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आत्मप्रचार का मुलम्मा

अधिकतर नए रचनाकारों ने अपनी रचना पर भरोसा करने की जगह विज्ञापन के उन सारे औजारों का उपयोग करना शुरू कर दिया, जो उन्हें बाजार ने उपलब्ध कराए।
Author February 26, 2017 04:34 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

समाज और राजनीति की तरह साहित्य में भी युवाओं से कुछ आदर्श की उम्मीद की जाती है। आम धारणा है कि नई पीढ़ी में विद्रोही चेतना होती है। इसी चेतना से वह पुरातन जड़ता को तोड़ कर प्रगति का नया मार्ग प्रशस्त करती है। अगर नई पीढ़ी अपनी विद्रोही चेतना से युक्त रचनात्मक हस्तक्षेप द्वारा साहित्य को गति प्रदान करने में विफल हो जाती है तो साहित्य में ठहराव आना तय है। हिंदी साहित्य का इतिहास देखें, तो हर दौर में नई पीढ़ी ने साहित्य को गति प्रदान की है। हर नई पीढ़ी ने अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी के साहित्यिक मूल्यों और प्रतिमानों से अथक संघर्ष करते हुए अपने को स्थापित किया। हिंदी साहित्य के विकास में पीढ़ियों के इस संघर्ष की केंद्रीय भूमिका रही है। हर दस साल बाद एक नई पीढ़ी आती गई और पूर्ववर्ती परंपरा का निषेध कर या उसमें कुछ नया जोड़ कर अपनी महत्ता और सार्थकता को सिद्ध भी किया। यह स्वाभाविक सिलसिला दो हजार तक चला।

नब्बे का दशक बीतते-बीतते आर्थिक उदारीकरण का प्रभाव पूरे साहित्यिक परिदृश्य पर दिखाई देने लगा। साहित्यिक संस्थाएं, प्रकाशन व्यवसाय और लेखकीय चरित्र का क्षरण स्पष्ट होने लगा। नई पीढ़ी का अपने रचनात्मक उन्मेष के साथ आगमन और संघर्षों द्वारा स्थापित होने की स्वाभाविक परंपरा अवरुद्ध हो गई। फिर कृत्रिम तरीके से नई पीढ़ी के निर्माण की परियोजना आरंभ हुई, जिसकी शुरुआत ‘वागर्थ’ के नवलेखन अंक से हुई। बाद में नई पीढ़ी को ‘नया ज्ञानोदय’ का मंच मिला और उनकी पुस्तकें भी ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुर्इं। इस तरह भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में कृत्रिम तरीके से साहित्य में गति पैदा की गई। उस समय हिंदी की लगभग सभी पत्रिकाओं ने नवलेखन अंक निकाले। इस प्रक्रिया से लगभग चार-पांच दर्जन लेखक सामने आए। इतने लेखकों का एक साथ आगमन हिंदी साहित्य के इतिहास में अभूतपूर्व था। इनमें लगभग आधी संख्या महिला रचनाकारों की थी।
कहने का तात्पर्य यह कि दो हजार के बाद हिंदी में जिस नई पीढ़ी का आगमन हुआ वह स्वत:स्फूर्त नहीं था, बल्कि उसे बकायदा योजनाबद्ध ढंग से लाया और ‘प्रमोट’ किया गया। यह शायद पहली बार हुआ कि एक पूरी नई पीढ़ी बगैर किसी साहित्यिक संघर्ष के साहित्य की मुख्यधारा में एकाएक खड़ी हो गई। अधिकतर रचनाकारों के पास न तो कोई साहित्यिक प्रशिक्षण था और न हिंदी की जातीय परंपरा का कोई बोध। हिंदी की जातीय परंपरा से काट कर तैयार की गई यह पीढ़ी प्रतिभा नहीं, अवसर विशेष की उपज थी।

अधिकतर नए रचनाकारों ने अपनी रचना पर भरोसा करने की जगह विज्ञापन के उन सारे औजारों का उपयोग करना शुरू कर दिया, जो उन्हें बाजार ने उपलब्ध कराए। साहित्य की जगह साहित्येतर साधनों का जबर्दस्त इस्तेमाल शुरू हुआ। साहित्यिक महत्त्वाकांक्षा रखने वाला आज का युवा यह अच्छी तरह जानता है कि पहले ‘पद’ और ‘पोजीशन’ ठीक करो, रचनाकार तो अपने-आप बन जाओगे।’ चूंकि रचना से रचनाकार की महत्ता का निर्धारण नहीं हो रहा है, इसलिए रचनाकार की पहली प्रतिबद्धता रचना के प्रति न होकर उन साहित्येतर कारणों के प्रति है, जिससे उसकी महत्ता स्थापित होती है। उसका पूरा ध्यान और जोर बेहतर रचना लिखने पर न होकर ‘स्थितियों’ को ‘मैनेज’ करने पर होता है। जो लेखक की ‘स्थितियों’ को जितना अधिक ‘मैनेज’ कर लेता है, वह उतना ही बड़ा रचनाकार घोषित हो जाता है। लेखक की निगाह में वे कारक महत्त्वपूर्ण हैं, जिनकी बदौलत उसकी कमजोर रचना भी महान सिद्ध हो जाती है।

