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बारादरी- मेरा एक भी कदम भगवाकरण की ओर नहीं

केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद संस्कृति पर छिड़ी बहस आज भी जारी है। संस्कृति के भगवाकरण के आरोप शुरू हुए, जो आज पर्यटन स्थलों तक को एक खास रंग में रंगने तक पहुंच चुके हैं।
केंद्रीय संस्कृति (स्वतंत्र प्रभार), पर्यावरण और वन राज्यमंत्री महेश शर्मा।

केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद संस्कृति पर छिड़ी बहस आज भी जारी है। संस्कृति के भगवाकरण के आरोप शुरू हुए, जो आज पर्यटन स्थलों तक को एक खास रंग में रंगने तक पहुंच चुके हैं। प्रदूषण और पर्यावरण को लेकर आए अदालती फैसलों पर भी मेरा त्योहार उसका त्योहार वाली बहस शुरू हो गई। केरल को विकास के मामले में पीछे बता कर अयोध्या में त्रेता युग की दिवाली से पर्यटन के नए प्रतीक बनाए जा रहे हैं। जनसत्ता बारादरी में इन मुद्दो से मुठभेड़ करते हुए केंद्रीय संस्कृति (स्वतंत्र प्रभार), पर्यावरण और वन राज्यमंत्री महेश शर्मा बेबाकी से कहते हैं कि कोई एक भी व्यक्ति बताए कि मेरा अमुक कदम भगवाकरण की ओर है। ताजमहल से लेकर पटाखाबंदी तक के मुद्दों को उन्होंने बड़े फलक से देखने की कोशिश की। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

सूर्यनाथ सिंह : देश के ज्यादातर संस्कृतिकर्मी आपकी सरकार से नाखुश हैं। संस्कृति मंत्री के तौर पर आपने उनकी नाराजगी दूर करने का क्या प्रयास किया है?

महेश शर्मा : जो हमारी सांस्कृतिक धरोहरों के रखवाले हैं, जो इन धरोहरों के अंबेसडर हैं, उनमें से एक भी ऐसा व्यक्ति कह दे कि संस्कृति मंत्री रहते मैंने कभी उसकी व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुंचाया है। हां, कुछ लोगों को शौक हो गया है कहने का कि महेश शर्मा का अमुक कदम भगवाकरण की ओर ले जा रहा है, तो उसकी मैं नहीं कह सकता, मगर संस्कृति की रक्षा से जुड़ा हुआ एक भी व्यक्ति नहीं कह सकता कि मैंने उसके असम्मान में कुछ कहा या किया हो।

मुकेश भारद्वाज : आप नोएडा के जनप्रतिनिधि हैं। नोएडा की स्थिति इन दिनों बड़ी अजीब है। कभी आरुषी जैसी बच्ची की हत्या हो जाती है, तो कभी अखलाक जैसा व्यक्ति मार डाला जाता है। इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या करना चाहेंगे? खासकर आरुषी के बारे में क्या कहना चाहेंगे?
’इस शहर में मैं चौंतीस वर्षों से रह रहा हूं और मैं मानता हूं कि किसी शहर की पहचान वहां की इमारतों से नहीं बना करती। वहां रहने वालों की संस्कृति, उनके सामाजिक स्तर से बना करती है। ऐसे शहरों की कुछ दिक्कतें हैं। जिस बच्ची के बारे में आप बात कर रहे हैं, मैं वहां गया था, उसके परिवार से मिला था। आज अदालत ने बड़े दृष्टिकोण के साथ उस पर फैसला सुनाया है। पुलिस ने ठीक से इस मामले को नहीं संभाला, इसीलिए अदालत को इसमें दखल देना पड़ा। दोषी की पहचान होनी चाहिए। वह समाज की बेटी थी, उसके मां-बाप भी इसी समाज के लोग हैं, इसलिए पुलिस को इस मामले में निष्पक्षता से जांच करनी चाहिए।

