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समकाल में महाभारत

से तो इस महाकाव्य की कहानियां और उनमें बसे चरित्र हमारे जीवन का हिस्सा हैं, पर महाभारत के कई और आयाम भी हैं, जिनको समझना मुझे यकायक जरूरी-सा लगने लगा है।
49 साल की रूपा गांगुली 25 साल पहले बी. आर. चोपड़ा के टीवी शो महाभारत में द्रौपदी का रोल निभाकर बेहद मशहूर हो गई थीं।

बाहर की नारेबाजी के शोर-शराबे से दूर मैं आजकल महाभारत पढ़ने की कोशिश कर रहा हंू। वैसे तो इस महाकाव्य की कहानियां और उनमें बसे चरित्र हमारे जीवन का हिस्सा हैं, पर महाभारत के कई और आयाम भी हैं, जिनको समझना मुझे यकायक जरूरी-सा लगने लगा है।
महाभारत में और महाभारत काल से पहले ऋग्वेद और पाराशर संहिता जैसे ग्रंथों में कई तरह की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं का वर्णन है। इन सबकी इकाई ग्राम से शुरू होती थी और महाजनपद तक जाती थी। वास्तव में आर्यों ने पूर्व काल में जब बसना शुरू किया, तो उन्होंने अपनी बस्तियों को विसह नाम दिया। यह कुछ परिवारों का क्लस्टर होता था। बाद में इसको ग्राम नाम भी दिया गया। कुछ ग्राम मिलकर जब जुड़ते थे, तो उसे संघग्राम कहा जाता था। इस संघग्राम का एक आयुक्त या प्रधान होता था, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुना जाता था और सारे निर्णय आपसी बातचीत के माध्यम से लिए जाते थे।
इस व्यवस्था में एक व्यवस्था और भी थी- अ-राजक व्यवस्था। इसके अंतर्गत ग्राम या संघग्राम में कोई भी प्रधान, आयुक्त या राजा नहीं होता था। यह अ-राजक थी यानी उसमें कोई राजा नहीं था। सब बराबर थे। सभी को एक जैसे अधिकार प्राप्त थे। उनमें से कोई भी समय और परिस्थिति के अनुसार निर्णायक भूमिका निभाता था, जिसमें वह आपसी परामर्श से न्याय करता था।
अराजक व्यवस्था की नीव में मूलभूत विचार पाराशर संहिता के एक श्लोक में दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि न राज्य था, न ही राजा; न दंड, न दंड नायक। सभी लोग अपने-अपने कर्तव्य का पालन करके सद्भाव से रहते थे।
न तत्र राज्यं न राजासीत न दंडो न च
दंडिक:।
धर्मोव प्रजा सर्वा संशसंतीह परस्परम।।
यहां पर कर्तव्य भी कहा जा सकता है और धर्म भी। श्लोक में धर्म शब्द का प्रयोग किया गया है, पर उसका धार्मिक आस्था, श्रद्धा या ईश्वरीय विश्वास से मतलब नहीं है, बल्कि कर्तव्य, दिशाबोध कराने वाली रिता से है।
वास्तव में वैदिक और पूर्व वैदिक काल का रिताबोध आर्यों की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसी से ज्ञान गंगा उत्पन्न हुई थी, जो आज तक अविरल बह रही है। रिता का मतलब सीधी लकीर से है- वही रेखा, जो प्रकृति में प्रत्यक्ष है जैसे सूर्य का रोज पूरब से उगना और फिर एक निर्धारित गति से दूसरी दिशा में अस्त होना, दिन-रात का होना या फिर ऋतु परिवर्तन। सबकी एक सधी हुई रीत है, जो सनातन है, अकाट्य है, सत्य है, प्रत्यक्ष है। आर्यों ने प्रकृति के नियम को धर्म की नींव बनाया- रीत ही सत्य है और सत्य ही धर्म है, इसलिए धर्म सनातन है।
