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प्रसंगवश- सूचना से सोचना बंद

सूचनाओं को ज्ञान बना कर बांटने वाले कहते हैं, सोचना बंद करो, सूचनाओं की सेल लगी है, सूचना खरीदो और शिक्षा की फैशन-परेड में शामिल हो जाओ।
Author September 3, 2017 05:11 am
प्रतीकात्मक चित्र।

सूचना के विस्फोट ने सोचने को ध्वस्त कर दिया। शिक्षा को संस्कार की जननी माना गया, लेकिन वह बन गई विकारों की कचरा-पेटी। आखिर क्या खोट रह गई हमारी सोच में! हमने सूचनाओं का संजाल तो तान दिया, मगर सूचना के तमाम उपकरण अब हमारे जी के जंजाल बन गए। ऐसा कौन-सा अपशकुन शिक्षा में घुस गया कि देश पर शिक्षा, शिक्षक और शिक्षाविदों के प्रभाव के बजाय पाखंडी साधु-संतों का दुष्प्रभाव पैदा हो गया? अंधविश्वास, पाखंड, जादू-टोने, भूत-प्रेत-डायन, नफरत, हिंसा, जातिवादी राजनीति और नया-नया परिवारवाद, ये सब मिलकर देश की शिक्षा के आसपास जहरीले सांपों की तरह मंडराने लगे। स्कूल मल्टीनेशनल बाजार बन गए, अस्पताल आदमी की मौत का व्यापार करने लगे, शिक्षक-प्राध्यापक अपने कर्तव्य से भटक कर अपराधों के नए कोचिंग केंद्रों के हाथों बिकने लगे! यह सब क्यों हुआ, कैसे हुआ, कौन जिम्मेदार है- इन प्रश्नों को पूछने वाला भी आज न कोई संसद में है, न विधान मंडलों में और न ही सरकारी तंत्र में।

शिक्षा अब एक व्यवस्था है, चाहे प्राइवेट हो या सरकारी। शिक्षा का भी अपना संविधान है, जिसे पाठ्यचर्या या पाठ्यक्रम कहा जाता है। इस संविधान का कथावार आचरण कर शिक्षक पढ़ाने और छात्र-छात्राएं पढ़ने का कर्म अपनाते हैं। पाठ्य-पुस्तकें इस संविधान को कार्यरूप देने का मार्ग मानी जाती हैं और इस मार्ग पर ले चलने का काम शिक्षक करते हैं। परीक्षाएं मार्ग सही है या गलत, यह तय करती हैं और पढ़ाई-लिखाई की जांच कर प्रमाण-पत्रों की औपचारिकता निभाती हैं। प्रमाण-पत्रों से पैदा होने वाली किशोर-युवा पीढ़ी उपाधियों के राजमार्ग पर उतरती है। वह अपने वर्तमान को भविष्य के हवाले कर उच्च शिक्षा की किसी ऐसी धारा में जाना चाहती है, जिस धारा में कंकड़-पत्थर के साथ पैसा बह कर आता है। इस धारा को रचते हैं सूचनाओं के सूत्रधार, कोचिंग क्लासों के कर्णधार और निजी विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के नए-नए बाजार। सूचनाओं को ज्ञान बना कर बांटने वाले कहते हैं, सोचना बंद करो, सूचनाओं की सेल लगी है, सूचना खरीदो और शिक्षा की फैशन-परेड में शामिल हो जाओ।

कहने को तो कहा जा रहा है कि हमने अपने देश की शिक्षा को क्या से क्या बना दिया। हमने इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और तकनीकी संस्थाओं का जाल बिछा दिया, तमाम किस्म के आयोगों की तरह सूचना आयोग बना कर सूचना का अधिकार दे दिया, लेकिन हम यह क्यों नहीं कहते कि हमने कोई संस्कार आयोग बनाया, चिंतन और आचरण-आयोग बना दिया और देश की जनता को तमाम किस्म के धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद से मुक्त कर इंसानियत आयोग बना दिया। हमने भले नासा और सिलिकॉन वैली पर अपनी प्रतिभा की छाप लगा दी, मगर हम बने क्या, कंप्यूटर के क्लर्क! हमने भले ही मंगल ग्रह पर पानी खोज लिया, मगर जमीन के पानी को तो पीने लायक ही नहीं छोड़ा। क्या सूचना की शिक्षा ने हमसे अपनी बुद्धि और क्षमता का पानी भी छीन लिया?

