ताज़ा खबर
 

राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय है जेएनयू

चाहे वह वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, हम सभी देश के लिए काम करते हैं। हमारे विचार भिन्न हो सकते हैं, हमारे काम करने का तरीका अलग हो सकता है, पर हम साथ मिल कर कहीं न कहीं समाज को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे होते
जेएनयू के वीसी एम. जगदीश कुमार। (फाइल फोटो)

किसी भी देश के शैक्षणिक संस्थानों का रंग-रूप आमतौर पर वैसा ही होता है जैसी वहां की सरकार होती है। शैक्षणिक परिसर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकार की नीतियों के प्रथम प्रवक्ता होते हैं। देश में सरकार बदलने के साथ ही शिक्षा संस्थानों को बदलने की जो मुहिम शुरू हुई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय उसके केंद्र में रहा है। सरकार के साथ राष्टÑवादी बहस को भी तीन साल हो गए हैं। अभी कैसा और क्यों है जेएनयू, बारादरी की बैठक में इसी मसले पर बातचीत की कुलपति एम. जगदीश कुमार ने। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

एम. जगदीश कुमार क्यों
देश के सर्वश्रेष्ठ उच्च शैक्षणिक परिसर को पूरी तरह राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगा है। एक खास रंग से प्रभावित होने के आरोप में दूसरे रंग से वैचारिक पुताई करने के आरोप लगे, जिसका असर नियुक्तियों, दाखिलों और प्रशासन के ढांचे पर भी दिखने लगा। कई मंचों से गुणवत्ता का पुरस्कार हासिल कर चुका संस्थान अपना सब कुछ बदलने पर आमादा क्यों है? इन सवालों के जवाब तो संस्थान के अगुआ ही दे सकते हैं।

राजेंद्र राजन: शिक्षा के मामले में भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है, मगर जब उच्च शिक्षा में बेहतरीन विश्वविद्यालयों की सूची जारी होती है तो यहां के इक्का-दुक्का संस्थान ही उसमें जगह बना पाते हैं। इसकी क्या वजह है?
एम. जगदीश कुमार: इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो वर्ल्ड रैंकिंग, इसमें जो मानदंड इस्तेमाल किए जाते हैं, वे हमारे पक्ष में नहीं हैं। विश्वविद्यालयों का प्राथमिक उद्देश्य होता है-उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराना। भारत में अगले दस सालों में तीस करोड़ युवकों को शिक्षित करना पड़ेगा। यह हम कैसे कर पाएंगे? फिलहाल हमारे यहां आठ सौ विश्वविद्यालय और चार हजार कॉलेज हैं। नैक की रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से अधिकतर विश्वविद्यालय और कॉलेज औसत से भी नीचे हैं। इसलिए हमारा प्राथमिक उद्देश्य दुनिया के विश्वविद्यालयों की सूची में आना नहीं है। जब हम शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाएंगे, तो अपने आप अच्छे विश्वविद्यालयों की सूची में भी आएंगे।

रामजन्म पाठक: जेएनयू में एमफिल, पीएचडी की सीटें काफी घटा दी गई हैं, ऐसे में अधिक से अधिक लोगों को शिक्षित कर पाना कैसे संभव होगा?
एम. जगदीश कुमार: जहां तक जेएनयू में सीटें कम करने का सवाल है, ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ है। यूजीसी ने 2009 में कहा था कि एमफिल और पीएचडी में हर प्रोफेसर के लिए तय सीटों से ज्यादा विद्यार्थी नहीं लिए जाने चाहिए। इसमें एक प्रोफेसर के लिए आठ विद्यार्थी निर्धारित हैं। मगर जेएनयू ने उसे लागू नहीं किया। बाकी सभी विश्वविद्यालयों ने लागू किया। हालांकि, एक प्रोफेसर पर आठ विद्यार्थी भी ज्यादा संख्या है। दुनिया के जिन अच्छे विश्वविद्यालयों की बात हो रही थी, वहां तीन-चार से ज्यादा नहीं होते। लेकिन हमारे जेएनयू में तीस-चालीस विद्यार्थी मिल जाएंगे। पीएचडी ऐसे नहीं कराई जा सकती। इसलिए पिछले साल हमने यूजीसी के उस निर्देश को लागू किया। पर लोगों को लग रहा है कि सीटें कम हो गर्इं।
जहां तक दाखिलों का सवाल है यूनीवर्सिटी को हमें बाउंड्रीलेस बनाना होगा। दूर-दराज के गांवों में रहने वाले बच्चों को कैसे अच्छी शिक्षा देंगे? जेएनयू से लेक्चर रिकार्ड करके हम आॅनलाइन डाल सकते हैं, जिससे दूर-दराज गांवों के बच्चे पढ़ सकते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल में इसके लिए एक कार्यक्रम शुरू भी किया है- ई-पाठशाला। इस तरह हम पारंपरिक पढ़ाई को बदल सकते हैं। जेएनयू में भी हम अध्यापकों और दूसरी एजंसियों से सलाह-मशविरा कर रहे हैं कि किस तरह आॅनलाइन प्रोग्राम शुरू किया जा सकता है।

