March 26, 2017

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कलुष घुला मानस

पिछले कुछ वर्षों से काले धन के विरुद्ध गंभीर बातें हो रही हैं, इस पर निश्चय ही बातें होनी चाहिए। पर, कभी-कभी काले मन की भी बातें होनी चाहिए।

Author February 26, 2017 04:26 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

देवशंकर नवीन

पिछले कुछ वर्षों से काले धन के विरुद्ध गंभीर बातें हो रही हैं, इस पर निश्चय ही बातें होनी चाहिए। पर, कभी-कभी काले मन की भी बातें होनी चाहिए। काला धन तो गिने-चुने लोगों के पास होता है, जबकि काला मन अब साधारण नागरिक तक फैल गया है। आजादी से पहले भारतीय नागरिक काले मन से यथासाध्य परहेज करते थे। वे धर्मभीरु अवश्य होते थे, पर उनमें आस्था होती थी। आस्था जैसे शब्द यद्यपि कई आधुनिक चिंतकों को परेशान करने लगते हैं, उन्हें आनन-फानन इसमें रूढ़ियां नजर आती हैं, पर तथ्यत: आस्था हर समय पाखंड की ओर ही नहीं ले जाती। संबंध-मूल्य, नीति-मूल्य, समाज-मूल्य, राष्ट्र-मूल्य के प्रति आस्था सदा अच्छी बात होती है। इन मूल्यों में गहरी आस्था रखने वाले नागरिकों से ही एक बेहतर राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है।  उस दौर के नागरिकों में दैवी विधान के प्रति आस्था और अधर्म से भय होता था। वह उन्हें नैतिक और विवेकशील बने रहने की प्रेरणा देता था। पर आज का मनुष्य भयमुक्त हो गया है, साहसी हो गया है, उसे किसी मूल्य का भय नहीं होता। पाप के आतंक और पुण्य के सम्मोहन से वह मुक्त हो चुका है। वैयक्तिक विलास में वह इस तरह लिप्त है कि नैतिकता जैसी बातें उसे फिजूल लगती हैं। उसे डर होता है तो सिर्फ शासकीय दंड से। पर वह मुतमइन है कि वैभव और पराक्रम से शासकीय दंड-विधान का चरित्र बदला जा सकता है, दंड को पुरस्कार में परिणत किया जा सकता है। इसलिए वह वैभवशाली होने की जुगत बिठाने में लिप्त है। वह आश्वस्त है कि अनैतिक हुए बिना शीघ्रता से वैभवशाली और पराक्रमी नहीं हुआ जा सकता। सो, वह वैभव जुटाने में लिप्त है।

उसे यह नहीं दिखता कि वैभव जुटाने का यह रास्ता पाशविकता की ओर जाता है। अपनी भारतीयता की पहचान के लिए उसे इस पाशविकता से मुंह मोड़ना होगा। अब इस बात का निर्णय कठिन है कि इसकी शुरुआत कौन करे- राजनेता, अध्यापक, धर्माधिकारी या हरेक नागरिक! वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में दुनिया भर के बौद्धिक समुदाय लंबे समय से अपने-अपने देश को प्रभुत्व-संपन्न करने में जुटे हैं। विगत दो-तीन दशकों में एक से एक सैद्धांतिक बातें प्रस्तावित हुई हैं। अपने राष्ट्र की पारंपरिक ज्ञान-संपदा के अनुरक्षण, शोधानुसंधान और शैक्षिक/ प्रौद्योगिक उन्नयन, व्यापार-विपणन के विकास जैसे राष्ट्रोत्थान के मसले पर बातें होती आ रही हैं। पर हकीकत कुछ और है। समीक्षात्मक दृष्टि डालने पर हर दिशा में दिखावे की स्थिति सामने आती है। नागरिक परिदृश्य में इन सबका निहितार्थ व्यक्ति-हित में फलीभूत होने लगा है। असल में सारे मामलों का जुड़ाव हमारे समय के प्रशिक्षण से है। नागरिक मनोवृत्ति का गठन रातो-रात नहीं होता। देश की शैक्षिक-प्रणाली की मूल संरचना से इसका गहरा रिश्ता होता है। निरंतर उत्थान की बात करते हुए भी गत चार दशक से हमारी शैक्षणिक व्यवस्था अधोमुखी हुई है। हालांकि इस गिरावट की बुनियाद हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले रख दी थी। शिक्षा-जगत में इन वर्षों में निश्चय ही ज्ञान की अनेक नई शाखाएं विकसित हुर्इं, विशेषज्ञता आधारित ज्ञान दिया जाने लगा, प्रबंधन-कौशल की दीक्षा दी जाने लगी। जीवन-संचालन की हर शाखा में प्रबंधन की डिग्री मिलने लगी। प्रशिक्षुओं को अपने ज्ञान, कौशल और उत्पाद को श्रेष्ठतम साबित करने की पद्धति और अधिकतम उपार्जन के कौशल की दीक्षा दी जाने लगी। पर विशेषज्ञता की ओर केंद्रित होने के इस चक्कर में नैतिक, मानवीय और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का पाठ ओझल रह गया। प्रशिक्षुओं को बताया जाने लगा कि जनता को सम्मोहित करो, सम्मोहित जनता मंत्रमुग्ध होकर तुम्हारे पीछे आएगी। सम्मोहन की क्षमता तुममें नहीं है, चिंता मत करो; जिनमें है, उन्हें खरीद लो, उनसे विज्ञापन कराओ। सम्मोहित नागरिक सोचता नहीं, अनुसरण करता है। इस क्रम में उन्हें कभी आगाह नहीं किया गया कि इस उन्नति-उपलब्धि के दौरान उन्हें अपनी नैतिकता, मानवीयता और राष्ट्रीयता को कलंकित होने से बचाए रखना है।

