ताज़ा खबर
 

बारादरी- राजनीति की देन है आतंकवाद

अखिल भारतीय आतंकवाद विरोधी दस्ते के अगुआ और खुद को टकसाली कांग्रेसी कहने वाले मनिंदरजीत सिंह बिट्टा बेबाकी से कहते हैं कि आतंकवाद राजनीति की देन है। बारादरी की बातचीत में उन्होंने कहा कि पंजाब में आतंकवाद का खात्मा सिर्फ सेना की बदौलत नहीं हुआ था, बल्कि यह कांग्रेस, भाजपा, अकाली, माकपा, भाकपा सबकी मिलीजुली इच्छाशक्ति का नतीजा था। कश्मीर या भारत के अन्य हिस्सों में भी आतंकवाद के खात्मे की यही राह होगी, सारे राजनीतिक दलों को साथ आना होगा। देवेंदरपाल सिंह भुल्लर के मामले में उन्होंने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेताओं को घेरते हुए कहा कि वोट बैंक के कारण ये आतंकवादियों के समर्थन में आ जाते हैं। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।
बारादरी की बैठक मे मनिंदरजीत सिंह बिट्टा (सभी फोटोे: आरुष चोपड़ा)

मनिंदरजीत सिंह बिट्टा क्यों

आतंकवाद को भगवा और मुसलिम आतंकवाद के रंग में रंग कर देखने वालों से अलग एक ऐसा आदमी है, जो पूरे भारत में घूम-घूम कर कहता है कि आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद होता है, उसका कोई मजहब नहीं होता। कांग्रेस से अलग न होने के बावजूद ‘प्रथम राष्टÑ’ की नीति पर मोदी की तारीफ करता और भुल्लर जैसे आतंकवादी का समर्थन करने पर अरविंद केजरीवाल को खरी-खरी सुनाता है। इसलिए आतंकवाद पर आतंकित करने वाले इस समय में बात करने के लिए ‘जिंदा शहीद’ मनिंदरजीत सिंह बिट्टा से बेहतर चेहरा और कौन होता।

मनोज मिश्र : राजनीति से आप अलग क्यों हो गए? वहां जम नहीं पाए या कोई और कारण था?
मनिंदरजीत सिंह बिट्टा : जम नहीं पाए।… जब मैं सात साल का था, अपने दादा के साथ जलियांवाला बाग में टहलने जाया करता था। वहां दीवारों पर खून के छींटे देख कर मेरे मन में जिज्ञासा हुई थी। तब दादाजी ने समझाया था कि ये जनरल डायर की गोलियों से भून दिए गए लोगों के खून के निशान हैं। तभी मैंने शपथ ली थी कि अगर कभी मौका मिला तो मैं भी देश के लिए काम करूंगा। उसके बाद मैं साथियों के साथ जलियांवाला बाग और हरमंदर साहब के बीच पड़ने वाले चौक, जिसे चौक बाबा साहब कहा जाता है, पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को तिरंगा फहराता था। लेकिन हरमंदर साहब में भिंडरांवाले हथियार लेकर आ गए और वहां से सारे फैसले होने लगे, बेगुनाहों का कत्लेआम करने के लिए। पंद्रह अगस्त के दिन जब हमने चौक बाबा साहब पर तिरंगा फहराना चाहा, तो हमें रोका गया। एक एसएचओ ने कहा कि आतंकवादियों ने धमकी दी है, वे यहां बम फोड़ेंगे। मैंने कहा कि हम झंडा यहीं फहराएंगे। पहला बम विस्फोट 1983 में तिरंगे झंडे की रक्षा करते हुए हमारे ऊपर अमृतसर में हुआ था। हमारी शुरुआत आजादी की रक्षा और आतंकवाद के खिलाफ हुई थी। राजनीति हमारा मकसद नहीं था। सेवा मकसद था। मैं कोई चुनाव नहीं लड़ना चाहता था। जब आतंकवादियों ने कहा कि अगर बिट्टा चुनाव लड़ेगा तो उसे गोलियों से उड़ा देंगे, तब मैंने उनकी चुनौती को कबूल करते हुए चुनाव लड़ने का फैसला किया। लोकतंत्र की रक्षा के लिए चुनाव लड़ा। उन्होंने फिर मुझ पर बम फेंका।… मैं यूथ कांग्रेस में आया नहीं था, मुझे बुलाया गया था। जब तक वहां रहा, काम किया, मगर मेरा मकसद कभी सत्ता और कुर्सी नहीं था, और न आगे है।

