January 19, 2017

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साहित्य: जनकवि और जनकविता

जनकवि उसे कहेंगे, जो जनता का कवि हो। तब प्रश्न उठेगा कि जनता का कवि कौन? जनता के लिए तो सबने लिखा है।

प्रतिकात्मक तस्वीर।

आदर के लिए जनकवि विशेषण का प्रयोग इधर के वर्षों में अपने प्रिय कवियों के लिए बढ़ा है। जहां तक अनुमान है, ‘जनकवि’ विशेषण के प्रयोग की प्रवृत्ति का चलन छायावाद के बाद की घटना है। पहले लोग किसी कवि को जब खूब आदर देते थे तो उसके नाम के पहले ‘महाकवि’ शब्द जोड़ते थे। यों महाकवि उसे कहा जाता था, जिसने कोई महाकाव्य लिखा है, जैसे- महाकवि तुलसीदास। सूरदास ने कोई महाकाव्य नहीं लिखा था, तब भी उन्हें महाकवि कहा गया। कहा गया कि सूर ने भले कोई महाकाव्य न लिखा हो, लेकिन वे महाकाव्यात्मक प्रभाव पैदा करने वाले कवि हैं। कबीर को महाकवि किसी ने कहा हो, इसकी याद नहीं। पहले वे समाज सुधारक या संत थे। कवि रूप में प्रतिष्ठा उन्हें बहुत बाद में मिली। जायसी, सूर और तुलसी की तरह वे भी अब महाकवि हैं। आधुनिक काल में मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला आदि के लिए भी महाकवि पद प्रयुक्त होता रहा है। अब यह विशेषण सुनने को नहीं मिलता। अब किसी कवि को महाकवि कहने पर, चाहे जनवादी हो या गैर-जनवादी, वह नाराज हो जाएगा। उसकी जगह ‘जनकवि’ ने ले ली है। लगता है कि जनकवि कहना-कहलाना कवि-प्रशंसकों और कवियों को ज्यादा अच्छा लगता है।

महाकवि एक सुपरिभाषित पद था। इसका प्रयोग उसी के लिए किया जाता था जो इसका अधिकारी हो। जिसने महाकाव्य न लिखा, लेकिन जो महान कवि हो, जैसे- निराला। आधुनिक काल में इसका बड़ा दुरुपयोग हुआ। हर ऐरा-गैरा कवि अपने को महाकवि कहलाना पसंद करने लगा। कवि सम्मेलन का संचालक हर कवि को ‘महाकवि’ कह कर बुलाने लगा। अब उसकी जगह जनकवि प्रचलन में है, लेकिन ‘जनकवि’ वैसा सुपरिभाषित पद नहीं है, जैसा महाकवि था। तब प्रश्न है कि जनकवि कौन? भारतेंदु, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुकुट विहारी सरोज तो जनकवि घोषित किए जा चुके हैं। इसकी परिभाषा स्पष्ट हो तो और भी नाम जुड़ेंगे।

क्या जनकवि उसे कहेंगे, जो जनता का कवि हो। तब प्रश्न उठेगा कि जनता का कवि कौन? जनता के लिए तो सबने लिखा है। प्रसाद, निराला, अज्ञेय, नागार्जुन, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, धूमिल आदि सभी ने जनता के लिए लिखा है। तब प्रश्न उठेगा कि किस जनता के लिए? उच्च वर्ग के लोग हिंदी कविता पढ़ते होंगे, इसमें संदेह है। निम्न वर्ग से जो किसान मजदूर हैं वे भी शायद ही कविता पढ़ते हों। उनकी जीवन-स्थितियां कविता पढ़ने के अनुकूल नहीं हैं। ले-देकर मध्यवर्ग ही हिंदी कविता का पाठक हो सकता है। वकील, पत्रकार, अध्यापक, छात्र, अधिकारी, क्लर्क आदि को ही हिंदी कविता का पाठक माना जा सकता है। क्या इनके बीच जो लोकप्रिय है, उसे जनकवि कहा जाए?

जनकवि शब्दकोश में नहीं है। इससे पता चलता है कि यह पुराना शब्द नहीं है। अनुमान किया जा सकता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में जिन कविताओं को जनता गाती होगी, उनके लिए जनकवि विशेषण चलता होगा। यों 1940 के दशक में लिखी अपनी कविता ‘भारतेंदु’ में नागार्जुन ने भारतेंदु हरिश्चंद्र को ‘जनकवि’ कहा है: ‘हिंदी की है असली रीढ़ गंवारू बोली/ यह उत्तम भावना तुम्हीं ने हममें घोली…/ हे जनकवि सिरमौर, सहज भाषा लिखवइया/ तुम्हें नहीं पहचान सकेंगे, बाबू-भइया।’ बाद में नागार्जुन ने अपने को जनकवि घोषित करते हुए लिखा: ‘जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं/ जनकवि हूं, सत्य कहूंगा, क्यों हकलाऊं?’ यहां नागार्जुन के अनुसार जनकवि वह है, जो जनता के जीवन-मरण के सवालों से परिचित हो, जो यथार्थ चित्रण करता हो और दो टूक कहता हो। नागार्जुन की परिभाषा के आधार पर भारतेंदु और नागार्जुन दोनों जनकवि हैं।