रूबी कुमारी: कुछ दिनों पहले आपने कहा था कि हमें अकादमिक गुणवत्ता के बजाय सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर बढ़ना है। लेकिन इन दिनों जिस तरह जेएनयू में वैचारिक टकराव बढ़ गया है, उससे नकारात्मक छवि बन रही है।
एम. जगदीश कुमार: जेएनयू में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का प्रोफाइल देखिए तो पता चलेगा कि बहुत सारे विद्यार्थी बहुत कमजोर तबके से आए हैं। हमारा लक्ष्य इन लोगों को इस तरह तैयार करना है कि वे यहां से निकल कर जाएं और समाज में कुछ बेहतर योगदान करें। अभी भारत में हम हर साल दस लाख लोगों को इंजीनियर बनाते हैं, मगर उनमें से केवल दस फीसद को रोजगार दे पाते हैं। विश्वविद्यालयों का ध्यान हमेशा इस बात पर रहना चाहिए कि किस तरह नया पाठ्यक्रम शुरू करें, नया रिसर्च शुरू करें। जहां तक वैचारिक टकराव की बात है, मेरा मानना है कि एक विद्यार्थी होने के नाते उसे अपने समाज को बारीकी से देखना चाहिए। इसलिए जब हम समाज पर नजर रखते हैं, तो वहां अच्छा या बुरा जो कुछ हो रहा होता है, उसे देख कर हम अपना एक विचार बनाएंगे ही। यह उम्र ही बहसतलब होने की होती है। अपने विचार में रद्दोबदल करते हैं। और यह भी स्वाभाविक है कि मेरे पास एक विचार है और दूसरे के पास दूसरे तरह का विचार है तो वे दोनों कहीं न कहीं टकराएंगे। पर इस टकराव से एक सर्वस्वीकृत विचार पैदा होता है। यह स्वाभाविक है और इसे हमें बढ़ावा देना चाहिए। हम चाहते हैं कि भिन्न-भिन्न विचारों के लोग हों और वे खुल कर आपस में बहस-मुबाहिशा करें। और हर विचार को सुना जाना चाहिए।

मृणाल वल्लरी: आपके कार्यकाल में जेएनयू प्रशासन और छात्रों के बीच टकराव कुछ अधिक देखा जा रहा है, इसकी क्या वजह है?
एम. जगदीश कुमार: कोई भी ऐसा विश्वविद्यालय नहीं है, जहां प्रशासन और छात्रों के बीच टकराव न होता हो। और यह विद्यार्थियों का अधिकार है कि वे प्रशासन से अलग मत रखें।

रूबी कुमारी: मगर छात्रों पर देशद्रोह का मुकदमा दायर होने के बाद से स्थितियां ज्यादा तनावपूर्ण हो गई हैं।
एम. जगदीश कुमार: किसने देशद्रोह का मुकदमा कराया। नौ फरवरी को जो कुछ हुआ उस पर मैंने तो यही कहा कि यह हमारा आंतरिक मामला है और इसे हम खुद सुलझाएंगे। जो जेएनयू के बाहर हुआ, उस पर हमारा नियंत्रण तो नहीं है।

मुकेश भारद्वाज: एक आम धारणा है कि जेएनयू में वामपंथ का दबदबा रहा है, इसलिए उसे खत्म करने के लिए अब उसका भगवाकरण करने का प्रयास हो रहा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
एम. जगदीश कुमार: देखिए, चाहे वह वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, हम सभी देश के लिए काम करते हैं। हमारे विचार भिन्न हो सकते हैं, हमारे काम करने का तरीका अलग हो सकता है, पर हम साथ मिल कर कहीं न कहीं समाज को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे होते हैं। मैं समझता हूं कि हर विचारधारा का स्वागत होना चाहिए। हमारे यहां छह सौ से ऊपर अध्यापक हैं और करीब आठ हजार सात सौ विद्यार्थी हैं, आप उनमें से किसी से भी पूछिए, कोई नहीं कहेगा कि वह कानून तोड़ना चाहता है। हर कोई देश के लिए काम करना चाहता है। बेशक उनके बोलने और काम करने के तरीके में भेद हो सकता है। इसलिए जेएनयू हर विचारधारा का स्वागत करता है। जेएनयू में शायद ही कोई ऐसा हो, जो कहे कि वह राष्ट्रद्रोही है। इसलिए जेएनयू राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय है।