मनोज मिश्र : ग्रेटर नोएडा बहुत तेजी से विकसित हो रहा था। अब उसकी रफ्तार थम गई है। उसे कैसे पटरी पर लाएंगे?
’नोएडा को बसाने का कदम निस्संदेह सराहनीय है। इसके विकसित होने से दिल्ली के लिए बहुत सुविधा हो गई। मगर जब यहां प्राधिकरण बना दिया गया, तो यहां के अधिकारियों को असीमित अधिकार दे दिए गए। उसमें कहीं लोकतांत्रिक प्रणाली नहीं थी। इस तरह यह शहर अपने मिजाज से, लोगों की अपनी सोच के हिसाब से बसता रहा। कोई अधिकारी आया, उसने कहा कि यहां औद्योगिक इकाइयां बसनी चाहिए, तो औद्योगिक इकाइयां लगने लगीं। कोई अधिकारी आया, तो उसने स्कूल बसा दिए। फिर कोई अधिकारी आया तो उसने कहा कि औद्योगिक इकाइयां तो यहां चल नहीं पा रही हैं, तो उसने बिल्डर्स को जमीनें देने का नियम बना दिया। फिर कोई अधिकारी आया तो उससे ग्रेटर नोएडा बसाने की योजना शुरू हुई। ग्रेटर नोएडा बसना तब शुरू हुआ जब एक्सप्रेस-वे बनाया गया। अगले बीस साल तक की योजना बनी। लेकिन एक्सप्रेस-वे बना तो शर्त रखी गई कि उस पर ढाई किलोमीटर के बाद ही कट बनेगा। बीच में कोई कट नहीं दिया जाएगा। फिर सरकारें बदलीं, सरकारें बदलने के साथ-साथ उनकी प्राथमिकताएं भी बदलीं। शहर अच्छी तरह से बसे इसके बजाय उनकी प्राथमिकता हो गई कि उनकी जमीन किसी तरह बिके। और जमीन बेचने के खेल में जो कुछ होता था, वह जगजाहिर है। इस तरह जमीन बेचने के खेल में जहां एक लाख घरों की जरूरत थी वहां दस लाख घर बनाने के लिए बिल्डर्स आ गए। इस तरह यह शहर अव्यवस्था का शिकार हुआ। आज भी ग्रेटर नोएडा की आबादी एक से सवा लाख है, जिसमें चालीस फीसद विद्यार्थी हैं। अब वहां जल्दी ही मेट्रो चल जाएगी, तो शायद वह शहर बस जाए। नोएडा और ग्रेटर नोएडा के बीच जो शहर बसा दिया गया, उससे ग्रेटर नोएडा के विकास में रुकावट आ गई। अब उधर एक हवाईअड्डा बनने की उम्मीद है। फिर ग्रेटर नोएडा ठीक से बस जाएगा।

राजेंद्र राजन : अभी उत्तर प्रदेश सरकार ने ताजमहल को अपनी पर्यटन सूची से बाहर कर दिया। क्या यह आपकी पार्टी की सुविचारित नीति है या उत्तर प्रदेश सरकार का अपना फैसला है? केंद्र सरकार का इस पर क्या रुख है?
’जब यह खबर अखबारों में आई, तो मैंने रीता बहुगुणा जोशी से बात की। उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है। उन्होंने अखबारों को इस पर स्पष्टीकरण भी दे दिया था। ताजमहल हमारे पर्यटन का केंद्र बिंदु है। हालांकि हिंदुस्तान में ताज के अलावा भी बहुत कुछ देखने लायक है। तैंतीस ऐतिहासिक स्थल विश्व धरोहर की सूची में हैं। ताज एक घोषित पर्यटन स्थल है। इसलिए प्रश्न ही नहीं उठता कि ताज को पर्यटन की सूची से हटाया जाए।