अराजक व्यवस्था इसी दिव्य सिद्धांत पर बनी थी। सबका अलग-अलग धर्म था या कर्तव्य था, जिसके पालन से आपसी टकराव की स्थिति कभी उत्पन्न ही नहीं हो सकती थी। सब वर्गों की कर्तव्य रेखा थी- व्यक्ति से लेकर (जैसे मनुष्य धर्म, पति/ पुत्र धर्म आदि), समुदाय (लोकधर्म), व्यवसाय और शासकीय तक (राजधर्म)। इन सभी धर्मों को सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), शुद्धता और संयम परिभाषित करते थे।
महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामाह सर्वप्रथम नमो धर्माय महते नम: यानी धर्म का वंदन करते हैं और फिर कहते हैं:
न हि सत्यादते किंचिद राज्ञा वे
सिद्धिकारकम।
सत्ये हि राजा निरत: प्रेत्य चेह च नंदति।।
यानी राजा के लिए सत्य से बड़ी और कोई चीज नहीं है और उसके पालन से ही उसको इस लोक और परलोक में आनंद मिलेगा।
भीष्म कहते हैं:
धर्मेण राज्यं विंदेत धर्मेण परिपालयेत।
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते।।
यानी राजा को धर्म अनुसार ही सत्ता को ग्रहण करना चाहिए और उसका धर्मानुसार ही पालन करना चाहिए। यानी सत्ता पाने की लिए और उस पर बने रहने के लिए गलत तौर-तरीके नहीं अपनाने चाहिए।
महाभारत में नायक या राजा के बारे में जगह-जगह नीति उपदेश है। भीष्म से लेकर विदुर तक और कृष्ण से ऋषि मुनि तक राजधर्म का रास्ता बताते हैं। सब एक मत हैं-सत्य ही धर्म की रक्षा कर सकता है (सत्येन रक्ष्यते धर्मो) और राजा का सत्यवादी होना अनिवार्य है।
महाकाव्य के राजधर्मनुशासन पर्व में कहा गया है: सत्य ऋषियों का सबसे बड़ा धन है और राजेंद्र कोई अन्य चीज लोगों का विश्वास उस तरह नहीं जीत सकती, जितना कि राजा के द्वारा बोला गया सच। दरअसल, झूठा राजा अधर्मी है, भ्रष्ट है और प्रजा का कभी भी प्रिय नहीं हो सकता।
सभी वर्गों को न्याय दिलाना भी राजा के लिए जरूरी है। राजा पक्षपात नहीं कर सकता। उसके लिए सारी प्रजा एक समान है। शांतिपर्व में कहा गया है कि दंड संहिता सबके लिए एक समान है। उसे दुष्कर्मियों को हतोत्साहित और शुभकर्मियों को प्रोत्साहित करना चाहिए। वह किसी को भी हत्या, आगजनी, लूट, बलात्कार आदि की छूट नहीं देती है।
महाभारत धर्म की शिक्षा देता है, पर उसकी कथा धर्म के नाम पर अधर्मी कृत्यों पर आधारित है। जहां एक जगह कहा गया है कि सत्य, अहिंसा, अस्तेय, शुद्धता और संयम ही धर्म को परिभाषित करते हैं, तो लगभग सभी पात्र इस रीत को नहीं निभाते हैं। फलस्वरूप पांडव और कौरव दोनों ही उसके भीषण परिणाम झेलते हैं और एक गौरवशाली सभ्यता अस्त हो जाती है। विष्णु अवतार कृष्ण भी अंत में अपने वंश को नहीं बचा पाते हैं।

धर्म के नाम पर अधर्म स्वीकार करना या मूक दर्शक बने रहना रीत के विपरीत है। अप्राकृतिक है। अधर्म जहां स्थापित है, वहां कुशासन ही होगा, क्योंकि नायक असत्य से प्रेरित है। वह दंड संहिता का उपयोग प्रजा के वर्गों को चिह्नित करके करता है। समद्रष्टा नहीं है। ऐसे में हाहाकार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जो पूरे समाज को ही लील जाती है।
धर्म पालन ही सुशासन है। राजधर्म की रीत ही सटीक है। ठीक वैसे ही जैसे हमारे आपके लिए स्वधर्मी होना जरूरी है। इनके पालन से ही हम अ-राजक होने की प्राकृतिक स्थिति में आ सकते हैं, पर जब तक ऐसा नहीं होता तब तक महाभारत का सूत्र लोकनायक को याद रखना चाहिए:
नरेंद्रधर्मो लोकस्य तथा प्रग्रहणं स्मतम्।

 

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