January 18, 2017

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मोहब्बत और दुनिया में लड़की

प्रेम कभी एकतरफा नहीं होता। उसकी इच्छा एकतरफा हो सकती है। इसलिए प्रेम में स्त्री और पुरुष दोनों में से किसी की भी स्थिति को कमतर करके नहीं देखा जा सकता। अल्पना मिश्र का लेख।

Author नई दिल्ली | October 9, 2016 05:21 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

अल्पना मिश्र

‘प्रेम’ शब्द आते ही कान चौकन्ने हो जाते हैं, आंखें चौड़ी और दिमाग जाग उठता है, सारी सहज स्थितियां, वैसी ही सहज नहीं रह जातीं। ऐसा भी क्या है इस शब्द में कि इसे मनुष्य के सहज जीवन से अपदस्थ कर के ही देखा जाए! सामाजिक व्यवस्था के बीच अनफिट, सामाजिक संहिताओं के विरुद्ध चुनौती की तरह तना, सबकी भौंहें टेढ़ी करता, जीवन से बाहर धकियाया जाता यह शब्द शताब्दियों से डटा हुआ है- सारे दार्शनिकों, विचारकों, भक्तों, संतों, प्रगतिशीलों, समाज सुधारकों से लेकर हाशिए पर डाल दिए गए समाज के आखिरी आदमी तक को सोचने के लिए उकसाता!  जबकि अपने वृहत्तर अर्थ में यह मानवता को एक सूत्र में पिरोने वाले मंत्र की तरह आदरणीय है। जैसे ही कोई व्यक्ति किसी अजनबी से अपने मन का कोई कोना बांट लेता है और उस अजनबी से कुछ सहानुभूति पा जाने की उम्मीद कर लेता है या अपने ही जैसी रुचियां उसमें खोज लेता है, तब वह भ्रातृत्व में लिपटे प्रेम के सूत्र को विस्तार दे रहा होता है, प्रेम का विश्वजनीन रूप तैयार कर रहा होता है। यह तो विश्वप्रेम का सामने दिखने वाला व्यावहारिक रूप है, जिसे आज पूंजी के वर्चस्व की संस्कृति की नजर लग चुकी है।

हांलाकि सिद्धांत और व्यवहार की समस्या प्राय: बनी ही रहती है। प्रेम को भारतीय मनीषियों, साहित्य सर्जकों और कलाकारों ने जितना रहस्यमय बनाया, जितना रूमानी, काल्पनिक, मांसल और आध्यात्मिक रंग दिया कि उसमें यथार्थ की दखलंदाजी के निशान ढूंढ़ना भूसे के ढेर में सूई खोजना ही होगा। ‘प्रेम ईश्वर है’, ‘प्रेम खुदा है’, ‘प्रेम के बिना सृष्टि नहीं’ आदि कह कर हाड़-मांस की जीती-जागती स्त्री को उससे बाहर कर दिया गया। उसकी हकीकत, उसकी समस्याएं, उसके सुख-दुख, उसकी अभिव्यक्तियां आदि सब अनुपस्थित! इश्क हकीकी और इश्क मजाजी दोनों में असली स्त्री गायब है और पूरा मध्यकाल स्त्री को लेकर इतना अधिक कुंठाग्रस्त दिखता है कि वह स्त्री के होने को ही खारिज करने लगता है। या तो वहां स्त्री सजी-धजी उत्तेजना पैदा करने वाली देह है या फिर ऐसी माया, जिसकी छाया पड़ने से सांप भी अंधा हो जाए। फिर प्रेम के सारे रूपकों में आने वाली यह स्त्री कहां से आती है? भले ही वह भक्त कवियों की आत्मा-परमात्मा वाले रूपक में स्त्री की भूमिका अदा करने वाली कल्पना हो! यह पतिव्रता आत्मा उनकी कल्पना-जनित स्त्री है, तो माया भी उनकी कल्पना है और रीतिकाल की कामिनी भी। फिर अगर प्रेम में शामिल स्त्री पुरुष में से एक इतना हीन हो जाता है और दूसरा वर्चस्व में, तो प्रेम की आकांक्षा, प्रेम न होकर सिर्फ कल्पना रह जाती है। जबकि प्रेम में दोनों पक्षों की समानता एक आवश्यक तत्त्व है। प्रेम में स्वार्थपरता नहीं रह जाती, अहम्मन्यता और वर्चस्व तो बिल्कुल नहीं। अहम्मन्यता प्रेम की शत्रु है, तो अधिकार भाव वर्चस्व की तरफ ले जाने वाला और निश्चित रूप से वर्चस्व बराबरी के संबंध को खारिज कर देता है।

