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तीरंदाज- पत्रकारिता के तकाजे

भारत में पिछले तीस वर्षों में स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग समाप्त हो गई है। अखबारों के दफ्तर मीडिया हाउस में परिवर्तित हो गए हैं और जैसा कि कोई भी कारोबारी संस्था करती है, खबरों का बाजारीकरण होता गया है।
सुधांशु त्रिवेदी टीवी बहस में अपना पक्ष रखते हुए।

एक छोटा-सा सुझाव है, जो बड़ा बदलाव ला सकता है। सुझाव पत्रकारों और पत्रकारिता से संबंधित है, जिन पर विगत कुछ बरसों से कई तरह के आरोप लग रहे हैं। फेक मीडिया, गोदी मीडिया और एंटी नेशनल मीडिया आदि नाम पत्रकारिता को दिए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि मीडिया संस्थान अपने निजी स्वार्थों के लिए वे सब हथकंडे इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनसे लोकहित लाभहित की बलि चढ़ गया है।  वैसे तो ज्यादातर आरोप राजनीति से प्रेरित हैं, पर कुछ ऐसे दमदार वाकए हैं, जिनकी वजह से आत्मचिंतन की जरूरत महसूस की जा रही है। वास्तव में मीडिया संस्थानों, खासकर न्यूज टेलीविजन, को लेकर यह बात आम चर्चा में है कि वे खबरों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और अपनी निजी पसंद और नापसंद या किसी कारोबारी स्वार्थ की वजह से खबरों को तोड़-मरोड़ कर परोस रहे हैं।

यह सच भी है और सभी मीडियाकर्मी इस बात से भली भांति परिचित हैं। खबरों को एंगल देने की प्रथा सिर्फ भारत में नहीं, पूरे विश्व में, जहां भी ‘फ्री मीडिया’ है, शुरू से स्थापित है। कहीं-कहीं यह जरूरी भी है, क्योंकि अमूमन यह एंगल लोकहित के लिए दिया जाता है। इसका एक उदाहरण सरकार द्वारा जारी आकड़े हैं, जिनकी विवेचना पत्रकार सरकारी बयान से अलग हट कर अपनी तरह से करते रहे हैं। पहले भी और आज भी सरकारें इस पर झल्लाती रही हैं, क्योंकि ऐसी व्याख्या उनके नैरेटिव पर प्रश्नचिह्न लगाती है। अगर देखा जाए तो भारत में पिछले तीस वर्षों में स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग समाप्त हो गई है। अखबारों के दफ्तर मीडिया हाउस में परिवर्तित हो गए हैं और जैसा कि कोई भी कारोबारी संस्था करती है, खबरों का बाजारीकरण होता गया है। जहां एक ओर मीडिया संस्थान दिन दोगुनी रात चौगुनी कारोबारी तरक्की करते गए हैं, वहीं दूसरी ओर इसी अनुपात में पत्रकार और पत्रकारिता की विश्वसनीयता पाताल में धंसती चली गई है। आज कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि पत्रकार निष्पक्ष और विश्वसनीय हो सकता है।

वैसे सच यह है कि ज्यादातर पत्रकार अपना काम प्रोफेशनल तरीके से करते हैं। वे आज भी तटस्थ हैं, पर उनकी पत्रकारिता कॉरपोरेट जाल में फंस गई है। एक तरह से वे तथाकथित मीडिया हाउसों के बंधक बन गए हैं और अपनी रोजी-रोटी के लिए उनके मोहताज हो गए हैं। ऐसी स्थिति में जब नौकरी जाने का खतरा हमेशा बना रहता है, यह अपेक्षा करना कि वे कारोबारी हितों के खिलाफ और पत्रकारीय मूल्यों के पक्ष में आवाज उठाएंगे, पूरी तरह गलत है। वे तो अब सिर्फ नौकरी करने आते हैं, क्योंकि पत्रकारिता उनसे मीडिया हाउसों ने लूट ली है। पत्रकारिता और पत्रकार को पुन: स्थापित करने के लिए हमें वे उपाय तलाशने हैं, जिनसे पत्रकार को आर्थिक सबलता मिल सके और वह मीडिया हाउसों के मालिकाना दबाव से मुक्त हो सके। ऐसा शायद भारत में ही हो सकता है, क्योंकि यही दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जिसने पत्रकार और पत्रकारिता की आजादी को महफूज रखने के लिए कई संवैधानिक और कानूनी प्रावधान किए हैं। हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी के साथ संसद ने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 भी पास किया था, जिसमें वेज बोर्ड का प्रावधान है। इसके साथ पत्रकारों को फैक्ट्रीज एक्ट, शॉप्स ऐंड कमर्शियल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, लेबर एक्ट, प्रोविडेंट फंड आदि के तहत भी लाया गया था। अमेरिका और यूरोप में भी ऐसा संवैधानिक और कानूनी संरक्षण पत्रकारों को नहीं मिलता है।