सूर्यनाथ सिंह : जब नरेंद्र मोदी ने सत्ता की कमान संभाली तो उन्होंने पर्यटन को बढ़ावा देने पर काफी जोर दिया था। मगर आरोप है कि इतने साल गुजर जाने के बाद भी पर्यटन के क्षेत्र में अपेक्षित गति नहीं आ पाई है। ऐसा क्यों है?
’इस बात से मैं सहमत नहीं हूं। 2014 में हमारी सरकार आई। उस समय दुनिया के पर्यटन सूचकांक में, जो कि स्विटजरलैंड की एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त संस्था तैयार करती है, हम पैसठवें स्थान पर थे। और आज से एक महीने पहले जब मैंने पर्यटन मंत्रालय छोड़ा, हमारा देश चालीसवें स्थान पर आ गया था। पच्चीस अंक ऊपर आना बड़ी बात है। ऐसा अब तक के इतिहास में नहीं हुआ। दूसरी ओर, दुनिया की पर्यटन विकास दर इस साल की 4.6 फीसद है। जनवरी से लेकर अब तक भारत की पर्यटन विकास दर सत्रह अंक से अधिक है। आंकड़ों, संख्या और धन की दृष्टि से हमारा पर्यटन निरंतर विकास कर रहा है। पिछले साल हमने एक लाख छत्तीस हजार करोड़ की विदेशी मुद्रा कमाई थी और इस साल हमने एक लाख छप्पन हजार करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा कमाई है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले सत्रह फीसद ज्यादा है। दुनिया भर में पर्यटन के क्षेत्र में मंदी है, पर हम विकास की राह पर हैं। इन सबके बावजूद कि हमें आधारभूत ढांचा बहुत कमजोर मिला है। आज भी हमारे ऐतिहासिक स्थलों पर होटलों वगैरह की कमी है। उस आधारभूत ढांचे को सुधारने के लिए हमारे मूल मंत्र थे- कनेक्टिविटी, स्वच्छता, सुरक्षा। स्वच्छता को हमने प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान से जोड़ा। सुरक्षा की दृष्टि से हमने पर्यटक मित्र बनाए, प्रदेशों की सरकारों के साथ मिल कर पर्यटक पुलिस बनाई। यह भी सच है कि आज हम जहां हैं, वहां से तीन गुना आगे होना चाहिए था, पर अब से पहले की सरकारों ने पर्यटन को बढ़ाने की जरूरत ही नहीं समझी थी। हमारे प्रधानमंत्री का मानना है कि केवल टूरिज्म देश का भाग्य विधाता बन सकता है। इसलिए अलग से इसके लिए योजना बनाई। पांच सौ तीन करोड़ रुपए पर्यटन के लिए आबंटित किए गए। इसके अलावा यहां एक ऐसी हेल्पलाइन शुरू की गई, जिसमें किसी भी भाषा में आप सूचनाएं प्राप्त कर सकते हैं। बारह विदेशी भाषाओं में सूचनाएं प्राप्त की जा सकती हैं। पूरे विश्व में यह एक अनूठा प्रयास है।

अजय पांडेय : दिल्ली मेट्रो के किराए बढ़ने को लेकर लोगों में नाराजगी है। साथ ही माना जा रहा है कि इससे सड़कों पर गाड़ियां बढ़ेंगी और पर्यावरण प्रदूषण बढ़ेगा। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
’मेट्रो की शुरुआत एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ हुई थी। जब हम छोटे थे तो चाय और कॉफी का कारोबार बढ़ाने के लिए शुरू-शुरू में कंपनियां लोगों को मुफ्त में चाय-कॉफी पिलाया करती थीं। उसी तरह लोगों में सार्वजनिक परिवहन की आदत डालना जरूरी था। मुझे नहीं मालूम, क्या पता उन दिनों कुछ सबसिडी भी दी गई हो। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर निर्भरता हमारी मजबूरी है। पर सवाल है कि इस व्यवस्था को हम कब तक सबसिडी देते रहें। आज दुनिया ने माना है कि हमें सबसिडी से ऊपर उठना पड़ेगा। एक सीमा तक सबसिडी हम दे सकते हैं। सबसिडी का मतलब है कि आप एक चलते-फिरते आदमी को बैसाखी दे रहे हैं। आज उस बैसाखी को निकालने की जरूरत है। दूसरी बात कि पर्यावरण का मुद्दा भी बड़ा है। इसके लिए भी हमें कुछ करना होगा। यह देश विकास के पहिए पर है। कहीं न कहीं वक्त के साथ हमें सबसिडी से मुक्ति पाने की जरूरत है।

संजय शर्मा : पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध को लेकर ऐसा माहौल कैसे बन गया कि यह सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ फैसला है?
’पर्यावरण की दृष्टि से चाहे वह पटाखों पर हो या मूर्ति विसर्जन पर, कहीं न कहीं नियंत्रण करना ही होगा। इसके लिए आम लोगों को आगे आना पड़ेगा। जैसे पॉलीथिन का इस्तेमाल है, जब तक सब लोग इसे लेकर जागरूक नहीं होंगे, पर्यावरण के मसले पर कठिनाइयां बनी रहेंगी।

प्रतिभा शुक्ल : दिल्ली में कचरे से बिजली बनाने का संयंत्र लगा है। मगर आज तक कचरे की छंटाई की मुकम्मल व्यवस्था नहीं हो पाई है। इसका क्या उपाय हो सकता है?
’कचरा निपटान हमारे शहरों की सबसे बड़ी समस्या हो गया है। इसके कारण आने वाले समय में बहुत बड़ी कठिनाई पेश आने जा रही है। इस विषय पर हमारी वैज्ञानिक एजंसियां गहन चिंतन कर रही हैं। इसका कोई न कोई समाधान जल्दी निकल आएगा। अभी हमने एक नीति बनाई है इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निपटान को लेकर कि जो कंपनियां अपना उत्पाद बेच रही हैं, वही उन्हें वापस लें। इसी तरह अस्पतालों से निकलने वाले कचरे का निपटान बड़ी समस्या है। जब तक गलनीय और अगलनीय कचरे की छंटाई की समुचित व्यवस्था नहीं होगी, तब तक हम उनका सही तरीके से निपटान नहीं कर पाएंगे। बहुत जल्दी ही इस पर बेहतर नतीजे आने वाले हैं।