इन प्रशिक्षकों ने सम्मोहन को, उपभोक्ताओं के चित पर विजय को प्राथमिक साबित कर दिया। वस्तुनिष्ठता उनके लिए दोयम दर्जे की हो गई। व्यापार, शिक्षा, शोध, राजनीति, धर्मोपदेश हर क्षेत्र में इस समय यही सम्मोहन जारी है। प्रवंचन, प्रबंधन और विज्ञापन द्वारा जनता को सम्मोहित किया जाता है। कवि, लेखक, चिंतक, पत्रकार, शिक्षक, नेता, अफसर, धर्माधिकारी सबके सब उपदेशक हो गए हैं। अपने निर्धारित कर्तव्यों से निरंतर विमुख रहने वाले इन उपदेशकों के उपदेशों से उनके आचरण की कोई संगति नहीं बैठती। ये उपदेशक समुदाय भी अपनी तरह के सम्मोहन में रहते हैं। पांच-छह दशक पूर्व तक के किशोर-युवा स्वाधीनता सेनानियों की कहानियों, शिक्षकों-राजनेताओं-समाजसेवकों की जीवनधारा से प्रेरणा लेते थे। विद्यालयों में नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता था। ऋषियों-मुनियों-महात्माओं की कहानियां बता कर बच्चों में नैतिकता और विवेकशीलता का बीजारोपण किया जाता था। आज के किशोरों को उन कहानियों से कोई अनुराग रह नहीं गया है; शिक्षक-नेता-अफसर-पुलिस-पत्रकार के आचरण उन्हें सम्मोहित नहीं करते; ले-देकर वे अपने पिता की ओर मुखातिब होते हैं। पिता स्वयं किसी अनंत प्यास से दग्ध हैं। उनकी रुचि अपनी संतानों को विवेकशील इनसान बनाने के बजाय पैसा पैदा करने वाली मशीन बनाने में अधिक रहती है। खूब पैसे कमाने की यह भोग-वृत्ति जिस पीढ़ी को बचपन से सिखाई गई; वह पीढ़ी युवावस्था और प्रौढ़ावस्था में आकर कर्तव्य-निष्ठा की ओर कहां से उन्मुख होगी!

बेशुमार धन कमाने की लिप्सा में आज का नागरिक जिस तरह मोहासक्त है, वह भयकारी है। इस लिप्सा के तमाम प्रयास अमानवीयता और विवेकहीनता से निर्देशित हैं। हजारो वर्षों की विकास-प्रक्रिया में जो समाज सभ्य, व्यवस्थित और विवेकशील हुआ है; उसमें नीति-मूल्य की मानवीय व्यवस्था गहनता से बसी हुई है। उक्त मोहासक्ति से उस व्यवस्था का मूल्य निरंतर लांछित होता है। कला, साहित्य, सिनेमा, शिक्षा, व्यापार, लोकतांत्रिक व्यवस्था, संचार-नीति हर दिशा में मानवीय प्रयासों के विधान बदल गए हैं। हर क्षेत्र के कर्ताओं का उद्देश्य नितांत निजी उत्थान में लिप्त हो गया है। समाज-व्यवस्था, आचार-संहिता, मानवीय सरोकार, नैतिक मूल्यों की रक्षा उनके लिए निरर्थक है। तमाम दिशाओं में मानवीय मूल्य का ऐसा क्षरण निश्चय ही राष्ट्रघाती, और अंतत: आत्मघाती है। बेशुमार धन कमाने की अनंत प्यास को तृप्त करने में तमाम नैतिक मूल्यों की उपेक्षा व्यक्ति की मनुष्यता और उसकी राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। काले मन की बात हो, तो संभवत: आज के नागरिकों को अपने मूल्यविहीन आचरण पर लगाम लगाने की इच्छा हो। मन की कालिमा दूर हो जाए, मन अकलुषित हो, उदार हो, मानवीय हो, अपने हर उपार्जन की पद्धति में मनुष्य देखना शुरू करे कि उनके आचरण से मानव-मूल्य या कि राष्ट्र-मूल्य पर आंच न आए; तो निश्चय ही वह बेहतर समाज के हित में होगा; और अंतत: स्वयं उस मनुष्य के हित में होगा। अकलुषित मन का अर्थ है स्वस्थ मन। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है; स्वस्थ मन में ही स्वस्थ विचार आता है; और स्वस्थ विचार ही राष्ट्र को उन्नति की ओर ले जाता है। जिस देश के नागरिकों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पल-पल वंचना और कलुष का शिकार होगा, वहां बौद्धिक और नैष्ठिक दायित्व की उम्मीद नहीं की जा सकती।

 

 

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First Published on February 26, 2017 4:26 am

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