December 04, 2016

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प्रसंग: बच्चे का कमरा

कुछ साल पहले स्विटजरलैंड गई थी। तब बेटे के दोस्त के घर जाना हुआ। उसकी बच्ची का जन्म कुछ दिन पहले ही हुआ था।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

कुछ साल पहले स्विटजरलैंड गई थी। तब बेटे के दोस्त के घर जाना हुआ। उसकी बच्ची का जन्म कुछ दिन पहले ही हुआ था। उसे देखने गई। जब कहा कि बच्ची को देखना है, तो मुझे एक बड़े कमरे में ले जाया गया। वहां पालने में बच्ची सो रही थी। दोस्त की पत्नी ने बताया कि यही बच्ची का कमरा है। तो क्या वह रात में भी यहां अकेली सोती है, तो उसने कहा- हां। साथ में यह भी जोड़ा कि सरकारी अधिकारी चैक करने आते हैं कि बच्चे का अलग कमरा है या नहीं। क्योंकि इनका मानना है कि माता-पिता के पास सोने से बच्चे के दब कर मर जाने का खतरा रहता है। अधिकतर यूरोपीय देशों में बच्चे का अलग कमरा होना जरूरी है। उसकी बात सुन कर दहशत-सी हुई थी। मान लो, रात को बच्ची को कोई तकलीफ हो, उसके साथ कोई दुर्घटना हो जाए, उसे तेज बुखार आ जाए, तो अपने कमरे में सोए माता-पिता को पता ही नहीं चलेगा।

इसके पीछे सोच शायद यह है कि बच्चे को पैदा होते ही स्वतंत्र बनाना है। उसके अधिकारों की बात तो है, मगर उसकी भावनात्मक मजबूती की बात कहीं होती ही नहीं है। बच्चे के लिए ढेर सारे खिलौने मौजूद हैं। एक से एक बढ़िया ब्रांड के कपड़े हैं। उसके लिए बढ़िया बिस्तर और आकर्षक रंगों से सजा-सजाया कमरा है। हमारे यहां भी इस विचार को किसी आदर्श की तरह पेश किया जाने लगा है कि बच्चे का अलग कमरा होना चाहिए, उसे माता-पिता से अलग दूसरे कमरे में सोना चाहिए। मगर क्या सिर्फ महंगे खिलौनों, कपड़ों, सजे-सजाए कमरे और सबसे बड़े स्कूल में पढ़ाने भर से बच्चे का मानसिक और भावनात्मक पोषण और जरूरतें पूरी हो सकती हैं। मां से बच्चे का जो नाभि-नाल संबंध है, उसे माता-पिता की आनंद इच्छाओं के सामने बिल्कुल भुला दिया गया है। बच्चा माता-पिता के पास सोते हुए कितना सुरक्षित महसूस करता है, इस पर ध्यान देने की कोई जरूरत ही नहीं समझी जाती।

जबकि अपने यहां न केवल माताएं, बल्कि दादी-नानियां बच्चे को अपने पेट पर सुलाए रखती थीं और बच्चा मजे से सोता रहता था। इन बातों को अज्ञान के खाते में डाल दिया गया। आज इन्हीं पश्चिमी देशों के शोध बता रहे हैं कि अगर बच्चा जन्मते ही मां के दिल के पास रहता है, तो वह जीवन भर भावनात्मक रूप से मजबूत रहता है। हमने देखा है कि मां और पिता की गोद का महत्त्व यों ही नहीं है। बच्चा मां की खुशबू पहचानता है, इसीलिए कितना भी रो रहा हो, गोद में आते ही चुप हो जाता है। मां अगर बच्चे को पीटे भी तो भी बच्चा रोते हुए, उसी की ओर दौड़ता है। इस प्रसंग में शिव पुराण की एक कथा याद आती है, जो मां-बच्चे के रिश्ते को परिभाषित करती है। इसमें जब शिव गणेश का सिर काट देते हैं और फिर उन्हें जीवित करना चाहते हैं, तो वे अपने सेवक से कहते हैं कि उस बच्चे का सिर काट लाओ, जिसकी मां उसकी तरफ पीठ करके सोई हो। यानी कि बच्चा मां की आंखों के सामने न हो। बच्चे के साथ क्या हुआ, यह मां को पता ही न चले, क्योंकि उसकी बच्चे की ओर पीठ है। वह बच्चे से दूर है। और इसी तरह सोती हुई एक हथिनी के बच्चे का सिर काट लिया जाता है। और गणेश की गरदन के ऊपर लगा दिया जाता है।