अरविंद शेष: आपके अनुसार राष्ट्रवाद की परिभाषा क्या है?
एम. जगदीश कुमार: अभी हमारे देश के सामने जो चुनौतियां हैं, उनसे पार पाने के लिए हम अपने विद्यार्थियों को किस तरह तैयार करें, किस तरह रोजगार के अवसर पैदा करें, किस तरह बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा सकें, कैसे गांव के लोगों को बेहतर सुविधाएं दे सकें, एक शिक्षक के नाते हमारी चिंता यह है और एक विद्यार्थी के नाते भी हर किसी की होनी चाहिए। हमारे विश्वविद्यालयों के सामने अभी यह चुनौती है कि इन तमाम समस्याओं को अपने अध्यापकों और विद्यार्थियों के सामने रखें। हम अपने प्रयासों से किस प्रकार आगे बढ़ा सकते हैं, मेरे हिसाब से यही राष्ट्रवाद है।

सुशील राघव: नियुक्तियों के मामले में जेएनयू की अपेक्षा दिल्ली के दूसरे विश्वविद्यालयों में स्थिति बेहतर है। इस दिशा में क्या करने वाले हैं?
एम. जगदीश कुमार: जेएनयू में बहुत सारे विषय पढ़ाए जाते हैं। इसलिए हमारा प्रयास है कि विभिन्न एजंसियों से संपर्क करके अपने विद्यार्थियों के बेहतर प्लेसमेंट की व्यवस्था की जाए। इसके लिए हाल ही में हमने एक प्लेसमेंट सेल गठित किया है। एक प्रोफेसर को इसका निदेशक बनाया गया है और हर स्कूल से तालमेल करके विभिन्न संस्थाओं-एजेंसियों से संपर्क करने की कोशिश की जा रही है। ज्यादा संभव है कि अगले साल तक हमें इस मामले में काफी सफलता मिलेगी।
अभी हम जेएनयू में एक इंजीनियरिंग का नया स्कूल खोलने की योजना बना रहे हैं। जेएनयू बेसिक रिसर्च के लिए जाना जाता है। अगर इंजीनियरिंग स्कूल खुलेगा तो बेसिक रिसर्च के आधार पर इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट तैयार किया जा सकता है। फिर एक स्कूल आॅफ एंटरप्रोन्योर एंड मैनेजमेंट भी खोलने की जरूरत है। हम इस दिशा में काम कर रहे हैं। लेकिन इन स्कूलों में हम थोड़े अलग ढंग से काम करना चाहेंगे। इनमें अनौपचारिक रिसर्च को बढ़ावा देने की कोशिश होगी। जैसे किसी व्यक्ति ने किसी गांव में कोई इन्नोवेशन किया, तो उसे हम बढ़ावा देंगे। देश में हजारों ऐसे इन्नोवेटर हैं, जिनके काम को इंडस्ट्रियल सपोर्ट नहीं मिल पाता। जेएनयू उन्हें बढ़ावा देगा। उन्हें प्रशिक्षित करने का भी प्रयास होगा।

प्रियरंजन: पिछले दिनों कई ऐसे फैसले हुए, जिनमें जेएनयू को अपने कदम वापस खींचने पड़े। पहले ही इसकी तैयारी क्यों नहीं कर ली जाती कि ऐसी स्थिति आने ही न पाए?
एम. जगदीश कुमार: हमारे यहां कई ऐसी बॉडी हैं, जिनका आपस में विचार-विमर्श होता रहता है। मगर जहां तक यूजीसी गजट नोटीफिकेशन की बात है, वह 2016 में आया था। यूजीसी गजट नोटीफिकेशन को लागू करना अनिवार्य होता है। इसलिए जब मैंने एकेडेमिक काउंसिल से बात की तो उन्होंने कहा कि हां, हम इसे लागू कर सकते हैं। यूजीसी ने साफ कहा था कि एमफिल और पीएचडी में दाखिले के लिए दो स्तरों पर परीक्षा ली जा सकती है। पहले लिखित परीक्षा और फिर इंटरव्यू। ज्यादातर विश्वविद्यालयों में रिसर्च आधारित पाठ्यक्रमों में दाखिला सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर होता है। यहां तक कि विदेशी संस्थानों में भी एमफिल-पीएचडी में दाखिला सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर होता है। इसलिए हम लोग बहुत अलग नहीं करने जा रहे हैं। इसके अलावा हमारे दूसरे भी कार्यक्रम हैं- बीए, एमए। हमने उनमें दाखिले की प्रक्रिया नहीं बदली है। बदलाव सिर्फ एमफिल-पीएचडी में हुआ है।
सुशील राघव: जेएनयू बहुत से विद्यार्थी का सपना होता है। सीटें खत्म होने से उन्हें बहुत निराशा होगी। क्या उन्हें एक साल इंतजार करना पड़ेगा? जेएनयू इसके लिए क्या कर रहा है?
एम. जगदीश कुमार: हमने अपने शिक्षकों से कहा है कि आपके साथ जो वर्षों से तीस-चालीस विद्यार्थी काम कर रहे हैं, उन्हें जल्दी से काम पूरा करने को कहिए, ताकि नए विद्यार्थियों को जगह मिल सके। एकेडमिक काउंसिल में तय किया है कि इस साल इंटरव्यू दिसंबर में ही कर लेंगे। जुलाई तक इंतजार नहीं करेंगे। फिर हमने यह भी कहा है कि देखें कि किस प्रोफेसर के पास अधिकतम विद्यार्थी हैं। अभी हमने नई भर्तियों की प्रक्रिया शुरू कर दी है। नए अध्यापक आएंगे तो विद्यार्थियों के लिए अपने आप जगह बनेगी। एक साल के भीतर हम अधिक विद्यार्थियों को दाखिला दे सकेंगे, इसलिए चिंता करने की जरूरत नहीं है।
पारुल शर्मा: आपने जेएनयू में वॉल आॅफ हीरोज बनाई है, उसकी क्या जरूरत पड़ गई?
एम. जगदीश कुमार: वहां सिर्फ हमारे सेना के शहीदों की तस्वीरें लगी हैं। उन्होंने हमारे लिए अपनी जिंदगी गंवाई है, तो उनके त्याग को याद करने के लिए इतना तो करना बनता है। उनके प्रति सम्मान जाहिर करने के मकसद से ऐसा मैंने किया।

सूर्यनाथ सिंह: आप पर सरकार का कितना दबाव है?
एम. जगदीश कुमार: कोई दबाव नहीं है। मुझे पूरी आजादी है।

रूबी कुमारी: उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे आए तो आपने जो ट्वीट किया, उस पर काफी विवाद हुआ। एक कुलपति के रूप में वैसा ट्वीट कितना उचित था?
जगदीश कुमार: कुलपति आम नागरिक से अलग नहीं है। ऐसा ट्वीट करने का अधिकार सबको होना चाहिए। आप दुबारा मेरा ट्वीट पढ़िए, उसमें यूपी चुनाव का कोई जिक्र है क्या?

राजेंद्र राजन: विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने अपने कैंपस खोलने की इजाजत होनी चाहिए या नहीं?
एम. जगदीश कुमार: अभी जैसा कि मैंने आपको बताया कि हमें इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को शिक्षा देने की जरूरत है। अगर हम उन्हें शिक्षा नहीं दे पाएंगे तो क्या होगा? बच्चे बैंक से लोन लेंगे और पढ़ने के लिए विदेश जाएंगे। वह पैसा किसी दूसरी यूनिवर्सिटी को जाएगा। इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि इस प्रक्रिया को कम किया जाए। भारत में नए विश्वविद्यालयों के लिए जगह बनानी पड़ेगी। उद्योगपति पैसा लगा कर खोल सकते हैं, कोई विदेशी विश्वविद्यालय आकर खोलना चाहे तो खोल सकता है। मगर उसका मकसद अच्छी शिक्षा देना होना चाहिए, न कि पैसा बनाना।

 

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

मोदी सरकार के 3 साल: लेकिन इन 5 मोर्चों पर सरकार रही फेल

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. M
    manish agrawal
    May 28, 2017 at 8:19 am
    जहन्नुम मैं जाएJNU की International Ranking . JNU देश-द्रोही एक्टिविटीज का epicenter हो गया है! JNU ने एक झूठ फैला रखा है की वहां के लोग बहुत intellectual हैं, ऐसा कुछ भी नहीं है, हाँ, यदि देश-विरोधी करना intellectual होने की निशानी है तो बात अलग है ! हिन्दोस्तान के टैक्स पयेर्स का hard earned money, देश-द्रोहियों पर खर्च करके Govt न जाने क्यों इतना गौरव महसूस करती है ? JNU को बंद कर देना चाहिए, कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्युकी हमारी Govt ने गली गली मैं IIM IIT, NIIT , AIIMS खोल दिए हैं जो "Excellent Higher Education" के लिए काफी हैं यदि JNU चालु ही रखनी है तो इंडियन आर्मी के किसी मेजर रैंक के अफसर को वहां का वाईस चांसलर बनाना चाहिए और उसको हुक्म होना चाहिए की यदि कोई भी स्टाफ मेंबर या स्टूडेंट देशद्रोही गतिबिधि मैं संलिप्त पाया जाए तो कोर्ट मार्शल करके, तत्काल से उड़ा दे
    Reply
    1. S
      SAJIV VAJAPAYEE
      May 28, 2017 at 10:37 am
      VERRY GOOD
      Reply
    सबरंग