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अल्पसंख्यक भाषाओं की वेदना

ये महज जीवन-निर्वाह के कुछ तत्त्व नहीं होते, बल्कि अपने समाज के प्रतिरोध के विभिन्न स्तर होते हैं, जिनके समाप्त होते ही उस समाज की पूरी संरचना छिन्न-भिन्न हो जाती है।
Author April 23, 2017 05:47 am
प्रतीकात्मक चित्र

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

आज भूमंडलीकरण की अंधी प्रतिस्पर्धा ने मानवता के समक्ष जिस परिवेश का निर्माण किया है, उसमें बहुसंख्यक समाज भाषाओं के मामले में लगातार संवेदनहीन होता जा रहा है। इसमें जो जिस भाषिक समुदाय में खड़ा है, वहां से उसे यह तो दिखाई देता है कि उसे किन भाषाओं से दबाव है, लेकिन वह इस पर विचार नहीं करता कि खुद उसके या उसकी भाषा और समुदाय के कारण तुलनात्मक रूप से छोटे भाषिक समुदायों को कितना दबाव महसूस हो रहा है। फलस्वरूप छोटे-छोटे समूहों में रह रहे भाषिक समाजों में वर्तमान पीढ़ी के ऊपर उसके चारों ओर से इतना दबाव पड़ रहा है कि उनका स्वाभाविक जीवन का संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान विकास के ढांचे में जीवन के रोजमर्रा की प्रतिस्पर्धाओं में भाषाई बहुसंख्यक समाज जितना आगे बढ़ रहा है, इसका अल्पसंख्यक समाज उतना ही मुख्यधारा से दूर होता जा रहा है।  आज देश में भाषाओं के आधार पर बनने वाली अस्मिताओं के संदर्भ में मैथिलीशरण गुप्त का ‘मनुष्य’ अपने रास्ते से भटक रहा है। हालांकि अपनी भाषा और संस्कृति के लिए सकारात्मक संघर्ष करना उचित है, लेकिन आज देश में जो भाषाओं की स्थिति है, उसमें लोकतांत्रिक आधार पर भाषाई अस्मिताओं के संघर्ष में सबसे निचले पायदान की भाषाओं का कोई रहनुमा नहीं दिख रहा है। चूंकि संख्या बल में उनकी गिनती न्यूनतम है, तो अपनी बात जोरदार ढंग से रखने भर के लिए जिस ताकत की आवश्यकता है, वह संभवत: उनके पास नहीं है। दूसरी तरफ हालत यह है कि देश की सैकड़ों छोटी-छोटी भाषाएं अपनी सांस्कृतिक समृद्धि के बावजूद अपने अंत की ओर अग्रसर हैं। इस प्रकरण में सबसे चिंताजनक यह है कि इनमें अधिकतर भाषाओं के व्यापक समाज भी अनेक रोजमर्रा के कारणों से अपनी भाषाओं के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आकर्षण, आधुनिक जीवन-शैली और भड़कीले परिवेश की आकांक्षाओं की पूर्ति की संभावना किसी स्थानीय और अल्पसंख्यक भाषी समाज की भाषा के रास्ते चल कर संभव नहीं दिखती, इसलिए सब दौड़ पड़ते हैं उसी रास्ते पर, जिससे इन लक्ष्यों को पाना आसान हो। फलस्वरूप अपनी भाषाई, सांस्कृतिक और जातीय विरासत की थाती पीछे छूटती जा रही है। देश के बहुभाषिक परिवेश में जो भाषिक अधिक्रमिकता बनती है, उसमें हर न्यूनतम जनसंख्या वाली भाषा अपने परिवेशीय सामीप्य की वृहत्तर जनसंख्या वाली भाषा से दबाई जाती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे समुद्र की बड़ी मछली छोटी का अंत अपने स्वाद के लिए करती है। इस परिवेश में छोटे समाजों की मूल और समृद्ध संस्कृतियां या तो समाप्त हो रही हैं या निकट की संक्रमित संस्कृतियों का अरेखांकित हिस्सा बन रही हैं और इसके साथ सदियों की जीवन-पद्धति के आहार, व्रत, त्योहार, आराध्य, गीत, नृत्य, परिधान, उपचार, हस्त कलाएं और आंतरिक पारिवारिक व्यवस्थाएं आदि समाप्त होती जा रही हैं। ध्यान रहे कि ये महज जीवन-निर्वाह के कुछ तत्त्व नहीं होते, बल्कि अपने समाज के प्रतिरोध के विभिन्न स्तर होते हैं, जिनके समाप्त होते ही उस समाज की पूरी संरचना छिन्न-भिन्न हो जाती है। एक व्यक्ति सबसे अधिक क्षमतावान अपनी भाषा के साथ ही रहता है, इससे इतर वह हर चरण में अपनी क्षमता के साथ स्वतंत्रता और मानवीय अधिकारों से दूर होता जाता है। अब द्वितीयक क्षमता के नागरिकों के साथ न तो कोई समाज विकास कर सकता है और न ही राष्ट्र। यह तथ्य भारत जैसे बहुस्तरीय बहुभाषिकता वाले समाज और राष्ट्र के साथ और अधिक महत्त्व रखता है। दुर्भाग्य से हम सभी एक खोखले समाज और राष्ट्र के अंग बनते जा रहे हैं।
इस पूरे प्रकरण में सामाजिक सुरक्षा का भय होना भी एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है। दरअसल, जिस अपेक्षाकृत बहुसंख्यक समाज के बीच छोटी-छोटी अस्मिताओं वाले समाज रह रहे हैं, उनकी वहां के व्यापक परिवेश से इतर रहन-सहन से जो अलग पहचान बनती है, उसको संरक्षण देना वहां के बहुसंख्यक समाज का कर्तव्य होना चाहिए, ताकि समाज और देश का ताना-बाना बना रहे। लेकिन यथार्थ प्राय: उसके विपरीत होता है, जिससे इन लघु समाजों में अपनी विशिष्टता यथाशीघ्र मिटा देने का दबाव काम करता है और वे स्वयं जल्दी से जल्दी बहुसंख्यक समाज और संस्कृति का हिस्सा बन जाना चाहते हैं। बल्कि ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाते हैं, जिनमें किसी वृद्ध महिला या पुरुष के पास ही उनकी मूल भाषा बची है, जिसकी स्वीकार्यता का संकट खुद उसी परिवार की दूसरी और तीसरी पीढ़ी के लोगों में है। समाज विशिष्ट गृह-कलाएं, खाद्य, लोकगीत, नृत्य और विभिन्न संस्कार भी इन्हीं बुजुर्ग लोगों के पास है। उसके बाद की पीढ़ियों के पास इन विरासतों को न तो अपनाने की चेतना है और न बढ़ाने की लगन। ऐसे में इन विरासतों का समाप्त होना निश्चित है।