मुकेश भारद्वाज : पीवी नरसिंह राव के समय आपको बहुत महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी, आप पंजाब में मंत्री भी रहे। क्या पंजाब कांग्रेस या पूरी कांग्रेस में लोग आपसे डर गए और ऐसे हालात पैदा कर दिए कि आप राजनीति से अलग हो जाएं?
’मैं बम-गोलियों का मारा नहीं हूं। मैं राजनीतिक आतंकवाद का मारा हुआ हूं। मेरा मकसद प्रथम भारत था। यह जीवन भर रहेगा। मगर सवाल है कि कोई राजनीति में क्यों आता है? राजनीति झूठ का पर्याय हो गई है। इसलिए अब मेरे साथ कोई राजनीति शब्द जोड़ता है, तो मुझे अच्छा नहीं लगता। बड़ी मुश्किल से वह गंदा चोला मेरे शरीर पर से उतरा है। आज अच्छा लगता है कि लोग मुझे गैर-राजनीतिक मानते हैं।

सूर्यनाथ सिंह : क्या आपको लगता है कि आतंकवाद पर काबू न पाए जा सकने के पीछे भी कोई राजनीति काम करती है या उसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है?
’आतंकवाद हमारे राजनेताओं की देन है। सांस्कृतिक आतंकवाद हमारे राजनेताओं की देन है। नारको आतंकवाद हमारे राजनेताओं की देन है। सारी समस्याओं की जड़ में हमारे राजनेताओं की गंदी सोच है। अगर राजनेताओं की सोच अच्छी हो जाए तो ये सब समस्याएं रहेंगी ही नहीं। मैं एक सवाल पूछना चाहता हूं कि इन तमाम राजनेताओं की जिम्मेदारी क्या है? क्या हम अपने कार्यकर्ताओं को नहीं समझा सकते, क्या हम लोगों को समस्याओं के बारे में नहीं समझा सकते? हमें इस बात पर रिसर्च करने की जरूरत है कि कोई भी कार्यकर्ता राजनीति में क्या करने आता है? क्या सिर्फ इसलिए कि हर जगह अपनी सुंदर-सुंदर तस्वीरें लगी हुई देखें! हर बुराई की जड़ राजनेता हैं। अगर हम अच्छा करना चाहें तो करके दिखा सकते हैं। पंजाब से आतंकवाद खत्म करने में सबने मिल कर काम किया। उसमें कांग्रेस, भाजपा, अकाली, भाकपा, माकपा सब शामिल थे। सबने मिल कर उसे खत्म किया। क्योंकि तब सबने तय किया था कि राष्ट्र को बचाना है, महिलाओं का सुहाग उजड़ने से रोकना है, बच्चों को यतीम होने से बचाना है।

अजय पांडेय : पंजाब में आज युवाओं में नशे की लत के कारण स्थिति बहुत खराब है। नशे का कारोबार भी आतंकवाद से ही जुड़ा है। इसके लिए आप वहां क्या कर रहे हैं?
’पंजाब को हमने आतंकवादियों के बमों-गोलियों से तो मुक्ति दिला ली, पर हकीकत यह है कि पुराना पंजाब अब वापस नहीं लौटेगा। राजनेताओं ने फाड़ो, राज करो की राजनीति की। अकाली कांग्रेस की लड़ाई तो थी, पर अकालियों को फाड़ने की कोशिश की। उसमें से एक धड़ा हथियार लेकर गुरद्वारों में घुस गया। उसके बाद क्या हुआ, सब जानते हैं। अब पुराना पंजाब नहीं रह गया, बर्बाद हो चुका है। नारको आतंकवाद भी एक तरह का हमला है। और, उससे तमाम राजनेता जुड़े हुए हैं, यह तो सभी जानते हैं। इससे पार पाने के लिए वही इच्छाशक्ति चाहिए, जो हमने आतंकवाद के समय में दिखाई थी।

