March 27, 2017

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मन के छोर अछोर

प्रेम के प्रति मनुष्य के स्वाभाविक आकर्षण को कैसे समझा जाए? क्या प्रेम को पुरुष और स्त्री के नजरिए में सीमित करके तमाम सवालों के उत्तर मिल सकते हैं।

चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

महात्मा गांधी की एक साधारण दिखने वाली असाधारण उक्ति है: ‘जहां प्रेम है जीवन वहीं है।’ गांधी यह बात इसलिए कह पाए क्योंकि उनके चिंतन और कर्म के केंद्र में प्रेम था। धरती पर मनुष्य के आगमन के लाखों सालों में भूख के अलावा जिस बात से उसको सबसे ज्यादा जूझना पड़ा वह प्रेम ही है। लैटिन में तो फिलॉसफी शब्द का शाब्दिक अर्थ ही ‘लव आॅफ विजडम’ है। मनोवैज्ञानिक अक्सर कहते रहे हैं कि मनुष्य के सभी कार्य-व्यापार सीधे या परोक्ष रूप से दो बुनियादी भूख ‘प्रेम’ और ‘प्रशंसा’ से प्रेरित हैं। सभ्यता और संस्कृति के विकास में सतह से नीचे प्रेम की भूमिका निर्णायक रही है। सभयता के विकास और विनाश की गाथा में प्रेम की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका रही है। फासीवाद क्या एक विचार से प्रेम की परिणति नहीं है? पश्चिमी दर्शन में अविवेक को प्रेम का अंतर्निहित गुण माना जाता रहा है। विवाह, परिवार और समाज जैसी तमाम संस्थाओं का विकास मनुष्य के हजारों सालों की समझ का परिणाम है। अक्सर हम पिछले चार-पांच सौ सालों की तार्किकता के आतंक में इसे कम करके आंकते हैं। इन सामाजिक संस्थाओं के विकास के पीछे प्रेम एक निर्णायक कारक रहा है।

प्रेम के प्रति मनुष्य के स्वाभाविक आकर्षण को कैसे समझा जाए? क्या प्रेम को पुरुष और स्त्री के नजरिए में सीमित करके तमाम सवालों के उत्तर मिल सकते हैं। अगर पुरुष स्त्री की जमीन पर विचार करते हुए समझे तो प्रेम का अभिप्रेय क्या है? यह अनूभूति इतनी मोहक क्यों लगती है? क्या हमारी अर्थवत्ता की यह सबसे क्रिटिकल जमीन है? ऐसे तमाम सवाल प्रेम की बहुआयामिकता से जुड़े हैं। यही कारण है कि प्रेम को सबसे जटिल दार्शनिक प्रश्नों में से एक माना जाता है। इस जटिल दार्शनिक प्रश्न का बुनियादी सवाल यह है कि आखिर हम प्रेम क्यों करते हैं? शायद प्रेम पाने के लिए? तो क्या प्रेम किया जाने का कोई सरोकार हमारी अर्थवत्ता से है। अगर हां तो इस अर्थवत्ता के आयाम क्या हैं? विक्टर ह्यूगो की यह बात प्रासंगिक है कि स्वयं को प्रेम किए जाने की आश्वस्ति से बड़ी कोई खुशी नहीं हो सकती है।’  कहते हैं कि प्रेम में शासन और शासित होने का द्विआयामी भाव होता है, जो एक-दूसरे से जुड़ा है। जब हम प्रेम करते हैं तो उसकी दासता स्वीकार करते हैं और जब हम प्यार पाते हैं तो यह हमारी सत्ता का विस्तार हो रहा होता है। यह एक ही क्रिया का दो-आयामी विस्तार है, वैसे ही जैसे मन की दुनिया में देने का परिणाम पाना और मांगने का परिणाम वंचना है। प्रेम के लिए तो यह बिल्कुल सटीक है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रेम की निर्मिति कैसी है। दरअसल, प्रेम में व्यक्ति अपने ‘मैं’ का ‘हम’ में विस्तार करता हैं। यह विस्तार प्रेम और प्रशंसा की भूख से प्रेरित है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम दूसरे की नजरों से स्वयं को देखना चाहते हैं। दूसरे की दुनिया में हमारे लिए स्पेस इसी आश्वस्ति का भाव रचता है। यह विशाल सृष्टि की चेतना में स्वयं को विलीन करने वाली बात है। कहा जाता है कि हमारे जीवन के तमाम सवालों के जवाब बुद्धि से नहीं, बल्कि भाव जगत से जुड़े होते हैं। कार्य-कारण के इस विवेकवादी युग में इस पर यकीन करना कठिन और अमल करना उससे भी कठिन है। आज पूरी दुनिया में अवसाद की बढ़ते दायरे को क्या इस संदर्भ में नहीं समझा जा सकता। इस पूरी परिघटना का आश्चर्यजनक पहलू यह है कि अवसाद ग्रस्तता अब गांव और ढाणी तक पहुंच गई है। इसे समाज में घटती सामुदायिकता और प्रेम से जोड़ कर अगर कहें तो हम प्रेम में ज्यादा यथार्थवादी हो गए हैं। इसके नए आयाम खुल रहे हैं, मसलन भारत में पति-पत्नी और विवाह की धारणा में तेजी से बदलाव आया है। इसे अखबार के मैट्रिमोनियल को पढ़ कर समझा जा सकता है। इस बदलाव पर किसी निर्णय के बजाय यह तो माना जा सकता है कि हम जो चाहते हैं उसे पकड़ने-समझने का कौशल भूल रहे हैं। जो अहसास फीका पड़ रहा है वह है ‘प्रेम’ का अहसास। यह ‘हम’ के सिकुड़ने और ‘मैं’ के फैलने का दौर है। जो हमारी अनुभव परंपरा का एंटीथिसिस है। डिप्रेशन इसी प्रक्रिया का एक लक्षण है।