यह सब स्वस्थ पत्रकारिता के लिए काफी था, जब तक अखबारों का कॉरपोरेटीकरण नहीं हुआ था। पर आज 1955 की क्रांतिकारी सोच से सरकार को एक कदम और आगे बढ़ना है, जिससे श्रमजीवी पत्रकार अपने दायित्व का निर्वाह आत्मविश्वास से कर सकें। यह कदम बहुत छोटा-सा है और इसकी नजीर अन्य श्रमिकों की व्यवस्था में उपलब्ध भी है, पर इसका प्रभाव हमारे लोकतंत्र के लिए दूरगामी होगा। 1996 में संसद ने भवन निर्माण में लगे मजदूरों की आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक कानून बनाया था, जिसमें प्रावधान किया गया कि किसी भी निजी या सरकारी निर्माण पर, जिसकी कीमत दस लाख रुपए से ज्यादा है, एक प्रतिशत कर श्रम विभाग को देय होगा। इस धनराशि का उपयोग भवन निर्माण में लगे श्रमिकों की बेहतरी के लिए किया जाएगा। पिछले बीस साल में इस कोष में कई सौ करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं, पर उसका समुचित उपयोग अभी तक नहीं हो पाया है।

इस कानून से नजीर लेकर श्रमजीवी पत्रकारों को आर्थिक सबलता प्रदान करने के लिए, ताकि वे कॉरपोरेट और राजनीतिक दबाव से बच सकें एक नया कानून या फिर 1955 के कानून में संशोधन करना चाहिए, जिसमें न्यूज मीडिया के अंतर्गत अखबार, टेलीविजन और डिजिटल चैनल अपने विज्ञापन से अर्जित सालाना आय का दो प्रतिशत हिस्सा पत्रकार कल्याण कोष में डालने को बाध्य हो जाएं। एक सरकारी रेपोर्ट के अनुसार 2016-17 में सिर्फ प्रिंट मीडिया की आय 4.15 अरब डॉलर थी, जिसमें देश के सिर्फ तीन बड़े अखबारों की आय लगभग पंद्रह हजार करोड़ रुपए थी।ऐसी में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर पत्रकार कल्याण कोष की स्थापना हो, तो उसमें काफी धन जमा हो सकता है, जिससे पश्चिमी देशों में चलने वाले सोशल सिक्यूरिटी नेटवर्क जैसा कोष पत्रकारों में लिए बनाया जा सकता है। इसके तहत सम्मानजनक बेरोजगारी भत्ता और पेंशन का प्रावधान श्रमजीवी पत्रकारों के लिए किया जा सकता है, जिससे वे अपना काम निर्भीकता से, कॉरपोरेट जाल से परे, लोकहित में कर सकें। मीडिया संस्थाओं को इस ओर प्रोत्साहित करने के लिए सरकार उन्हें कॉरपोरेट टैक्स आदि में छूट का प्रावधान भी कर सकती है। कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के प्रावधान की तरह।

ऐसा एक छोटा-सा प्रयोग उत्तर प्रदेश में एक कर्मठ अधिकारी ने लगभग डेढ़ दशक पहले किया था। पत्रकार कल्याण निधि बनाने के लिए उन्होंने शासनादेश जारी किया था, जिसमें सरकार मीडिया को विज्ञापन ऐड एजेंसी के पंद्रह प्रतिशत कमीशन से पांच प्रतिशत काट कर कोष में जमा कराने का प्रावधान था। पर मामला न्यायालय में फंस कर रह गया और एक अच्छी पहल ठंडे बस्ते में चली गई।श्रमजीवी पत्रकारों (मीडिया संस्थानों की नहीं) को आर्थिक सबलता और माफिक माहौल देने के लिए कल्याण कोष बनाना जरूरी हो गया है। फेक न्यूज, दलालवादी मीडिया, कॉरपोरेट दलदल में फंसने की वजह से पेशेवर पत्रकारों का नुकसान तो हो ही रहा है, पर उससे कई गुना बड़ा नुकसान हमारे लोकतंत्र का हो रहा है। भारतीय लोकतंत्र की जान स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता है और उसकी सबसे पहली रक्षापंक्ति लोक निर्वाचित सरकार है। उसको लोकतंत्र के प्रति अपनी निष्ठा स्थापित करने के लिए पत्रकारिता को सशक्त करना ही होगा।
पत्रकारिता के तकाजे

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