March 24, 2017

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प्रसंग: जन माध्यम और जनतंत्र की चिंताएं

आज जनसंचार-माध्यमों में सच और झूठ के बीच इतनी बातें अपना स्थान बना चुकी हैं कि संदेह की मात्रा निरंतर व्यापक होती जा रही है।

Author October 2, 2016 04:02 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

निस्संदेह आज इंटरनेट समाज के लिए एक प्रभावी और सुविधाजनक साधन है। अगर इसका सकारात्मक उपयोग हो, तो निश्चित रूप से भविष्य में सुखद परिणाम मिलेंगे और समाज की अनेक समस्याओं को इसके माध्यम से संबोधित किया जा सकता है। मगर हकीकत यह है कि जागरूकता के अभाव और आर्थिक गैर-बराबरी के कारण इंटरनेट अपनी नकारात्मक परिणति के साथ प्रस्तुत हो रहा है। एक तरफ यह ढेर सारे भ्रमों और अफवाहों के त्वरित प्रसार का सायास माध्यम बन रहा है, तो दूसरी ओर देश के वंचित वर्ग के लोगों में हीनता और अवसाद का कारण भी बन रहा है। इंटरनेट ने जिस मीडिया को आधार प्रदान किया है, उसका व्यापक बाजार है और यही कारण है कि फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे ‘सोशल मीडिया’ के साथ पारंपरिक जन-संचार माध्यम- रेडियो, टेलीविजन और अखबार-पत्रिकाएं भी अपनी उपस्थिति इंटरनेट पर तेजी से दर्ज कर रहे हैं।

इस नए माध्यम का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि पारंपरिक मीडिया की वर्गीय उच्चता से मुक्त यह देश के मध्यवर्ग की स्वतंत्रता का पोषक बन कर उभरा है। सार्वजनिक क्षेत्र से लेकर निजी क्षेत्र की अनेक सुविधाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। पर सवाल उसके अंतर्वस्तु की वैधता और सत्यता का है। अब यह सिर्फ जन-शिकायतों के प्रसार और पारस्परिक विचार विनियमन का साधन नहीं, बल्कि इससे उपजा बाजार इसे सच्चाई और पत्रकारीय आदर्शों से दूर भी कर रहा है। आज कोई ‘समाचार वेबसाइट’ मूल तथ्यों से परे बहुपयोगी समाचार सिर्फ इसलिए देती है कि उसे अधिक से अधिक लोग खोलें, जिस पर उसका पूरा बाजार निर्भर होता है। इस क्रम में संबंधित समाचार से लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसकी चिंता उस वेबसाइट को कतई नहीं होती। किसी तटस्थ निगरानी तंत्र के अभाव में इनमें कई बार सामाजिक सद्भाव की दृष्टि से भी खतरनाक सामग्री सामाजिक जिम्मेदारी से परे सहज प्रस्तुत की जा रही है और उनका प्रसार कराया जाता है, जिसे कई बार अनजान या भावुक इंटरनेट प्रयोक्ता सच मान कर स्वीकार कर लेते हैं। ऐसी वेबसाइटों के मालिक निर्भय होकर ऐसा इसलिए भी कर पाते हैं कि वे किसी मुद्रित सामग्री में संपादन करके आपत्तिजनक सामग्री को बदल या हटा सकते हैं।

अमेरिकी रक्षा सचिव रहे डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने 2006 में ही चेताया था कि ‘एक झूठ दुनिया में कई बार अपने बल पर आधे रास्ते में ही सच में परिवर्तित हो जाता है, लेकिन यही झूठ ‘प्रौद्योगिकी’ के सहयोग से दोगुना सच हो जाता है।’ गौरतलब है कि यह स्थिति गोयबल्स के प्रचार सिद्धांत से अधिक घातक है, क्योंकि उस समय रेडियो ही प्रचार का सबसे प्रभावशाली माध्यम था, जबकि आज के जन-माध्यम मोबाइल के रूप में लोगों की हथेली में सहज उपलब्ध हैं। ‘जनसंचार-माध्यम’ लोकतंत्र रूपी शरीर में धमनी और उसमें निहित विचार खून के समान होते हैं। शरीर के लिए शुद्ध खून की वैसे ही आवश्यकता होती है, जैसे लोकतंत्र में निष्पक्ष विचार की। अगर इसमें कहीं प्रदूषण आता है, तो खतरा पूरे लोकतंत्र पर होगा और वर्तमान समय में इस प्रदूषण की आहट बड़ी शिद्दत से महसूस की जा सकती है। आज जनसंचार-माध्यमों में सच और झूठ के बीच इतनी बातें अपना स्थान बना चुकी हैं कि संदेह की मात्रा निरंतर व्यापक होती जा रही है और कई बार तो विश्वसनीयता का संकट इतना व्यापक हो जाता है कि उसमें निहित किंचित सत्य भी झूठ-तंत्र के आड़े आ जाता है।