सन दो हजार के बाद साहित्य में व्यापक तौर पर प्रचलित और स्थापित हुई इस प्रवृत्ति ने आज पूरे हिंदी साहित्य को अपनी चपेट में ले लिया है। साहित्य की दुनिया में कदम रखने वाला कोई भी नया रचनाकार सफलता के इसी नुस्खे को अपना कर आगे बढ़ना चाहता है। उसके लिए साहित्य संवेदना का विषय न होकर प्रबंधन का विषय बन जाता है। वह मानव आत्मा का शिल्पी न होकर उसका कारोबारी और प्रबंधक बन जाता है। वह इस बात को अच्छी तरह समझता है कि वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में अच्छी रचना लिखने से अधिक आक्रामक प्रचार-प्रसार और जनसंपर्क अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि एक उपन्यास या कहानी संकलन के प्रकाशित होते ही वह स्वयं को हिंदी का सबसे बड़ा कथाकार घोषित कराने के अभियान पर निकल जाता है। अपने इस अभियान में उसे कुछ संपादकों, समीक्षकों और मित्र रचनाकारों का साहित्येतर कारणों से समर्थन भी मिल जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह अपने को प्रेमचंद और रेणु समझने लगता है। इस मानसिक असंतुलन की दशा में अगर उसे कोई हिम्मत करके कुछ सही बता देता है, तो वह उसकी साहित्यिक हत्या करने के लिए दौड़ पड़ता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि आज हिंदी में कोई भी सार्वजनिक रूप से सच बोलने को तैयार नहीं है। सच का दायरा व्यक्तिगत तौर पर निजी बातचीत तक सिमट गया है। यह दृश्य बहुत आम हो गया है कि कोई किसी रचना या रचनाकार की मंच पर खूब प्रशंसा करे और व्यक्तिगत बातचीत में उसकी घोर निंदा। इससे पूरा का पूरा साहित्यिक वातावरण पाखंडपूर्ण हो गया है। निजी और सार्वजनिक के बीच इतना अलगाव पहले कभी नहीं था, जितना आज हो गया है।आज का रचनाकार इस अर्थ में जरूर ‘अनकन्वेंशनल’ है कि उसने आत्ममुग्धता की सारी सीमाएं तोड़ दी हैं। वह बेशर्मी की हद तक आत्मप्रचार में लगा हुआ है। इसके दो ही मायने हो सकते हैं। या तो उसे यह मालूम है कि उसकी रचना निहायत कमजोर है या उसे पाठकों पर भरोसा नहीं है। रचनाकारों की आत्ममुग्धता का आलम यह है कि वे अपने सिवा न तो किसी का कुछ पढ़ते हैं, न किसी पर कुछ लिखते और बोलते हैं। किसी विषय पर बोलते समय वे अपनी बात बोलते हैं और यहां तक की अपनी ही रचनाओं के उदाहरण देते हैं। वे अपनी पीढ़ी पर भी बात करके वक्त जाया नहीं करते। मैं से शुरू होकर मैं पर खत्म हो जाते हैं।

करीब तीन साल पहले तीन खंडों में प्रकाशित ‘हिंदी कहानी का युवा परिदृश्य’ में शामिल सत्ताइस स्त्री-पुरुष रचनाकारों के वक्तव्यों को पढ़ने से कुछ बेचैन कर देने वाले तथ्य सामने आते हैं। कुछ को छोड़ कर अधिकतर के लिखने के पीछे कोई सामाजिक-राजनीतिक कारण या प्रतिबद्धता नहीं है। न ही मनुष्यता को केंद्र में रख कर बेहतर दुनिया बनाने का कोई स्वप्न ही। अधिकतर रचनाकारों ने अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के दाय को स्वीकार करने से परहेज किया है। कुछ इस तरह कि हिंदी कहानी की परंपरा उन्हीं से शुरू हो रही है। एक ऐसे समय में जब बाजार निर्मम और कू्रर हो चुका है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, आदिवासी विस्थापित हो रहे हैं, भ्रष्टाचार चरम पर है, आम आदमी का जीना दूभर है, स्त्रियां असुरक्षित हैं, तब एक सरोकार विहीन, गैरप्रतिबद्ध और अराजनीतिक युवा परिदृश्य से कभी-कभी डर लगने लगता है।
पर अंधेरे में ही नक्षत्र जगमगाते हैं। नई पीढ़ी में कुछ जरूर हैं और आ रहे हैं, जो साहित्य की दुरभिसंधियों से दूर हैं। जो न तो आत्ममुग्ध हैं और न ही बेशर्म आत्मप्रचार में लगे हैं। विपरीत माहौल के बावजूद उन्हें आज भी अपनी रचनाओं पर भरोसा है। उनमें अपनी रचनात्मक आभा की चमक है। पर दुखद तो यही है कि आलोचना भी नकली चमक के पीछे भाग रही है।

 

 

समाज और राजनीति की तरह साहित्य में भी युवाओं से कुछ आदर्श की उम्मीद की जाती है। आम धारणा है कि नई पीढ़ी में विद्रोही चेतना होती है।

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