मृणाल वल्लरी : सरकार ने नोटबंदी का फैसला किया तो कहा कि इससे आतंकवाद की कमर टूट जाएगी। क्या आपको लगता है कि नोटबंदी का आतंकवाद पर कोई सकारात्मक असर पड़ा है?
’देखिए, मैं हूं टकसाली कांग्रेसी और अब तक मैंने कांग्रेस को छोड़ा नहीं है। और, कभी ऐसा नहीं होने वाला कि भाजपा मुझे कोई प्रलोभन देकर अपने में मिला ले। मैं नरेंद्र मोदी से कभी मिला नहीं, न मिलने की इच्छा रखता हूं, मगर मैं एक बात स्पष्ट कह दूं कि मातृभूमि के लिए, सीमाओं की रक्षा के लिए उनकी नीति स्पष्ट है। उनके बारे में बाकी लोग चाहे जो कहते रहें, पर मुझे उनकी इस नीति में कोई शक नहीं है। मेरा मुद्दा राष्ट्र है, आतंकवाद है। मुझे काफी सुकून मिला है नरेंद्र मोदी के आने के बाद आतंकवाद को लेकर उनकी नीति से। वही सुकून मुझे नरसिंहराव के समय मिला था। उससे व्यापारी वर्ग या किसानों को नुकसान हो रहा है कि नहीं, उसकी बात मैं नहीं करता, मुझे तो इस बात का सुकून है कि नरेंद्र मोदी की नीति से आतंकवाद कमजोर होगा। आतंकवाद के खिलाफ उस व्यक्ति की लड़ाई बहुत साफ है। नोटबंदी से आतंकवाद पर कितना फर्क पड़ा, मैं नहीं कह सकता, पर मैं मानता हूं कि जरूर फर्क पड़ा है। नीयत साफ होनी चाहिए, बेशक नतीजे देर से आएं।

अनिल बंसल : अगर आतंकवाद के मुद्दे पर आप नरेंद्र मोदी की नीति के इतने समर्थक हैं, तो उनसे हाथ क्यों नहीं मिला लेते?
’हाथ मिला कर क्या करूंगा! जो काम वे कर रहे हैं, अच्छा कर रहे हैं, तो मुझे क्यों उनसे समय मांग कर परेशान करना। मैं अपने मिशन में लगा हुआ हूं। मैं आजाद हूं, आजाद रहूंगा। आज विश्वविद्यालयों में मुझे बुलाया जाता है, मैं वहां युवाओं को जागरूक करता हूं। कल को नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाने जाऊं, तो मुझ पर दाग लग जाएगा कि मैं एक राजनेता हूं। मुझ पर सवाल उठेंगे। आप यह समझिए कि मैं मोदी के साथ नहीं हूं, मैं सिर्फ आतंकवाद को लेकर उनकी नीति के साथ हूं। हो सकता है, कल को आतंकवाद पर उनकी नीति कमजोर हो जाए तो आप क्या समझते हैं, मैं उनका समर्थन करूंगा! मैं कुर्सी सत्ता में फिट हूं ही नहीं, सो मुझे क्यों जाना उस तरफ।

मनोज मिश्र : क्या आपको लगता है कि नरेंद्र मोदी की नीयत साफ है?
’हां, आतंकवाद को लेकर उनकी नीयत साफ है।

मृणाल वल्लरी : राहुल गांधी के बारे में आप क्या सोचते हैं?
’लोग उनके बारे में जो भी कहते रहें, पर मैं उनसे मिला हूं, वे एक सीरियस पॉलीटिशियन हैं। राहुल गांधी के ऊपर कोई आरोप लगाना बिल्कुल गलत है। कई बार यह भी आवाज उठती है कि राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस में अब कोई बचा ही नहीं है। मैं कहता हूं कि जब तक गांधी परिवार है, कांग्रेस जिंदा है। जिस दिन गांधी परिवार नहीं रहेगा, कांग्रेस खत्म हो जाएगी।

पारुल शर्मा : पूर्वोत्तर भी आतंकवाद प्रभावित इलाका है। क्या आपकी संस्था ने वहां भी जाकर कोई काम किया?
’हम एनजीओ की तरह काम नहीं करते, कोई फंड नहीं लेते। हमारी ताकत युवा हैं। बाकी तो करना सरकार को है। हम युवाओं को जगा रहे हैं। चाहे वह जम्मू-कश्मीर हो, पंजाब हो या पूर्वोत्तर हो, हम सब जगह जाते हैं।