जनप्रियता के आधार पर बात करें तो मैथिलीशरण गुप्त की काव्य पुस्तक ‘भारत-भारती’ (1912) की याद सहज रूप से आती है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह कृति इतनी लोकप्रिय हुई कि गुप्तजी को ‘राष्ट्रकवि’ की लोकोपाधि मिली। ‘भारत-भारती’ में जनता की आजादी का प्रश्न केंद्र में था। सुभद्रा कुमारी चौहान की ‘झांसी की रानी’ कविता स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तो लोकप्रिय हुई ही, आज भी लोकप्रिय है। बच्चन की ‘मधुशाला’ (1935) की अपार लोकप्रियता को हम भूले नहीं हैं। जाति-धर्म निरपेक्ष समाज की रचना का सपना ‘मधुशाला’ की केंद्रीय भाव-भूमि है। दिनकर की कविता इतनी लोकप्रिय हुई कि जन आंदोलनों का नारा बन गई। 1940 के दशक में अगर नेहरू राजनीति में युवा हृदय-सम्राट बन गए थे, तो हिंदी कविता के युवा हृदय-सम्राट दिनकर थे। सहज भाषा, स्पष्ट कथन, जनता और समाज के व्यापक सवालों के आधार पर गुप्त, बच्चन और दिनकर भी सच्चे अर्थों में जनकवि हैं। और भी कवि हैं, जिनकी कविताएं जनता के बीच खूब लोकप्रिय हुर्इं।

1960 के दशक में बिहार के हमारे अंचल के स्कूलों में एक गीत खूब लोकप्रिय था: ‘देश हमारा, धरती अपनी, हम धरती के लाल, नया संसार बनाएंगे, नया इंसान बनाएंगे।’ यह किसकी कविता है, न हमें मालूम था, न शायद हमारे शिक्षकों को। बाद में पता चला कि प्रगतिशील कवि ‘शील’ का गीत है। दुष्यंत कुमार की गजल-पंक्तियां अक्सर साधारण लोगों द्वारा उद्धृत की जाती हैं। इन गजलों में जनता के सवाल भी हैं और भाषा का सहज रूप भी। धूमिल की काव्य पंक्तियां भी अक्सर लोग दुहराते हैं। सवाल है कि ये सभी कवि जनकवि क्यों नहीं हैं और उनकी कविताएं जनकविता क्यों नहीं हैं? कोई पूछ सकता है कि जनकविता किसे कहा जाए? जनकविता पद का प्रयोग किए बिना तुलसीदास ने वैसी कविता को मानस में इस रूप में परिभाषित किया है कि आदर पाने योग्य वही कविता है, जो सरल हो, जिसमें निर्मल चरित्र वाले व्यक्ति का वर्णन हो और जिसकी प्रशंसा शत्रु भी करें।

कविताएं जनता की जुबान पर दो कारणों से चढ़ती हैं। एक तो पाठ्यक्रमों में शामिल कविताएं प्राय: लोगों को याद हो जाती हैं। पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से शामिल होने के कारण प्रसाद, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध आदि कवियों की कुछ पंक्तियां लोगों की जुबान पर हैं। मगर भारतेंदु, मैथलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, बच्चन, दिनकर, नागार्जुन, धूमिल आदि की कविताएं अगर लोगों की जुबान पर हैं, तो इसका कारण इनके भीतर का वह काव्य-गुण है, जो उन्हें सहज ही स्मरणीय बना देता है। जनकवि वही है, जिसकी काव्य-पंक्तियां सहज रूप में याद हों, जो जन-आंदोलनों का हिस्सा रही हों और जिन्हें समझने के लिए किसी आलोचक की जरूरत न हो। सच्चे अर्थ में तो हिंदीभाषी क्षेत्र के जनकवि कबीर, सूर और तुलसीदास जैसे कवि ही माने जाएंगे। आधुनिक युग में साहित्यिकता के साथ लोकप्रियता

की दृष्टि से मैथलीशरण गुप्त और बच्चन की मधुशाला का स्थान सबसे ऊपर है। बिना पाठ्यक्रम में शामिल हुए इन काव्यकृतियों का जादू पाठकों के ऊपर बना रहा।
जनकवि जैसा कोई प्रत्यय अंगरेजी कविता में नहीं है। वहां शेक्सपियर के लिए भी इस तरह का कोई शब्द नहीं चलता। उर्दू में भी ‘शायरे-इन्कलाब’ तो है, पर ‘शायरे अवाम’ नहीं। हिंदी में भी यह कोई पद नहीं है। नागार्जुन ने जब अपने को जनकवि कहा तो भाव यह था कि वे जनता से प्रतिबद्ध कवि हैं। उनके भीतर अपनी कविता के जरिए जनता तक पहुंचने की बलवती चाह भी थी। इसलिए विषय-वस्तु के साथ शिल्प शैली के प्रयोग में उन्होंने जनरुचि का ध्यान रखा। आज जो कविताएं लिखीं जा रहीं हैं उनमें जनता के प्रति प्रतिबद्धता तो दिखती है, पर संप्रेषणीयता के उस गुण का अभाव है, जो उसे जनप्रिय भी बनाता है। इसलिए हिंदी कविता के संदर्भ में जनकविता का प्रश्न विचारणीय विषय होना चाहिए।

 

 

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First Published on October 2, 2016 4:57 am

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