December 05, 2016

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मंच की नई रंगभाषा

हिंदी में पहले और हाल तक नाट्य लेखन पारंपरिक तरीके से होता था- यानी नायक, प्रतिनायक, खलनायक, दोस्त-दुश्मन आदि।

Author November 20, 2016 03:53 am
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सत्यदेव त्रिपाठी

भारतीय रंगमंच आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से वह अपना अवसान और अभ्युदय साथ-साथ देख सकता है। अवसान इस रूप में कि इस समय रंगमंच में कोई बड़ी उपस्थिति नहीं है, न कोई बड़ा महाआख्यान (मेगा नरेटिव )। अभ्युदय इस रूप में कि युवा रंगकर्मियों की बड़ी जमात ने नाटककार की मृत्यु की घोषणा के साथ प्रस्तुति को ही अपना पाठ मान लिया है। ऐसा इसलिए नहीं है कि युवा रंगकर्मी पोलैंड के ग्रोटोस्की स्कूल, जर्मनी की देहभाषा तकनीक या पेरिस, लंदन, न्यूयार्क की रंगशालाओं से प्रभावित हैं, जैसा कि अक्सर कहा जाता है। ऐसा इसलिए है कि वे आज के जटिल समय में फंतासी से भी अधिक नाटकीय बन चुके यथार्थ के बरक्स अपनी नई रंगभाषा रच रहे हैं। यह रंगभाषा ठेठ देसज है, लेकिन उसकी विषय-वस्तु वैश्विक है।

दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, कोलकाता, बंगलुरू और त्रिशूर के नाट्य विद्यालयों से प्रशिक्षित युवा रंगकर्मियों की इस नई जमात ने परंपरा का बोझ उतार फेंका है। अभिलाष पिल्लई, शांतनु बोस, दीपन शिवरामन, जुलेखा चौधरी, राजकुमार रजक, राजेश सिंह, रणधीर कुमार, प्रवीण कुमार, गुंजन पुंज प्रकाश, व्योमेश शुक्ल, हैपी रंजीत साहू, ज्योति डोगरा, टी शीलादेवी, रबिजिता गोगोई जैसे सैकड़ों नाम यहां गिनाए जा सकते हैं, जो भविष्य के रंगमंच का सौंदर्यशास्त्र रच रहे हैं। ऐसा इसलिए भी हो रहा है कि 1861 में किर्लोसकर द्वारा भारत की पहली आधुनिक रंगमंडली बनाने से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक पिछले एक सौ साठ सालों में लोकशास्त्रीय, क्लासिकल, संस्कृत, पारंपरिक, राजनीतिक, सामाजिक, नुक्कड़, स्त्रीवादी, संगीत प्रधान, दलित, आदिवासी, जनजातीय आदि सारे दौर, सारे प्रयोग बीत चुके हैं।

सत्तर के दशक मे रंगमंच में भारतीयता का नारा दिया गया और मोहन राकेश, गिरीश कर्नाड, शंभु मित्र और विजय तेंदुलकर उभर कर सामने आए। हबीब तनवीर, श्यामानंद जालान, पुरुषोत्तम लक्ष्मण देशपांडे, जब्बार पटेल, विजया मेहता, कावलम नारायण पणिक्कर, इब्राहीम अलकाजी, बव कारंत, कन्हाईलाल, रतन थियम आदि ने जिस भारतीय कहे गए रंगमंच की बुनियाद रखी, वह अब नेपथ्य में जाने की तैयारी में है। रंजीत कपूर, एमके रैना, बंसी कौल, प्रसन्ना, भानु भारती, देवेंद्र राज अंकुर, रामगोपाल बजाज आदि का रंगकर्म भी अब थकने लगा है। जिस इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) का कभी ऐतिहासिक योगदान माना जाता था, उसके पास भी कोई एक ऐसा नाटक नहीं है जिसे देख कर खुश हुआ जा सके। हम कभी नीलम मान सिंह, चौधरी उषा गांगुली, अनुराधा कपूर, त्रिपुरारी शर्मा, अमाल अल्लाना, नादिरा जहीर बब्बर, बी जयश्री आदि के नाम गिनाते थकते नही थे उनकी विरासत संभालने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई देता। सुरेखा सीकरी और उत्तरा बावकर के बाद किसी अभिनेत्री का नाम लेना पड़े, तो दिमाग पर जोर डालना पड़ता है।
आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसका मतलब यह नहीं है कि देश में नाटक ही नहीं हो पा रहा है। अब भी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलुरू से लेकर पटना, जयपुर, भोपाल, लखनऊ आदि शहरों में खूब नाटक हो रहे हैं, पर रंगमंच की कोई बड़ी उपस्थिति नहीं है। बंगाल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, असम और मणिपुर में अब पहले जैसा माहौल नहीं रहा, पर नाटक खूब हो रहा है।

