ताज़ा खबर
 

चर्चा- श्रम और संघर्ष का स्वर

मध्यकालीन अभिरुचि संपन्न और वाद के विमर्शवादी छोटे रास्ते से पैदा होने वाले चिंतकों-विचारकों के लिए मुक्तिबोध की कविताएं समस्या पैदा करती हैं।
Author August 13, 2017 05:29 am
प्रतीकात्मक चित्र।

राजेश मल्ल

आज जब समाज की बेहतर समझ के लिए हिंदी कविता का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उद्धरणीय अंश मुक्तिबोध की कविताएं और उनका लेखन है, उन्हें रूपवादी, कलावादी और कठिन कवि कह कर हल्ला बोलना, विवाद में खींच लेना क्या आलोचकीय दृष्टि और बौद्धिकता की दरिद्रता है या कोई षड्यंत्र! नासमझी है या सत्य के बहाने अपने आप को स्थापित करने की कुचेष्टा। इसे कैसे समझा और देखा जाए। यह क्यों हुआ? कैसे हुआ? पिछले दिनों इसी प्रकार हिंदी के कई बड़े कवि इसी तरह निशाने पर रहे, लेकिन मुक्तिबोध पर हमला उन्हें इस मुकाम पर ले आया है कि उनके द्वारा उठाए जा रहे तर्कों को समझा जाए और यथासंभव उत्तर भी दिया जाए।  इस विवाद की शुरुआत मुक्तिबोध की कविताओं में स्त्री, दलित, अल्पसंख्यक विमर्श की अनुपस्थिति की चिंता से शुरू हुई और कुछ ‘लोकधर्मी’ आलोचकों द्वारा कठिन, कलावादी, जनता के बीच कम संप्रेषणीय आदि कह कर उन्हें जनपक्षधर कवियों की सूची से बाहर करने का प्रस्ताव किया गया। मुक्तिबोध के साथ शमशेर बहादुर सिंह भी प्रश्नांकित हुए। इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि यह मुक्तिबोध का जन्म शताब्दी वर्ष है और ढेर सारे आयोजन, पत्रिकाओं के मुक्तिबोध विशेषांक और गोष्ठी-सेमिनार हुए। मजेदार है और आश्चर्यजनक भी कि जहां ज्यादातर लोग मुक्तिबोध की जरूरत को रेखांकित करते रहे, वहीं एक समूह ने मुक्तिबोध की जनपक्षधरता को प्रश्नांकित कर उन्हें प्रगतिशील आंदोलन से बाहर करने की कोशिश की या कर रहा है।

मुक्तिबोध की कविताओं पर यह पहली बार नहीं हुआ है। मध्यकालीन अभिरुचि संपन्न और वाद के विमर्शवादी छोटे रास्ते से पैदा होने वाले चिंतकों-विचारकों के लिए मुक्तिबोध की कविताएं समस्या पैदा करती हैं। कुछ एक प्रगतिशील विचारक, जो कविता से ज्यादा काव्येतर संदर्भों के प्रस्तोता व्याख्याता हैं, उनके लिए भी मुक्तिबोध, शमशेर जटिल-कठिन होते हैं या बनाए गए हैं। यह समझ कुछ नासमझी और गैर-जिम्मेदारी की है, तो कुटिल और षड्यंत्रकारी भी। क्यों नहीं समझ में आते हैं मुक्तिबोध? इस प्रश्न का उत्तर बिल्कुल सीधा और सरल है। क्योंकि उनको समझने के क्रम में आप और आपका जीवन खुद प्रश्नों के दायरे में घिर जाता है। वे आपको ही निशाने पर ले लेते हैं। ‘लिया बहुत बहुत दिया कम’। उन्नति के शिखरों पर पहुंचने की हड़बड़ी, विलायती फर्नीचर रखने की आपकी चाहत को वे बेपर्दा करने लगते हैं। तब आप समझ कर भी नासमझी का नाटक करने लगते हैं। जागते हुए भी सोने का नाटक करने लगते हैं। चलते हुए रंदे का दर्द सहने की क्षमता नहीं है, तो मुक्तिबोध आपके लिए कठिन भी हैं और समस्या भी। दूसरी बात संप्रेषणीयता या कला की। वह भी प्रसंग की ओर मोड़ देने से ही पैदा हुई है। क्योंकि सत्ता-पंूजी-शोषण की बांट से प्रकट आधुनिक समझ को न आप समझना चाहते हैं और न आपके पास वह गहरी दृष्टि है कि इस वैश्विक सांस्कृतिक मूल्यहीन संदर्भ को समझ सकें।