आज मार्शल मैक्लूहान का ‘माध्यम ही संदेश है’ का सिद्धांत तेजी से फलित होता दिखाई दे रहा है। क्योंकि वर्तमान समय में सोशल मीडिया ही पारंपरिक मीडिया का स्रोत बनता जा रहा है, यहीं की घटनाएं, संदेश और वीडियो पारंपरिक मीडिया में भी अपना स्थान तेजी से घेर रहे हैं। मीडिया समूहों के लिए आसान भी है कि ट्विटर, फेसबुक और विभिन्न वेबसाइटों से सामग्री लेकर परोसा जाए और क्षेत्र में निकलने की पीड़ा से बचा जा सके। इस पूरे व्यवहार में आज समाचार चैनल तेजी से मनोरंजन के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं। चौबीस घंटे चलने वाले ये टीवी चैनल आज लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में कितने प्रभावी हैं, इस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ चुका है। सोशल मीडिया के उभार और इसके निर्बाध प्रयोग से लोकतंत्र के लिए एक नई उम्मीद जगी थी, लेकिन आज इसे भी बड़ी तेजी से भ्रामक और अविश्वसनीय बनाने का दुष्चक्र चल रहा है। विभिन्न सॉफ्टवेयरों के सहयोग से आॅडियो, वीडियो और तस्वीरों को अपने निजी एजेंडे के अनुसार संपादित करके परोसा जा रहा है, जिससे तटस्थ मानस-निर्माण की प्रक्रिया को गहरा धक्का लग रहा है। निश्चित रूप से एक ऐसा तबका है, जो सोशल मीडिया के उपयोग से अर्जित लोकतांत्रिक अभिव्यक्तियों की आजादी का पक्षधर नहीं है और इसे या तो अपने अनुसार उपयोग करने का इच्छुक है या इसे बदनाम करके छोड़ देना चाहता है।

ट्राई के अनुसार मार्च 2015 तक कुल 30.23 करोड़ लोगों के पास इंटरनेट पहुंच चुका था। इसमें शहरों में 50.15 प्रतिशत और गांवों में 12.41 प्रतिशत इंटरनेट प्रयोक्ता हैं। इनकी संख्या निरंतर बढ़ रही है। पर जिनके पास इंटरनेट और स्मार्टफोन नहीं है, वे भी इसी देश के नागरिक हैं और इस लोकतंत्र में उनका भी वही स्थान है, जो इन धनाढ्य तबकों का है। आज विचारणीय है कि सवा सौ करोड़ आबादी वाले देश में कार्यपालिका और मीडिया की चिंता में स्मार्टफोन धारकों और इससे वंचित आबादी की भागीदारी का अनुपात कितना है। आज सार्वजनिक कार्यक्रमों से लेकर भविष्य की योजनाओं के केंद्र में बहुधा यही तबका है। मीडिया के लिए भी सब कुछ यहीं से गुजर कर निकलता है। हालत यह है कि ओडिशा के दाना मांझी इसमें तब स्थान बना पाते हैं, जब वे अपनी पत्नी के शव को लेकर बारह किलोमीटर पैदल चलते हैं। अगर यह प्रकरण देश में सत्तर वर्षों के लोकतांत्रिक सरकारों की विफलता है, तो यह विफलता मीडिया की भी उतनी ही है। वह सिर्फ उस घटना की सहज उपलब्ध वीडियो दिखा कर अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकता। ऐसी घटनाओं के कारणों और संभावित निवारणों तक उसे बहुत पहले पहुंचना चाहिए था।

आज लोकतंत्र पर चारों तरफ से खतरा बढ़ रहा है। पूंजी से लेकर सत्ता तंत्र सब अपने अनुसार एक देश और समाज को गढ़ना चाहते हैं, जहां देश की जनता सिर्फ मूक उपभोक्ता या शासित बन कर रहे। ऐसे में सार्थक हस्तक्षेप की उम्मीद मीडिया से है। उसने अनेक अवसरों पर इस उम्मीद को पूरा करने का प्रयास भी किया है। मगर आज के मीडिया की पक्षधरता लोकतंत्र से अधिक सत्ताओं की तरफ मुड़ रही है। वह कुछ तबकों की चिंताओं तक ही सिमटता दिख रहा है। वह देश के पिछड़े, जनजातीय और सुदूर क्षेत्रों के लोगों का जीवन और उनके दर्द से बहुत दूर हो चुका है। सरकार और लोकतंत्र के प्रहरी मीडिया को विचार करना चाहिए कि नेटिजन से आगे भी एक समाज है और उसे छोड़ना दरअसल अपने मूल कर्तव्यों से विमुख होना है।

 

 

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First Published on October 2, 2016 4:02 am

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