प्रेम हीन और वर्चस्वशाली के बीच घटित नहीं हो सकता, वह बराबर की स्थिति में घटित होता है, जबकि ज्यादातर फिल्में, साहित्य और कलाएं प्रेम में भी स्त्री की हीनतर दशा को बनाए रखने को प्रोत्साहित कर रही होती हैं। यहां तक कि कुछ लेखकों की वैचारिक कोशिशों को छोड़ दें तो तमाम आधुनिक साहित्य में भी भारतीय स्त्री की रूढ़ कर दी गई छवि से छुटकारा नहीं है। वहां पितृसत्ता द्वारा स्त्री के लिए तय कर दिए गए मूल्य ही संचालित होते हैं या फिर प्रगतिशीलता के नाम पर अतिवाद- प्रेम के नाम पर केवल देह विमर्श। कुछ स्त्री रचनाकारों के हस्तक्षेप से मनुष्य स्त्री चरित्र साहित्य में अपनी जगह ले सके हैं, तथापि ज्यादातर पितृसत्ता द्वारा तैयार प्रेम का फार्मूला ही प्रचलन में बना रहा है।  प्रेम में तीन बातें जरूरी हैं- संवेदनशीलता, परस्पर आदर और दायित्वबोध। संवेदनशीलता का अर्थ ही है दूसरे की भावनाओं को इस स्तर पर समझना कि वह अपनी लगे और उसे किसी भी तरह ठेस न पहुंचे, इसका खयाल रखना और भावनाओं को आदर देना। परस्पर आदर की भावना से तात्पर्य है परस्पर रुचियों और विचारों को स्पेस प्रदान करना। यह आदर संवेदना के कई स्तरों पर बनता है। समानता के बोध के बिना यह संभव नहीं हो सकता। यह समानता का बोध एक-दूसरे को बराबरी का दर्जा देने की भावना से जुड़ा है। यहां बात एक-दूसरे के प्रति दया के कारण कुछ मोहलत देने जैसी न होकर बराबरी की साझेदारियों की है। प्रेम में निहित ये तत्त्व उसे गहरी मित्रता के भाव से जोड़ते हैं और प्रेम को स्थायित्व देते हैं। इनका अभाव प्रेम को संभव रूप में घटित नहीं होने देता। बल्कि कहना चाहिए कि पनपने ही नहीं देता। दायित्वबोध की स्थिति खयाल रखने की भावना से जुड़ी हुई है। दायित्व से तात्पर्य ठोस यथार्थ की जमीन पर एक-दूसरे का साथ देने और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी के अहसास से है। इसलिए प्रेम एक जिम्मेदार भावना भी है।

प्रेम कभी एकतरफा नहीं होता। उसकी इच्छा एकतरफा हो सकती है। इसलिए प्रेम में स्त्री और पुरुष दोनों में से किसी की भी स्थिति को कमतर करके नहीं देखा जा सकता। न ही उसकी अभिव्यक्ति के लिए कोई तय फार्मूला बताया जा सकता है। प्रेम हजार हजार रूपों में हजार स्तरों पर व्यक्त होने की क्षमता रखने वाला भाव है, जबकि उसे सीमित करके आज बाजार ने एक खास फार्मूले में बंद कर दिया है। साहित्य के पास भी प्रेम की अभिव्यक्ति की कम रूढ़ियां नहीं रही हैं! इनसे मुक्त होकर ही प्रेम के खूबसूरत हजार-हजार रंगों की अलग-अलग पहचान की जा सकेगी।  प्रेम का आज एक और नया रूप कुछ इश्क मजाजी के तौर पर दिखाई पड़ता है, जो इतना ज्यादा सांसारिक है कि किसी व्यवसाय का हिस्सा लगने लगता है, कहीं वह कैरिअर संवारने की सीढ़ी बन जाता है तो कहीं ‘बोरडम’ दूर करने या ‘फन’ के लिए एक बढ़िया युक्ति। यह प्रेम का भावुकता रहित व्यावहारिक दृष्टिकोण है। स्त्री-पुरुष दोनों के ही हाथों में पहुंचे मोबाइल और वर्चुअल दुनिया ने इसे आसान बना दिया है। दोनों ही बिना किसी नुकसान के चैट कर सकते हैं और जब चाहें उसे डिलीट करके प्रमाण से बच सकते हैं। जबकि अभी कुछ पहले तक भी पत्र एक स्थायी प्रमाण हुआ करते थे और उनके कथ्य से ज्यादा उनका पत्र होना ही लड़की को दंडित किए जाने के लिए र्प्याप्त माना जाता था। जैनेंद्र के ‘त्यागपत्र’ की मृणाल के जीवन को नारकीय यंत्रणा में झोंक देने वाले दंड को नहीं भूला जा सकता। इसके बावजूद कि इतनी टेक्नोलॉजी मनुष्य के हाथ आई है, आज भी प्रेम करने वाले जोड़ों को दृश्य और अदृश्य खाप पंचायतें हत्या जैसा जघन्य दंड देने से बाज नहीं आ रहीं। चंूकि सामाजिक व्यवस्था के भीतर प्रेम शामिल ही नहीं है, इसलिए वह व्यवस्था का प्रतिपक्ष रचता है और उसमें तोड़-फोड़ मचाता है।
इस तरह प्रेम के गाने सुनने, लवस्टोरी वाली फिल्में पसंद करने और प्रेम के मिथकीय चरित्रों का आदर करने वाला समाज, यथार्थ में घटित होने वाले प्रेम संबंधों को सहज भाव से स्वीकर न करके या उन्हें दंडित कर के प्रेम के प्रति अपने दुहरे मानदंड को गर्व से दर्शाता है।

 

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First Published on October 9, 2016 5:20 am

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