भूमंडलीकरण के दो वैश्विक सारथी- ‘अंग्रेजी’ और ‘इंटरनेट’- इधर मुख्यधारा के समाजों को तो सहूलियतें प्रदान कर रहे हैं, लेकिन अल्पसंख्यक समाजों को एक ऐसे अंधकारमय गड्ढे में धकेल रहे हैं, जहां मौन रहते हुए दफ्न होने के अलावा इनके लिए दूसरा कोई रास्ता ही नहीं बचता है। गौरतलब है कि समकालीन लोकतांत्रिक सरकारों की जनकल्याण से जुड़ी योजनाओं का संचालन भी एप्प और वेबसाइटों पर तेजी से केंद्रित हो रहा है। हालांकि किसी भाषा और संस्कृति की जीवंतता उसके समाज के मध्य ही संभव है, इनको किसी संग्रहालय में रख कर सहेजा तो जा सकता है, लेकिन उनकी जीवंतता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। ऐसे में आदर्श यह होगा कि सभी भाषाएं और उनमें निहित संस्कार सुरक्षित रहें और आगे बढ़ें, लेकिन आज की परिस्थिति में यह व्यक्तिगत प्रयासों से बहुत कठिन है। इसके लिए व्यापक पहल की आवश्यकता है। इसमें कुछ उम्मीद प्रस्तावित ‘नई शिक्षा नीति’ से की जानी चाहिए, जिसमें कहा गया है कि ‘सभी राज्य अगर चाहें, तो कक्षा पांच तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बना सकते हैं।’ साथ ही यह भी आश्वासन मिलता है कि ‘‘शिक्षा के सभी स्तरों और अधिगम के क्षेत्रों में ‘सूचना और संचार प्रौद्योगिकी’ को अभिन्न अंग बनाने के लिए सम्मिलित प्रयास किए जाएंगे।’’ लेकिन यह भी तब संभव होगा, जब यह नीति अंतिम रूप से प्रशासन का अंग बने और इन प्रस्तावों का ईमानदारी से पालन किया जाए। इसके साथ व्यापक बदलाव समाज के नजरिए में परिवर्तन से संभव होगा, जिसमें अंधी प्रतिस्पर्धा से अधिक छोटी-छोटी भाषाओं के समूहों के प्रति संवेदनशीलता बढ़े, उन्हें उनके रूप में स्वीकार किया जाय न कि अपने साथ एकीकरण का कोई दबाव हो। इस पूरे प्रकरण में लोकतंत्र का बहुसंख्यकवादी ढांचा भी अंतत: इन पहचानों के विरुद्ध ठहरता है, इसलिए यह भी जरूरी है कि इनको चुनावी मतों से इतर मानवता के धरातल पर खड़ा होकर देखा जाए। अपने आसपास के विभेदों को उदारता के साथ सम्मान दिया जाए। इन सबके साथ बहुभाषावाद को अधिक से अधिक बढ़ावा दिया जाए और छोटी से छोटी भाषाओं को शिक्षा, अनुवाद और लेखन के क्षेत्रों में पसरने का अवसर उपलब्ध कराया जाए। साथ ही सूचना-प्रौद्योगिकीय संदर्भों में इन भाषा और संस्कृतियों को सहेजा जाए, ताकि जिस इंटरनेट से आज तक ये पहचानें दबती आ रहीं हैं, उसी से इसके विस्तार का रास्ता तैयार किया जाए। जिससे अवश्यंभावी एकरूपता के बरक्स एक बहुरंगी और समर्थ दुनिया में हमारी आने वाली पीढ़ियां स्वतंत्र रूप से सांस ले सकें।

 

 

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