इस कहानी से यह भी पता चलता है कि न केवल मनुष्य, बल्कि जानवरों में भी मां के स्पर्श, उसकी नजदीकी, उसकी देखभाल का काफी महत्त्व है। हम देखते भी हैं कि अगर बिल्ली के बच्चे उसके आसपास हैं तो भी वह अपनी पूंछ के सहारे, उसके स्पर्श भर से बच्चों की गतिविधियों के बारे में जानती रहती है। बच्चे बिल्ली, गाय या शेरनी के आसपास ही सोए रहते हैं। हाल ही में अमेरिका में एक शोध में बताया गया है कि बच्चे को अपने जीवन के पहले साल में उसी कमरे में सोना चाहिए, जिसमें माता-पिता सोते हैं। इससे अकेलेपन में मृत्यु से बचा जा सकता है।  यह रिसर्च कुछ भी कहे, इन दिनों प्राकृतिक नियम और रिश्तों को भी अधिकारों के शोर में भुलाने का दौर चल पड़ा है या कि उसे शोषणकारी माना जाने लगा है। कोख औरत की सबसे बड़ी शत्रु है, इस विचार के सबसे बड़े शिकार आजकल बच्चे ही बन रहे हैं।

पिछले दिनों, एक बड़े बहुराष्ट्रीय निगम में काम करने वाली लड़की ने एक दिन बताया कि उसके साथ काम करने वाली एक लड़की का डेढ़ साल का बच्चा है। वह जब काम पर जाती है, तो पीछे से बच्चा अपने दादा-दादी के पास रहता है। यह युवा मां बहुत गर्व से कहती है कि उसे अपने बच्चे से जरा-सा भी लगाव नहीं है। वह तो जबसे पैदा हुआ है, परेशान ही करता रहता है। जब देखो, बीमार ही पड़ा रहता है। वह अक्सर उसे छोड़ कर पति के साथ घूमने लंबी छुट्टी पर विदेश चली जाती है। उसका कहना है कि हफ्ते भर काम करने के बाद उसके पास छुट्टी वाले दिन भी बच्चे को देखने का अधिक समय नहीं रहता। बच्चे या घर के कामकाज करना उसके वश की बात नहीं है।  इन्हीं लड़कियों के साथ काम करने वाली एक और लड़की जल्दी ही मां बनने वाली है। वह भी कहती है कि बच्चे के जन्म के बाद उसकी आफत आने वाली है। इनकी बातें सुन कर ऐसा लगता है कि बच्चे का जन्म कोई खुशी नहीं, कितनी बड़ी मुसीबत लाने वाला है।

बच्चे का जन्म आज के माता-पिता के सुख-साधन में रोड़ा बनता है। उनकी आजादी में बाधा बनता है, इसलिए वे उसे भार की तरह मानते हैं। उसकी जिम्मेदारी उठाने से भागते हैं। सोचिए कि अगर माता-पिता ही बच्चे के बारे में ऐसा सोच रहे हैं, तो बच्चा कितना अकेला होगा। ऐसा बच्चा अपनी जरूरतों के लिए किसके सहारे बड़ा होगा। बड़ा होकर वह कैसा नागरिक बनेगा। मगर वर्तमान और सिर्फ आज में जीने वालों के लिए भविष्य का शायद कोई मायने ही नहीं।  जैसे-जैसे समय बीता है, विकास की बातें हुई हैं, माता-पिता अपनी-अपनी नौकरियों और करिअर में ज्यादा से ज्यादा व्यस्त होते गए हैं। जितना उनके पास समय कम हुआ है, उसी अनुपात में बच्चा पीछे छूटता गया है। अपनी उपेक्षा को वह बता भी नहीं सकता, इसलिए उसकी ओर ध्यान भी नहीं जाता। ऊपर जिस बच्चे का जिक्र किया गया है कि वह अपने दादा-दादी के पास रहता है, बढ़ते जा रहे एकल परिवारों में तो अधिकतर बच्चों के पास यह सुविधा भी मौजूद नहीं है। माता-पिता के लौटने के इंतजार में या तो वे डे केयर सेंटर में रहते हैं या फिर आयाओं के भरोसे। और अफसोस, न तो अच्छे डे केयर सेंटर्स मौजूद हैं, न वे बहुतायत में हैं। अच्छी प्रोफशनल आयाओं की भी बेहद कमी है। अगर ऐसा हो भी तो बच्चे के लिए मां, पिता और परिवार की जगह को कोई नहीं भर सकता।
शायद यही कारण है कि आज दो-तीन साल के बच्चे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हड्डियों के तमाम रोगों और अवसाद के शिकार हो रहे हैं। वे संगठन, जो रात-दिन बच्चों के अधिकारों की बातें करते हैं उन्हें बच्चों की भावनात्मक जरूरतों को पूरा करने के बारे में जरूर आवाज उठानी चाहिए।

 

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First Published on October 30, 2016 5:16 am

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