December 06, 2016

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कारागार और कलम

जेल-साहित्य का इतिहास सिर्फ हमारे यहां का ही नहीं है, विश्व साहित्य में भी इसकी बहुत अहम भूमिका रही है। कविता का लेख।

Author November 5, 2016 23:33 pm
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कविता

फ्रांसीसी लेखक अलेक्जेंडर ड्यूमा के मुताबिक ‘दुनिया का पूरा साहित्य महज चार बातों पर टिका हुआ है-युद्ध, प्रेम, अपराध और शक।’ इस बात से शायद ही किसी को इनकार हो। इसका ताजातरीन उदाहरण तिहाड़ जेल में बंदी रहे सुब्रत राय की ‘लाइफ मंत्र’ और यरवदा जेल के अनुभवों पर आधारित ‘संजय दत्त’ की ‘सलाखें’ हैं। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने भी अपने जेल अनुभवों पर आधारित किताब लिखने की घोषणा की है। इसे साहित्य का अपराधीकरण तो कतई नहीं कहा जा सकता। हां, यह अपराधियों का साहित्यीकरण जरूर है। चलताऊ भाषा में इसे बंदी-साहित्य या जेल-साहित्य भी कहते हैं। वास्तव में यह ऐसा साहित्य है, जो किसी भी व्यक्ति के जेल में रहने के दौरान लिखा गया हो। यों तो अपराध और साहित्य का रिश्ता बहुत पुराना है।

सोचनेवाली बात यह ठहरी कि ऐसी कौन सी ऐसी बात जेल में होती है जो लोगों को लिखने-पढ़ने या अन्य तरह के सृजन की ओर मोड़ देती है। शायद उनका अकेलापन। समाज और परिवार से कट जाना। और सबसे बढ़कर जो बात होती है वह यह कि लिखना हमें जहां सुकून देता है, वहीं अपने परिवेश से, मन:स्थिति से, आसपास से जुड़ने का मौका भी देता है। थोड़ी देर को सब परेशानियों से मुक्त होने का हल भी होता है यह। बाहर की दुनिया में रहते हुए कोई लेखक जिस एकांत की कामना करता है, जिसके लिए पहले लोग जंगलों तक में चले जाते थे, जेल उसे एकमुश्त वह एकांत और समय देता है। और तो और, अपने लेखक होने, दुनिया में एक नई पहचान पाने और अगर छवि दोषी की हो तो उसे साफ करने और चमकाने का अवसर भी होता है यह।

लिखने के लिए जरूरी है कि हम अपने बीते कल पर एक बार फिर से सोचें। सोचने पर हमें अपनी गलतियां बीते समय के आईने में साफ-साफ दिखाई देती हैं। और इस तरह हम अपनी कमियों-गलतियों को भी एक बार नए सिरे से देख-समझ पाते हैं। शायद, इसीलिए रोमानिया में एक कानून है कि सजा भुगतने की अवधि में लिखी और छपी किताब के आधार पर सजा एक महीने के लिए कम हो जाती है। यह एक बढ़िया कानून है। इसकी वजह से बहुत सारे कैदियों के भीतर कुछ सकारात्मक परिवर्तन भी आते हैं। शर्त बस यह रहती है कि इससे साहित्य का, पाठकों का कोई हित हो रहा है या नहीं। कुछ नया, बेहतर इस लेखन में उभर कर आ रहा है या नहीं? एक उम्मीद बनती है कि सुब्रत राय और संजय दत्त की किताबों से भी। जो आगे के वक्त में शायद लोगों के लिए सीख या प्रेरणा बने।

