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स्त्री विमर्श: घर और स्त्री

इस तरह के प्रश्नों में वह सारी सामाजिक प्रक्रिया छिपी हुई है, जिसके तहत माना जाता है कि एक स्त्री साम, दाम, दंड, भेद से काम लेते हुए परिवार और समाज में अस्तित्व रक्षा करती है।
Author नई दिल्ली | November 13, 2016 03:16 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

घर एक स्त्रीवाची अवधारणा है। घर की पूरी संरचना में स्त्री निहित होती है। उसका श्रम, उसकी ऊर्जा, कौशल, भावनाएं सब घर को केंद्रित करके विकसित होती हैं। स्त्री के समाजीकरण की प्रक्रिया में घर का संबंध नाभिनालबद्ध तरीके से विकसित किया जाता है। वह घर, जहां वह जन्म लेती है और जहां उसके स्त्री बनाने के कार्यक्रम की शुरुआत होती है, उसके पिता या संरक्षक का होता है। ‘घर’ के साथ जुड़ा जो पहला अर्थ स्त्री सीखती है, वह है सुरक्षा। सुरक्षित जगह की जरूरत सभी प्राणियों को होती है, मनुष्य को और भी। वह घर से सुरक्षा ही नहीं, आराम, प्यार, अपनापन आदि भी चाहता है। लेकिन ‘घर’ से जुड़ी इन सारी सामाजिक, भौतिक सुविधाओं से जुड़ी और भावनात्मक व्युत्पत्तियोंवाले शब्दों का शिशु अवस्था से बाहर आते ही, लड़का और लड़की के लिए अर्थ बदल जाते हैं। लड़की के ‘सुरक्षा’ के मायने संभावित यौनिक हमलों से जुड़ जाते हैं। लड़के के समाजीकरण की प्रक्रिया में ‘घर’ की भूमिका घटती चली जाती है और लड़की के समाजीकरण की प्रक्रिया में बढ़ती जाती है।

पिता या संरक्षक का घर, अविवाहित लड़की का घर नहीं होता। उसकी तमाम गतिविधियों के केंद्र में एक ऐसा ‘भविष्य में मिलने वाला घर’ होता है, जो उसके भावी पति का है और विवाह के बाद उसका भी होगा। क्या इस बात की पुष्टि की जा सकती है कि घर को त्यागने या छूट जाने का बोध लड़की के मन में सुरक्षा की जगह भय और असुरक्षा का भाव नहीं पैदा करता होगा- हम बार-बार यौनिक हिंसा के संदर्भ में कहते हैं कि लड़की आज घर में ही सबसे ज्यादा असुरक्षित है। फिर ‘घर’ की संरचना लड़की के लिए सुरक्षा की संरचना है, ऐसा कैसे कह सकते हैं और इसके आधार पर लड़की के स्त्री बनाए जाने के समस्त घरेलू प्रशिक्षण को वैध कैसे ठहरा सकते हैं?

घर को अक्सर औरत से जोड़ दिया जाता है। घर औरत का होता है। औरत ही उसकी देखभाल, साज-संभाल करती है। लेकिन औरत का घर नहीं होता! वह घर की सबसे अस्थायी मेहमान है। घर अगर औरत का होता है, तो पूछा ही जाना जाहिए कि किस औरत का घर होता है। जवाब मिलेगा विवाहित औरत का घर होता है। विवाह के बाद ही पति का ‘घर’ स्त्री को ‘घर’ के रूप में मिलता है।  ‘घर’ को स्त्री के संदर्भ में इस तरह से समाजीकृत किया गया है कि आज के दौर की सशक्त, पढ़ी-लिखी आधुनिक स्त्री से सहज ही सवाल पूछ लिया जाता है कि आपने करिअर, परिवार और बच्चों के दायित्व के बीच सामंजस्य कैसे बिठाया, जबकि सशक्त, पढ़े-लिखे आधुनिक पुरुष से कभी किसी साक्षात्कार या अन्य प्रसंग में यह सवाल नहीं पूछा जाता। औरतें भी ऐसे सवालों को अपने करिअर से जुड़े सवालों की तरह सामाजिक उपलब्धि में जोड़ लेती हैं। कहीं न कहीं इससे उनका अहं तुष्ट होता है कि वे विवाह, परिवार, संतति और अपने करिअर के बीच सामंजस्य बिठा सकीं और यह सब बहुत बहादुरी का काम था!