शिक्षा, स्वास्थ्य, नापतोल, जंगल आपूर्ति आदि तमाम व्यवस्थाओं के लिए तो निरीक्षक रखे जाते हैं, उनके निरीक्षण होते हैं, उनके लिए आयोग बिठाए जाते हैं, ऐसा धार्मिक संस्थानों, धर्म के नाम पर चलने वाले आश्रमों, डेरों, पूजा-प्रार्थना या उपासना-गृहों के लिए सूचना आयोग, मानव, महिला, बाल आयोगों की तरह कोई आयोग क्यों नहीं; इनके लिए निरीक्षण, निगरानी और जांच आदि की व्यवस्था क्यों नहीं? धर्मस्व विभाग या वक्फ बोर्ड हैं तो जरूर, मगर क्या वे मंदिर, मस्जिद, आश्रम, डेरों आदि की गतिविधियों का आकस्मिक या क्रमबद्ध निरीक्षण-परीक्षण करते हैं। हमने तो उन्हें पवित्रता, संस्कृति, धर्म-मजहब का प्रमाण-पत्र देकर या सरकारी गंडा बांध कर उन्हें जो चाहें वह करने के लिए आजाद कर दिया। हमने यह कभी नहीं देखा कि वहां क्या शिक्षा, क्या संदेश और क्या संस्कार दिए जा रहे हैं। हमने कभी अपने तंत्र को उनकी गुफाओं, कोठरियों, उनके द्वारा संचालित स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, सामाजिक कार्यों आदि के लिए उनके काम का न औचक निरीक्षण किया, न उनके लिए स्कूल, कॉलेज, स्वास्थ्य की तरह मॉनीटरिंग व्यवस्था रची। एक प्रकार से सरकारों और राजनीतिक दलों ने उन्हें अभयदान देकर मनमाने अपराधों की आजादी दे दी।

अगर हमने सूचना आयोग या सूचना-उद्योग पैदा किया तो साधु-संतों, तथाकथित भक्तों, उनके समर्थक नेताओं आदि की आपराधिक सूचनाओं का तंत्र हमने क्यों नहीं रचा? इनकी शिक्षा से अगर पढ़ा-लिखा बौद्धिक कट्टर, सांप्रदायिक, हिंसक और उपद्रवी बनता है तो क्या इसका अर्थ यह नहीं कि स्कूल से विश्वविद्यालयों तक शिक्षा अपने मूल आदर्श से भटक कर फैल गई है तो धार्मिक स्थलों और तथाकथित धर्म-गुरुओं की शिक्षा भी फेल हो गई है।
हम कई तरह के दिवसों के कर्मकांड करते हैं। शिक्षा, साहित्य, समाज सेवा, खेल, शौर्य और अनेक अन्य अच्छे कामों के नाम पर पुरस्कार, सम्मान और पद्म-अलंकरण देकर यह बताने की कोशिश करते हैं कि ये हमारे प्रेरणा-स्रोत हैं। अब प्रश्न यह है कि प्रेरणा स्रोतों को चुनने का तरीका क्या है? कहा जाता है कि चयन की प्रक्रिया होती है, प्रस्ताव मांगे जाते हैं, जूरी बनाई जाती है, तब सरकार या संगठन सम्मान या पुरस्कार देती है, मगर यह कहना एक प्रकार से एक चौथाई सत्य है। ये तमाम सम्मान-पुरस्कार या तो प्रायोजित होते हैं या राजनीतिक वफादारी के नाम पर जिस दल की सरकार होती है उस दल के साथ जुड़े व्यक्ति को ही दिए जाते हैं। निष्पक्ष और मेरिट के आधार पर कितने सम्मान-पुरस्कार सरकारों ने दिए, जूरी कितनी बौद्धिक, न्यायप्रिय और निष्पक्ष रही, क्या कभी इसकी भी जांच हुई? अगर पुरस्कारों-सम्मानों की इस छीना-झपटी का केवल राजनीतिक अभिप्राय है या दलों से वफादारी प्रतिबद्धता है तो फिर विज्ञापनों में लिख दिया जाए जो व्यक्ति, हमारे दल, हमारी विचारधारा और हमारी सरकार के प्रति समर्पित हों, वे ही आवेदन करें, उनके लिए ही नाम प्रस्तावित किए जाएं, वे ही हमारे लिए प्रतिभावान हैं, शेष सब तो अपात्र हैं।

अगर हमने उच्च से उच्च शिक्षा का भी यह मानसिक चरित्र रचा, सूचनाओं को ही श्रेष्ठता या निकृष्टता का आधार बना दिया तो फिर हम किस न्याय-दर्शन, किस धर्म-निरपेक्ष-संविधान और किस मानवीय संवेदन की बात करते हैं। हमने शिक्षा के जरिए अगर संकीर्णता की जंजीरें बनाई हैं तो हमें सोचना होगा, सोचने की शिक्षा का एक बड़ा संजाल रचना होगा, ईमानदार बुद्धिजीवियों, सामाजिक-निष्ठा-बद्ध कार्यकर्ताओं, धर्म-निरपेक्ष, न्यायप्रिय प्रतिभावानों को शिक्षा से गैर-सरकारी स्तर पर जोड़ना होगा। स्कूल कैसा है, क्यों है, कौन चलाता है, यह प्रश्न बाद में हों, मगर प्रथम विचार या प्रश्न यह हो कि हम शिक्षा को चेतना का उत्सव कैसे बनाएं, जो कृष्णमूर्ति चाहते थे या इवान इलिच भी जिसे सेलिब्रेशन आॅफ अवेअरनेस कहता है। पाठशाला जीवन का पाठ पढ़ाने के लिए है, न कि सूचनाओं के आंकड़ों का सांख्यिकी झूठ एकत्रित करने के लिए। क्या शिक्षक, शिक्षाविद, संस्था संचालक और सरकार किसी एक प्लेटफॉर्म पर बैठ कर शिक्षा को सोचने का माध्यम बनाने पर स्वयं भी सोचेंगे?

 

 

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