हिंदी प्रदेशों में जरूर रंगमंच का अंधकार युग चल रहा है। भारत जैसे देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि रंगमंच का सारा वितान अदद एक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और संगीत नाटक अकादेमी तक सिमट जाए। एक विडंबना देखिए कि यह विद्यालय अपने एक छात्र पर तीन साल में लगभग तीन करोड़ रुपए खर्च करता है। इसके बावजूद पिछले बीस-पच्चीस सालों में हम एक नाम ऐसा नहीं गिना सकते, जिसने कोई बड़ी पहचान बनाई हो। आखिरी नाम इरफान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी का लिया जाता है, जिन्होंने कभी नाटक किया था, ऐसा किसी को याद नहीं है। नाटक से अब तक सबसे अधिक पैसा कमाने वाले फिरोज अब्बास खान का सुझाव गौर फरमाने लायक है कि रानावि पर हर साठ-पैंसठ करोड़ रुपए खर्च करने के बजाय रंगमंच में राष्ट्रीय प्रतिभा खोज अभियान चला कर हर साल सौ युवाओं को एक-एक करोड़ रुपए दे दिए जाएं, जिससे वे जीवन भर नाटक करते रहें। संगीत नाटक अकादेमी अब केवल पुरस्कार और अनुदान बांटने वाला दफ्तर बन कर रह गई है। किसी भी राज्य में रंगमंच से जुड़ी या तो कोई सरकारी संस्था ही नहीं है या लगभग निष्क्रिय है या उन पर वैसे अधिकारी काबिज हैं, जिन्हे रंगमंच से कुछ लेना-देना नहीं है। हिंदी पट्टी में रंगमंच का कोई व्यावसायिक ढांचा कभी बन ही नहीं पाया।

हिंदी में नए नाटक लगभग नहीं के बराबर हैं। एक तो पहले जैसे हिंदी के कवि, कथाकार, नाटक लिखते थे वह युग समाप्त हो गया। रंगमंच तेजी से बदल रहा है। याद नहीं आता कि हिंदी के पचास बड़े लेखकों में से नाटक देखने कोई कब गया था। अपनी लिखने की मेज पर बैठ नाटक लिखने का रिवाज अब नहीं रहा। अब मंडली के कलाकार निर्देशक के साथ मिल-बैठ कर प्रस्तुति प्रक्रिया के दौरान आलेख तैयार कर रहे हैं। अब उन्हें नाटककारों की जरूरत ही नहीं रही। आज का यथार्थ लगातार जटिल होता जा रहा है। अक्सर यह यथार्थ फैंटेसी या कल्पना को भी पीछे छोड़ दे रहा है। ऐसे में हिंदी लेखक आज भी पारंपरिक आख्यान शैली से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। अगर सर्वेक्षण कराया जाए, तो देश भर मे हिंदी के छोटे-बड़े हजारों अमंचित अप्रकाशित नाटक मिल जाएंगे, पर ये नाटक युवा रंगकर्मियों के किसी काम के नही हैं। दूसरी समस्या स्पेस की है। साठ-सत्तर करोड़ की हिंदी आबादी के लिए पूरे देश में हजार सभागार भी नहीं हैं। हिंदी में नाटक खेलना आर्थिक दृष्टि से भी लगातार मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे माहौल में कोई नाटक क्यों लिखे? अगर ध्यान से देखा जाए तो हिंदी रंगमंच का सारा पाठ ही आज अप्रासंगिक होता हुआ जान पड़ता है।

हिंदी में पहले और हाल तक नाट्य लेखन पारंपरिक तरीके से होता था- यानी नायक, प्रतिनायक, खलनायक, दोस्त-दुश्मन आदि। भूमंडलीकरण के बाद नई अर्थव्यवस्था में दुश्मन की पहचान धूमिल हो गई। अब एक व्यक्ति खलनायक नहीं रहा। अब हमारा सारा समय ही खलनायक के रूप में सामने खड़ा है। नाटक लिखने की यह बड़ी चुनौतीपूर्ण स्थिति है। जैसे भूषण भट्ट के नाटक ‘रावण’ में गांव का जमींदार मजदूरनी के साथ बलात्कार करता है। अब कोई जमींदार नहीं बचा, जो बलात्कार करता है। अब तो बलात्कारी गली-गली घूम रहे हैं। बलात्कार का अमीरी से कुछ नहीं लेना-देना। उसी तरह मोहन राकेश के सारे नाटक स्त्री-विरोधी ठहराए जा सकते हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का नाटक ‘बकरी’ या शंकर शेष का ‘पोस्टर’ भी आज पुराना पड़ चुका है। आज हिंदी में कोई नाटक हिंदी समय और समाज के बहुस्तरीय जटिल यथार्थ को बताने में समर्थ नहीं हो पा रहा है। इसलिए रंगमंडलियां मराठी, बंगाली, गुजराती, संस्कृत, नाटकों या कहानी-उपन्यासों की ओर मुड़ रही हैं, हालांकि वहां भी कोई बड़ा आलेख दिखाई नहीं देता। अमेरिकी यूरोपीय नाटकों की ओर अब भी आकर्षण बना हुआ है। हिंदी का आखिरी मौलिक और बड़ा नाटक, जो देश भर में मंचित-चर्चित हुआ, वह था मच्छिंद मोरे लिखित ‘जानेमन’ (2002), जिसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के साथ वामन केंद्रे ने खेला था।

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First Published on November 20, 2016 3:53 am

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