अच्छी स्त्री वह है जो सामंजस्य बिठाए, उसे सबको साधना आना चाहिए। ध्यान रहे, ‘साधना’ कौशल का काम है, जिसमें चालाकी और अवसरवादिता दोनों शामिल हैं। मौका साधना, काम साधना आदि शब्द युग्म प्रचलन में हैं। लेकिन स्त्री के संबंध में इस तरह के सवाल प्रचलन में होते हैं कि ‘आपने एक साथ घर, परिवार, करिअर को कैसे साधा?’ स्पष्ट है कि स्त्री की जिस सांस्कृतिक-सामाजिक छवि का निर्माण हुआ है, उसमें उसके चरित्र और योग्यता को हमेशा संदेह के दायरे में रखा गया है। इस तरह के प्रश्नों में वह सारी सामाजिक प्रक्रिया छिपी हुई है, जिसके तहत माना जाता है कि एक स्त्री साम, दाम, दंड, भेद से काम लेते हुए परिवार और समाज में अस्तित्व रक्षा करती है।

घर-परिवार और उसकी दुश्वारियों से जुड़े सवाल उस स्त्री से नहीं पूछे जाते, जिसने विवाह न किया हो। मान लिया जाता है कि जिसने विवाह नहीं किया, उसका ‘घर’ भी नहीं होगा! ‘घर की दुश्वारियां’ भी नहीं होंगीं और पारिवारिक जिम्मेदारियां तो होंगी ही नहीं, क्योंकि जिम्मेदारियां तो विवाह के बाद ही आती हैं! कहीं न कहीं यह अवधारणा भी काम करती है कि जिम्मेदार औरतें विवाह करके जिम्मेदारियां उठाती हैं और गैर-जिम्मेदार औरतें विवाह नहीं करतीं, स्वछंद होती हैं। यानी घर-परिवार के प्रसंग में औरत की प्रशंसा में यह बात छिपे तौर पर शामिल है कि घर उसी का हो सकता है या घर की जिम्मेदारियां और काम उसी के हो सकते हैं, जो औरत विवाहिता है! विवाह के बगैर घर नहीं हो सकता!

‘घरवाला’ और ‘घरवाली’ के अर्थ को खोलें तो पाएंगे कि पति घरवाला है और पत्नी उसकी विवाहिता होने के नाते घरवाली! घर के भौतिक रूप से होने या न होने की स्थिति से इन शब्दों के अर्थ नहीं बदल रहे। शब्दों के समाजीकरण की प्रक्रिया इस प्रकार पुरुष-केंद्रिक ढंग से विकसित की गई है कि एक ‘सिंगल’ या अविवाहित स्त्री अगर घर क्रय करती है तब भी वह भाषिक अर्थ में ‘घरवाली’ नहीं कहलाती। जिसके पास घर है वह घरवाली नहीं, बल्कि पुरुष के संदर्भ में विवाहिता स्त्री घरवाली होगी। ऐसे दैनंदिन अनुभवों का भाषा में महिमामंडन स्त्री के लिए घर को एक जगह के रूप में और संकुचित कर देता है। ‘घर’ का अर्थ आधुनिक कंस्ट्रक्शन कंपनियों और इंटीरियर डिजाइनिंग के व्यवसायियों के लिए सतह पर अलग दिखाई देता है। वे ऐसे ‘सुंदर घर’ की बात करते हैं, जिसके हर कोने से प्यार हो जाए। वे एक सुंदर घर की बात करते हैं, जहां दिन भर के काम से थक कर आने वाला, और कभी-कभी आने वाली भी, केवल ‘आनंद’ के उपभोग की कामना करता है। जहां कोई तनाव नहीं, किसी तरह के द्वंद्व के लिए जगह नहीं, किसी तरह की बहस नहीं।

जनमाध्यमों में घर को एक बड़े स्पेस की तरह दिखाया जाता है। धारावाहिकों और सिनेमा में दिखाए जाने वाले घर हवेलीनुमा, साजसज्जा में भव्य और विशाल आकार के होते हैं। आकार की विशालता, घर की चेतना का एक आम प्रक्षेपण है। घर के संदर्भ से जुड़े अन्य विचार को साज-सज्जा की भव्यता में छिपा दिया जाता है। लेकिन यह विशालता और भव्यता ‘घर’ के संदर्भ में किसी आधुनिक परिवर्तित अवधारणा को पेश नहीं करती। न ही इसमें परंपरित घर का वैचारिक संदर्भ बदलता है। परंपरित ‘घर’ को अगर स्त्री के संदर्भ में देखें तो वह स्त्री को स्त्री बनाए जाने का प्रशिक्षण केंद्र है, जो लड़की के विकास की स्वाभाविक स्थितियों को नियमित करके उसे सामाजिक जरूरत के हिसाब से ढालने का काम करता है।

एक समय जब गृहिणी की अस्मिता का प्राधान्य था, गृहिणी के रूप में स्त्री की भूमिका सर्वोपरि थी। आज जब औरतें घर के बाहर विभिन्न क्षेत्रों में काम कर श्रेष्ठ उपलब्धियां हासिल कर रही हैं और इस कारण समाज में महत्त्वपूर्ण हैं तब भी उनसे उनकी गृहिणी की अस्मिता के संदर्भ में सवाल किया जाना और यह पूछना कि ‘घर बाहर कैसे साध लिया?’ जड़ सोच का परिचायक है। आधुनिक ‘घर’ की रूपरेखा बदली है, स्त्री और पुरुष की भूमिकाएं बदली हैं।

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