पारुल शर्मा : पाकिस्तान के साथ हमारी सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया पिछले तीन साल से रुकी हुई है। इसे कितना उचित मानते हैं आप?
’ताली दो हाथों से बजती है। हमारी तरफ से लगातार दोस्ती का हाथ बढ़ाया जाता रहा, मगर उधर से वैसा व्यवहार देखने को नहीं मिला। कई बार जब सामने वाला देश शिष्टाचार निभाने की सीमाएं लांघ जाता है, तो ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं। एक तरफ हम सांस्कृतिक आदान-प्रदान की बात करें और दूसरी तरफ से हमारे सैनिकों के सिर काट कर हमें भेज दिया जाए, तो ऐसा नहीं चलेगा।

आशीष दुबे : आपने सांसद और मंत्री रहते हुए अपने क्षेत्र के लिए क्या उपलब्धियां हासिल की हैं?
’इस क्षेत्र की सबसे बड़ी जरूरत थी बिजली की उपलब्धता। पंद्रह सौ करोड़ रुपए की लागत से उन्नीस सौ अस्सी हजार मेगावाट बिजली उत्पादन वाला पावर प्लांट लगाने की मंजूरी मिल चुकी है। जमीन भी अधिग्रहीत की जा चुकी है। जल्दी ही बन कर तैयार हो जाएगा। इसकी चालीस फीसद बिजली अपने क्षेत्र को मिलेगी। ग्रेटर नोएडा क्षेत्र विकास की दृष्टि में डूबता हुआ क्षेत्र हो गया था। प्रदेश सरकार के साथ मिल कर जेवर क्षेत्र में हवाईअड्डा बनाने पर सहमति हो गई है। आज पूरा गौतम बुद्ध नगर विश्व के पर्यटन मानचित्र पर आ गया है। नेशनल बोटेनिकल गार्डन और पक्षी विहार को विकसित करने की दिशा में काम चल रहा है। अभी और बहुत कुछ करना बाकी है।

अजय पांडेय : आपकी सरकार सरस्वती नदी के पुनरुद्धार के लिए तो प्रयास कर रही है, पर दिल्ली में यमुना को लेकर शिथिलता बरती जा रही है। ऐसा क्यों?
’यह कड़वा सच है कि हमारी नदियां शहरों के नाले बन गई हैं। इसके लिए एक जनचेतना जगाने की जरूरत है कि गंगा और यमुना कपड़े धोने के लिए नहीं हैं, नालों का पानी मिलाने के लिए नहीं हैं। हमारी चुनौती है गरीबी और बेरोजगारी मिटाना। इसके लिए उद्योग-धंधे लगाने जरूरी हैं। मगर हम अभी तक पर्यावरण और उद्योग-धंधों के बीच सामंजस्य नहीं बिठा पाए हैं। यह सामंजस्य बिठाना होगा, ताकि विकास का पहिया भी चलता रहे और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।

मृणाल वल्लरी : केरल के आपके क्या अनुभव हैं और वहां आपकी आगे की क्या रणनीति है?
’केरल में सरकार में बदलाव की लहर है। कम्युनिस्ट पार्टी से मोहभंग हो रहा है। केरल में शिक्षा का स्तर काफी ऊंचा है। वहां के करीब चालीस फीसद युवा दूसरे देशों में नौकरी करते हैं, वहां से पैसा भेजते हैं। वहां पर्यटन की दृष्टि से अपार संभावनाएं हैं। वहां चार अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे हैं। मगर केरल आज भी विकास की बाट जोह रहा है। और आज जिस तरह की राजनीतिक हिंसा केरल में हो रही है, उसके लिए वहां की सरकार जवाबदेह है।

मुकेश भारद्वाज : थिएटर ओलंपिक्स को लेकर उठे विवाद पर आप क्या कहना चाहेंगे?
’भारत रंगमंच का एक केंद्रबिंदु रहा है। एक संस्था बनी, जिसने दुनिया में सात बार थिएटर ओलंपिक्स कराए। आठवीं बार हमारे देश में होना तय किया गया। उस पर कुछ प्रश्न उठे, उसका जवाब हमारी तरफ से दे दिया गया और अब थिएटर ओलंपिक्स हो रहे हैं।

 
प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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