यह बात साफ है कि कविता दो तरह की होती है। एक प्रकाश स्तंभ का कार्य करती है। वह समाज बदलने के लिए संकल्पित-सक्रिय जनता के हिरावल की समझ को समाज के समझने में सहायक होती है और परिवर्तन के पथ को आलोकित करती है। दूसरे तरह की कविता सीधे जनता के लिए होती है। सहज और संप्रेषणीय। जैसे सांस्कृतिक टोलियों के गीत। निश्चय ही मुक्तिबोध और शमशेर की कविता तथा शलभ श्रीराम सिंह और शील की कविता में अंतर होगा ही। इससे किसी कवि की जनपक्षधरता और प्रगतिशीलता पर कोई असर नहीं पड़ता, न ही महानता पर। फिर यह गैर-जानकारी में किया जा रहा है या इसके पीछे कोई राजनीति है। रही बात लोक संस्कृति से बिलगाव और दलित विमर्श के अभाव की, तो इसको समझने के लिए थोड़ी-सी राजनीतिक समझ की जरूरत है। यह बात भारतीय समाज के भीतर मौजूदअंतर्विरोधों की समझ की है। इसके भी स्पष्ट दो रूप या समझ हैं। मुख्य अंतर्विरोध भारतीय जनता बनाम सामंतवाद है या भारतीय जनता बनाम साम्राज्यवाद। अंतर्विरोध तो दोनों हैं, लेकिन प्रधान अंतर्विरोध कौन-सा है और उसका प्रधान पहलू क्या है, इसको लेकर अच्छी-खासी बहस है। मुक्तिबोध मुख्यतया पूंजीवादी साम्राज्यवादी फासीवाद को भारतीय जनता के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। मुख्य रूप से बौद्धिक वैचारिक और भावानात्मक संवेदनात्मक सौंदर्यबोधक स्तर पर। उनका लेखन और कविताओं का विषय यह जमीन है। एक हद तक आजादी के बाद के लिए साम्राज्यवादी सांस्कृतिक हमले को वे बड़ा खतरा मानते हैं। उनकी कविताओं का पाठ करते समय उनकी इस समझ और पहुंच को जरूर ध्यान देना चाहिए।

जैसे कवियों के कवि शमशेर हैं, वैसे ही समाज बदलने के लिए प्रतिबद्ध और संकल्पित एक्टिविस्ट के कवि मुक्तिबोध हैं। उनकी कविताओं का केंद्रीय भाव वर्तमान की भयावह परिस्थियों की समझ और इसे बदलने की तड़प में निहित है। परिवर्तन के लिए व्यक्तित्वांतरण, जनता के साथ एक दिल एक जान होना और सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप की ओर प्रेरित करना उनकी रचनाओं का उद्देश्य है। चर्चित-अचर्चित कविताओं का पाठ करते समय सहज रूप से समझ सकते हैं कि पूरी सघनता के साथ गझिन तरीके से मुक्तिबोध ने बुना है। यहां यह भी साफ है कि परिर्वतन के लिए सकर्मक होते ही अपनी कमजोरियां बाधा बनती हैं और निरकुंश सत्ता का हथियार। मुक्तिबोध को न समझ पाने या कठिन होने का कारण मुक्तिबोध की कविताएं नहीं हैं। समाज परिर्वतन के लिए आपकी प्रतिबद्धता और सक्रियता के चलते ही आपको मुक्तिबोध की कविताओं में बिखरी मणियां, उनमें चमकते जीवानुभव के तेजस कण मिलेंगे। आपको अपने व्यक्तित्व की कमजोरी और सत्ता के चमकते हथियार मिलेंगे। उलझन आपके भीतर होगी तो कविताएं नहीं समझ में आएंगी। मैदानों, टीलों, गलियों, खेतों, पथरीले रास्तों पर चले बिना मुक्तिबोध आपके लिए समस्या हैं। मुक्तिबोध को जानने-समझने का द्वार इस बैचैनी और प्यार से खुलता है। स्पष्ट समझ से खुलता है।
‘मुझ पर क्षुब्ध बारूदी धुएं की झार आती है/ कि उन पर प्यार आता है कि जिनके तप्तमुख संवला रहा है/ जो मानव भविष्यत युद्ध में रत है।’
मुक्तिबोध और भी साफ हैं- ‘हजार प्रश्नोत्तरी की तुड़ी प्रतिमाएं/ गिरा कर तोड़ता हंू/ प्रश्न छल उत्तर और छलमय/ प्रश्न सिर्फ एक मेरे गांव बजगरो के सभी जन/ शोषण मुक्त व सुंदर कब होंगे।’

मुक्तिबोध को जन-विरोधी और कलावादी बताने वाले आलोचकों को मुक्तिबोध की कठिनता का कारण कविताओं में नहीं, बल्कि उनके भीतर की यह कमजोरी है, जिनमें मुक्तिबोध के तीखे सवालों को झेलने की ताकत नहीं है। उनकी समस्या उनकी कमजोरियां हैं, जो उन्हें सत्ता से नाभिनालबद्ध बना चुकी हैं। अगर उनका मन और आत्मा जनसंघर्षों में लगे और परिर्वतन कभी चेतना से लैस संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध है, तो मुक्तिबोध की कविताएं उनके लिए मार्गदर्शक हैं। मुक्तिबोध की कविताएं अकादमिक नहीं, जनसंघर्षों में सक्रिय योद्धाओं के लिए हैं।

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग