ताज़ा खबर
 

वक्त की नब्ज- कुपोषण से लड़ने की जरूरत

संतोषी की मां ने बार-बार कहा कि उसकी बेटी मरते दम तक चावल मांग रही थी, लेकिन एक लाचार, गरीब महिला की कौन सुनेगा, जब आला अधिकारी कुछ और कह रहे हैं।
Author October 22, 2017 03:35 am
संतोषी का परिवार सरकार की पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन स्कीम के तहत राशन लेता था।

झरखंड की बेटी संतोषी कुमारी की मौत भूख से नहीं हुई, क्योंकि अपने भारत महान में किसी को भूख से मरने का अधिकार नहीं है। सो, जब इस ग्यारह साल की बच्ची के मरने की खबर अखबारों में छपी, झारखंड सरकार के अफसर लग गए साबित करने में कि संतोषी की मौत का कारण मलेरिया था। संतोषी की मां ने बार-बार कहा कि उसकी बेटी मरते दम तक चावल मांग रही थी, लेकिन एक लाचार, गरीब महिला की कौन सुनेगा, जब आला अधिकारी कुछ और कह रहे हैं। संतोषी की मां ने पत्रकारों को यह भी बताया कि डेढ़ महीने से घर में न चावल का एक दाना आया था न गेहूं, क्योंकि उसके पास आधार कार्ड न होने की वजह से राशन की दुकान ने उसको सस्ते में अनाज नहीं दिया था। इस बात का भी खंडन सरकारी अधिकारियों ने डट कर किया। कुछ दिनों तक संतोषी की मौत की खबर सुर्खियों में रही, फिर पत्रकारों का ध्यान कहीं और गया और झारखंड सरकार ने जांच समिति की घोषणा करके उस बदकिस्मत बच्ची की मौत को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

मैंने बच्चों को भूख से मरते देखा है महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में और ओड़िशा के कालाहांडी में, सो कह सकती हूं कि इससे ज्यादा दर्दनाक दृश्य मैंने कभी नहीं देखा है। भूख से मौत आती है तड़पा-तड़पा कर, धीरे-धीरे। अंतिम क्षणों में बच्चों का हाल इतना बुरा हो जाता है कि न वे उठ सकते हैं, न बोल सकते हैं और पानी भी मुश्किल से पीते हैं। कमजोरी की इस हालत में कोई न कोई बीमारी तो लग ही जाती है और सरकारी अधिकारी झट से इस बीमारी को कारण बता देते हैं बच्चे की मौत का। भूख से मरने का हक इसलिए नहीं है किसी भारतीय बच्चे को, क्योंकि उनके पालन-पोषण में अरबों-खरबों रुपए खर्चे गए हैं समाजवादी नीतियों के तहत। बड़ी-बड़ी योजनाएं बनी हैं, जिनको संभालते हैं लाखों सरकारी अधिकारी और कई हजार सरकारी विभाग। सो, इन योजनाओं को अगर कोई बेकार कह कर बंद कर दे तो सरकारी दफ्तरों में बेरोजगार हो जाएंगे ऐसे लोग, जिनको कहीं और नौकरी नहीं मिल सकती है।
नरेंद्र मोदी के ‘न्यू इंडिया’ में लेकिन समय आ गया है इन महान योजनाओं को बंद करके नए सिरे से गरीबों को राहत पहुंचाने का। समय आ गया है स्वीकार करने का कि आइसीडीएस (एकीकृत बाल विकास योजना) जैसी योजनाओं को कूड़ेदान में फेंकने की जरूरत है। इस योजना को शुरू किया था इंदिरा गांधी ने 1975 में इस मकसद से कि भारत के बच्चों के कल्याण के लिए यह सबसे बड़ी कोशिश होगी।

समय आ गया है स्वीकार करने का कि यह कोशिश नाकाम रही है। जमीनी तौर पर मैंने इस योजना को अमल में देखा है कई बार और इसके नियम इतने अजीब हैं कि यह कभी सफल हो ही नहीं सकती है। मसलन, नंदुरबार में जब सूखा पड़ा तो अकलकोवा शहर के सरकारी अस्पताल में मैंने पाया कि उन्हीं बच्चों को राहत मिल सकती थी, जो मरने वाले थे। उनको अस्पताल में दाखिल करके आइसीडीएस के तहत चालीस रुपए का पोषण दिया जाता था, लेकिन उनका हाल जब थोड़ा अच्छा हो जाता था, तो उनको वापस ऐसे घरों में भेजा जाता था, जहां पूरे परिवार के लिए दिन में दस रुपए ही खर्चने की क्षमता थी खाने-पीने पर। बच्चे को फिर से एक ही वक्त खाना मिलने लगता था और वह भी पतली खिचड़ी।

देहातों में आइसीडीएस के बदले अगर एक वक्त भरपूर खाना उपलब्ध कराया जाता तो बच्चों का हाल बेहतर होता। यह काम अकलकोवा की एक इस्लामी संस्था कर रही थी उन गांवों में, जो शहर के आसपास थे। इस संस्था से विद्यार्थियों का एक जत्था पका हुआ खाना लेकर रोज उन गांवों में बांटने जाता था, जहां सूखे से फसलें बर्बाद हो गई थीं। आइसीडीएस के अरबों-खरबों रुपयों से अगर मोदी गांवों में सिर्फ अम्मा कैंटीन खोलने का काम करते हैं, तो 2019 में उनकी जीत पक्की होगी। अम्मा कैंटीन तमिलनाडु में दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता ने खोली थी और इसके चलते आम लोगों का जीवन बिलकुल बदल गया था।
देहातों में कुपोषण खत्म करने के लिए मोदी बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन पहले उनको स्वीकार करना होगा कि कांग्रेस दौर की आइसीडीएस जैसी योजनाएं बिलकुल बेकार साबित हुई हैं। मोदी की समस्या यह है कि उन्होंने अपने आला अधिकारियों पर इतना विश्वास किया है कि उनके समर्थक भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री पर इन अधिकारियों का पूरा कब्जा है और इन्होंने कभी परिवर्तन होने नहीं दिया। ये ऐसे लोग हैं, जो परिवर्तन शब्द से डरते हैं, क्योंकि उनको अपने अधिकार और ताकत खो देने की चिंता हमेशा रहती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मोदी अगर अपने अधिकारियों के चंगुल में न फंसे होते तो अभी तक उन्होंने आइसीडीएस जैसी योजनाओं को बहुत पहले ही रद्द कर दिया होता।

अपने कार्यकाल के शुरू में उन्होंने खुद मनरेगा का विरोध किया था लोकसभा में, लेकिन इसके बाद मालूम नहीं क्यों उन्होंने उसी मनरेगा का बजट बढ़ा दिया था। मनरेगा और आइसीडीएस एक ही तरह की योजनाएं हैं और नाकाम रही हैं एक ही कारण से। ऐसी योजनाओं का असली लाभ अधिकारियों को मिलता है, उन गरीबों को नहीं, जिनके नाम पर ये बनाई जाती हैं। इन विशाल योजनाओं को चलाने के लिए नए-नए सरकारी विभाग बनाए जाते हैं, जिनमें सरकारी अफसरों के लिए रोजगार के नए-नए अवसर पैदा होते हैं और इन्हीं चीजों पर योजना का ज्यादा पैसा खर्च किया जाता है। गरीबों तक इतना थोड़ा पैसा पहुंचता है कि न के बराबर। इस बात को सब जानते हैं, लेकिन इन योजनाओं को बंद करने की हिम्मत किसी प्रधानमंत्री ने नहीं दिखाई है अभी तक।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.