैंने कहा कि अगले चुनाव में अर्थव्यवस्था केंद्रीय मुद्दा होगा। पर इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे मुद्दे नहीं होंगे। एक वक्त में भ्रष्टाचार मुद्दा था उसी प्रकार आज अर्थव्यवस्था मुद्दा है। दूसरे मुद्दे भी साथ खड़े होंगे। सांप्रदायिकता भी उसमें शामिल होगी। मगर जैसे अभी आपको चोट लग गई, तो वही हर समय याद रहेगी। उसी तरह आम आदमी पर अभी अर्थव्यवस्था से जो चोट लगी है, वह प्रमुख रहेगी।

राजेंद्र राजन : नीतीशजी से अलग होने के बाद आपने पार्टी के चुनाव चिह्न के लिए दावा किया था। वह खारिज हो गया। अब आपकी क्या रणनीति है?
’खारिज नहीं हुआ है। उसमें तकनीकी खामी थी। हमारे एक व्यक्ति ने हस्ताक्षर नहीं किया था। उसे फिर से हम ठीक कर रहे हैं। यह मामला वकील देखेंगे। हम तो अभी साझा संस्कृति के नाम पर काम करेंगे। तमाम वर्ग संगठनों, जैसे मजदूर हैं, दलित लोग हैं, सामाजिक संगठन हैं, उन सबको मिला कर ही काम करेंगे।

मृणाल वल्लरी : महिलाओं के खिलाफ भेदभाव लगातार बढ़ रहा है। इससे कैसे पार पाया जा सकता है?
’ठीक बात कही आपने। अभी जो बनारस में हुआ, वैसा अब तक के इतिहास में नहीं हुआ। उसका असर सरकार पर भी पड़ा है। एक छात्रा के साथ जो हुआ, वह ठीक नहीं था। छात्राएं वाजिब मांग कर रही थीं। यह पहली बार हुआ कि लड़कियों पर इस तरह हमला हुआ। मां, बहन, बेटी के चलते ही तो जाति चल रही है न! उसके आजाद हुए बिना समाज आजाद कैसे हो सकता है। हम तो बस इतना ही कहते हैं कि देश की जो हकीकत है, उसे समाहित कर दो। हम कहते हैं कि एक सफाईकर्मी है और एक कोई ऊंचे तबके से है- पढ़ा-लिखा, संपन्न है, दोनों में अंतर है। तो, आरक्षण इस अंतर को खत्म करने के लिए बना है न! जहां तक महिला आरक्षण की बात है, पूरी संसद मेरी बात से सहमत है। अब यह बताइए कि अगर एक सफाई कर्मचारी की स्थिति को मजबूत नहीं कर पाएंगे, तो उस आरक्षण का मकसद क्या रह जाएगा। हर वर्ग की महिला को जगह मिलनी चाहिए।

अजय पांडेय : अरविंद केजरीवाल आपके साथ विपक्ष की एकता में शामिल होने को तैयार हैं?
’उनके लोग आए थे हमारे पास। वे हमारा सहयोग करने को तैयार हैं। मगर जैसा कि मैंने पहले कहा, इसमें अंतर्विरोध कई हैं। साझी विरासत में वे शामिल होना चाहते हैं।

 

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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