जेल-साहित्य की हमारे यहां लंबी परंपरा रही है। हालांकि, यह दौर कुछ और था। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के दौरान हमारे तमाम नेता और साहित्यकारजेलगए। वहां उन्होंने किताबें लिखीं, जो आगे चलकर मील का पत्थर का साबित हुर्इं। तत्कालीन ब्रिटिश् हुकूमत के लिए जरूर वे अरोपी या अभियुक्त थे, लेकिन आजादी के बाद यही लोग अपने समाज के नायक बने। माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘क्यों गाती हो, क्यों चुप हो जाती हो, कोकिल बोलो तो?’ जेल में लिखी गई थी। यशपाल ने भी जेल में रहकर लिखा। बाद में तो वे बड़े लेखक हुए। वे ‘बिस्मिल’, भगत सिंह और चंद्रशेखर ‘आजाद’ के साथी थे। बिस्मिल खुद भी बेहतरीन कवि, शायर और बहुभाषी लेखक थे। ये वे लोग थे, जिन्होंने न केवल कलम से क्रांति की मशालें जलार्इं, बल्कि उस जंग में वे एक सक्रिय सहयोगी की तरह भागीदार रहे। यशपाल का तो विवाह भी प्रकाशवती पाल से जेल के भीतर ही संपन्न हुआ था। प्रकाशवती खुद भी क्रांतिकारी थीं। विवाह के बाद प्रकाशवती को रिहा कर दिया गया। जेल से मुक्त होने के बाद वे हरिवंशराय बच्चन के घर मेहमान बन कर रहीं।

1936 में अपनी रिहाई के बाद यशपाल ने अपना सारा जीवन आजादी के लिए संघर्ष और रचनाधर्मिता को समर्पित कर दिया। जितनी धार उनके सशस्त्र आंदोलन में थी, उससे जरा भी कम कलम में न थी। जेल में लिखी उनकी कहानियों का संकलन ‘पिंजड़े की उड़ान’ बहुत चर्चित रहा। मन्मथनाथ गुप्त ऐसे लेखक थे, जिन्होंने अंडमान निकोबार जेल में रहकर अपनी और अपने साथियों की सजा को ‘अंडमान की गूंज’ नामक किताब में दर्ज किया है। यह किताब पढ़ने वालों को भीतर तक हिलाती है। यह अंतहीन यात्रा गांधीजी से लेकर नेहरू और जयप्रकाश नारायण तक चलती रही। भारत का एक नए सिरे से खोज ‘डिस्कवरी आॅफ इंडिया’, सत्य के साथ गांधीजी के प्रयोग ‘मॉय एक्सपेरिमेंट विद् ट्रुथ’ और जयप्रकाश नारायण की तिहाड़ जेल से जुड़ी ‘प्रिजन डायरी’ का अनुभव, जेल यात्राओं से छनकर ही तो सामने आए थे। हमारे यहां अंग्रेजों द्वारा कागज-कलम मुहैया न किए जाने पर जेल की दीवारों पर कोयले से लिखनेवाले क्रांतिकारी शासक और शायर बहादुर शाह ‘जफर’ भी हुए। दीवार पर लिखी गई वह प्रसिद्ध गजल आज भी लोगों को टीस देती है कि -‘दो गज जमीं भी न मिली कूए-यार में…।’

अज्ञेय की ‘शेखर एक जीवनी’ भी जेल में ही सोची गई। उसके पहले खंड की ड्राफ्टिंग जेल में ही हुई थी, तब जबकि अज्ञेय अपने बचने की उम्मीद छोड़ चुके थे। तब एक रात के अंधेरे में उनके अंदर ‘शेखर’ की कहानी कौंधी। शेखर की भूमिका लिखते हुए अज्ञेय ने खुद कहा है-‘यह जेल के स्थगित जीवन में केवल एक रात में महसूस की गई घनीभूत पीड़ा का आख्यान है।’ उन्हें मृत्युदंड की सजा लगभग तय थी और अपने छीजते हुए जीवन को वे इस क्षण के आलोक में पुनर्सृजित, व्याख्यायित और आख्यायित कर रहे थे। यही नहीं, अपनी एक कहानी ‘दारोगा अमीरचंद’ में वे कहते हैं, ‘यों तो यह जिस जेल की बात है, उसका नाम मैं बता देता पर एक कहानी के नाम पर मैं किसी को भी दुखी नहीं करना चाहता। फिर कहानी चाहे सच्ची ही क्यों न हो।’ रामवृक्ष बेनीपुरी के बारे में कहा जाता है कि वे सिर्फ कलम के सिपाही नहीं थे बल्कि सक्रिय स्वातंत्रता सेनानी थे। दर्जन से अधिक बार जेल जाने वाले इस शख्स ने अपनी जिंदगी के आठ साल जेल में बिता दिए। उनका प्रसिद्ध नाटक ‘अंबपाली’ जेल में ही लिखा गया और न जाने कितनी सारी कहानियां भी। ‘कैदी की पत्नी’ और ‘जंजीरें और दीवारें’ जिनमें प्रमुख हैं, जिसमें जेल और साहित्य का रिश्ता साफ और सीधे तौर पर दीखता है।