पूरब और पश्चिम की संस्कृतियों में बुनियादी अंतर है। इसे सिनेमा और साहित्य में भी देखा जा सकता है। पूरब में प्रेम की सत्ता पुरुष-स्त्री संबंधों के दायरे में सीमित नहीं है। यहां ईश्वर से प्रेम की अवधारणा भी मौजूद है। भक्तिकाल का पूरा साहित्य ईश्वर के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। ऐसा दुनिया की किसी भी संस्कृति में नहीं हुआ। कृष्ण-भक्ति साहित्य में तो यह बिल्कुल सतह पर मौजूद है। क्या यह प्रेम की समझ का विस्तार नहीं है। आज जब हम पश्चिम के समाज की समस्याओं को समझने की कोशिश करें तो पाते हैं कि इसे विवेक की जमीन पर समझने की कोशिश की गई। कबीर के ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’ को भारतीय परंपरा की दार्शनिक अभिव्यक्ति मानना बेमानी नहीं होगा। इसीलिए प्रेम को ज्ञान का मर्म माना जाता रहा है।

पूरब में प्रेम की अवधारणा व्यापक और बहुआयामी है। इसे दार्शनिक तौर पर अनुभूति तक सीमित कर के नहीं देखा जाता। पूरब की दार्शनिक परंपरा में शरीर की जमीन कम और भाव की ज्यादा है। इसे सिनेमा के माध्यम की अभिव्यक्ति से समझा जा सकता है। पश्चिमी सिनेमा के नैरेटिव में शारीरिक अभिव्यक्तियां महत्त्वपूर्ण होती हैं, वहीं भारतीय सिनेमा में इमोशन ही अभिव्यक्ति का आधार है। मानव मन के समझ की सबसे बेहतरीन सामग्री साहित्य है। साहित्य के इतिहास पर गौर करें तो यह बात आसानी से समझ आ जाती है। इस साहित्य के केंद्र में प्रेम ही है। यही बात तमाम रचनात्मक कलाओं के बारे में भी सही है। क्या यह कहना प्रासंगिक नहीं होगा कि मनुष्य के चिंतन और चिंता के केंद्र में जो प्रेम रहा है वह पश्चिम में अलग है।  प्रेम की पारंपरिक कल्पना से परे इस दुनिया को समझने का एक मूल्यवान निकष और आइना ‘प्रेम’ है। इससे तमाम जटिल धारणाएं आसान हो जाती हैं और तमाम अव्यक्त व्यक्त। पर आज साहित्य में जो कुछ रचा-लिखा जा रहा है, क्या उसमें प्रेम का स्वरूप वही है जो वास्तविक है या फिर उसमें ऐंद्रिकता और दुनियावी स्वार्थों का जोड़-घटाना ज्यादा हो गया है। खासकर समकालीन हिंदी साहित्य में प्रेम का यथार्थ रचने के नाम पर पश्चिम की नकल में भौतिकता का पुट कुछ ज्यादा हो चला है।

 

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First Published on October 9, 2016 5:26 am

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