सूर्यनाथ सिंह : कश्मीर में आतंकवाद एक तरह से स्वरोजगार का रूप ले चुका है। वहां के युवाओं को मुख्यधारा में लाने का प्रयास क्यों विफल हो रहा है?
’पंजाब में आतंकवाद को सिर्फ सेना ने समाप्त नहीं किया था। सारी पार्टियों ने एकजुटता दिखाई थी, तो उसका सकारात्मक नतीजा निकला था। कश्मीर में ऐसा नहीं है। वहां की सभी पार्टियां वोटबैंक की राजनीति करती हैं। चाहे वह नेशनल कांफ्रेंस हो, पीडीपी हो, भाजपा हो या कोई और पार्टी। जब तक राजनीतिक पार्टियों के लोग नहीं कहेंगे कि हमारा मकसद पंजाब की तरह कश्मीर में अमन-शांति लाना है, तब तक वहां से आतंकवाद खत्म नहीं हो सकता। इसमें राजनेताओं को जिम्मेदारी निभानी होगी। पी. चिदंबरम को देखिए, वे कुछ भी बोल जाते हैं और पार्टी कहती है कि वह उनका अपना बयान है, पार्टी का उससे कोई लेना-देना नहीं। भाई, कोई आदमी ऐसा बयान देता है, जिससे पार्टी की साख प्रभावित होती है, तो उसे निकालो बाहर। मगर मेरे जैसा कोई नेता ऐसा बयान दे देगा तो उसे फौरन बाहर निकाल देंगे, चिदंबरम को नहीं निकालेंगे। जब हमारी सेना वहां लड़ रही है, तो आप ऐसे बयानों से उनका हौसला बढ़ा रहे हैं कि डगमगा रहे हैं?

मनोज मिश्र : तो क्या पार्टियां व्यक्ति को देख कर फैसले करती हैं कि चिदंबरम जैसा कोई बयान दे तो उसे नहीं निकालेंगे और वही बयान बिट्टा जैसा कोई दे दे तो उसे निकाल देंगे?
’मुझे तो निकाल भी दें तो फर्क नहीं पड़ता। पर सवाल है कि जब कोई बयान पार्टी को मुफीद बैठता है, तो उसका श्रेय वह खुद ले लेती है, और जो उसे रास नहीं आता उससे किनारा कर लेती है। तो फिर अनुशासन कहां रहा! मैंने राहुल गांधी, सोनिया गांधी के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोला। पर हां, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल के खिलाफ जरूर बोला है। यह भगवा आतंकवाद की बात कांग्रेस को ले डूबेगी।

रामजन्म पाठक : क्या आपको नेहरू परिवार ने इसलिए अलग-थलग कर दिया कि आप नरसिंहराव के बहुत करीबी थे?
’नहीं नहीं, ऐसा नहीं था। सत्ता, कुर्सी की राजनीति में मैं कभी फिट बैठा ही नहीं।

अनिल बंसल : अगर आप कांग्रेस की भगवा आतंकवाद वाली बात से असहमत हैं, तो क्या यह मानते हैं कि मुसलिम आतंकवाद है?
’सारे मुसलिम, सारे हिंदू या सारे सिखों को आतंकवादी कहना गलत है। अगर मुसलिम समुदाय के भीतर से एक आतंकवादी निकला है, तो मुसलिम समुदाय के लोगों को इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए, जिस तरह पंजाब में उठी थी। मगर आज ऐसे लोग हैं ही नहीं। ओवैसी कहते हैं कि मैं वंदे मातरम् नहीं बोलूंगा, तो चैनलों में बड़ी-बड़ी खबरें दिखाई जाती हैं, मगर जो सीमा पर गोलियां खाते हुए जवान बोलते हैं, जो लोग सड़कों पर बोलते हैं, उन्हें तो नहीं दिखाया जाता!

पारुल शर्मा : आपने कभी सेना में जाने का नहीं सोचा?
’मेरा मन था कि टेरीटोरियल आर्मी में जाऊं। दिल्ली सर्किल को जो देखते हैं, उन जनरल के पास गया था। मैंने कहा कि पैरा मिलिट्री में जाना चाहता हूं। इतने क्रिकेटर को देते हैं, मुझे भी कोई पोस्ट दे देंगे, तो बेहतर करके दिखाऊंगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए रक्षामंत्री के पास जाना पड़ेगा। मैंने कहा, मैं नहीं जाऊंगा। नहीं दिया, वापस आ गया।

सूर्यनाथ सिंह : तो क्या सेनाओं को मिला विशेषाधिकार जारी रहना चाहिए?
’मेरा बस यही सिद्धांत है कि प्रथम राष्ट्र। इसलिए राष्ट्र की रक्षा के लिए जो कुछ जरूरी है, होना चाहिए।

अनिल बंसल : मगर यह सिद्धांत और नारा तो संघ का है!
’आपको जो समझना है समझ लीजिए। मगर मैं संघ के एजंडे पर काम नहीं करता। मेरा नारा है- हिंदू मुसलिम सिख इसाई सब हैं भाई भाई। और वंदे मातरम् तो कांग्रेस का नारा था, संघ वाले तो अब उसे बोलने लगे हैं!

 

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.