जेल-साहित्य का इतिहास सिर्फ हमारे यहां का ही नहीं है, विश्व साहित्य में भी इसकी बहुत अहम भूमिका रही है। इसका एक कारण यह भी है की गुलामी का एक लंबा इतिहास हम सबके अतीत से जुड़ा हुआ है। पहले के अधिकतर लेखक स्वतंत्रता आंदोलन या फिर तत्काल शासन की गलत नीतियों का विरोध करने के कारण जेल गए। इसमें से कुछ तो पहले से ही लेखक थे। कुछ अपने सजा-काल में लेखक बन गए। कहने की यह बात नहीं कि उनके पास पहले से ही एक सोच, एक विचारधारा और एक पुख्ता आधार था इन रचनाओं के लिए। वे सिर्फ जेल में सामने खड़े हुए पहाड़ से वक्त और खालीपन को भरने की खातिर नहीं लिख रहे थे। उनके समक्ष लिखने का एक खास मकसद था और वह कम से कम आत्मप्रसिद्धि तो नहीं थी। उनके लिए यह सब कुछ अपनी आजादी, अपने परिवेश और खुद अपने को भी खत्म होने से बचाए रहने की जद्दोजहद थी और हर तरह के बंधन से खुद मुक्ति भी।

दोस्तोव्स्की ऐसे लेखक थे, जिन्हें राजद्रोह में फांसी की सजा मिली थी। अंतिम वक्त पर बदलकर उसे आजीवन करावास किया गया। आस्कर वाइल्ड को दो साल की कैद हुई थी। उन्होंने जो कविता लिखी, वह बहुत मशहूर हुई। ‘बलाड आफ दि ग्योल’ उनका मशहूर काव्य-संग्रह है। उनके इसी काव्-संग्रह में वह मशहूर कविता है,‘ आदमी जिसे प्यार करता है, उसे मार डालता है।’ इसी तरह, वाल्टर रिले पर राजद्रोह का मुकदमा बारह साल तक चलता रहा और इस अवधि में उन्होंने ‘विश्व का इतिहास’ लिख डाला। इससे उनकी सजा में कोई कमी नहीं हुई। जेम्स प्रथम नामक एक शासक ने सजा को निर्ममता से लागू किया, हालांकि वह खुद भी लेखक था। हालांकि, तब तक न वह शासन था, न शासन काल, जिसके लिए रिले राजद्रोही थे। कहीं न कहीं से सनकी शासक और साथ ही लेखक जेम्स प्रथम के लिए यह सजा लेखकीय जलन और प्रतिस्पर्धा का भी मामला थी।

‘पिलग्रिम प्रोसेस’ के लेखक जॉन बेनयान कुछ धार्मिक मतभेदों के आधार पर सारी उम्र जेल में ही रहे और अपनी अधिकतर रचनाएं उन्होंने जेल में ही लिखीं। ‘रोबिंसन क्रूसो’ के ख्यात लेखक डेनियल डियो भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने के कारण जेल गए। इस कड़ी में आनेवाले न जाने कितने लोकप्रिय लेखकों के नाम हैं, जिन सबकी चर्चा यहां संभव नहीं। पाकिस्तान के मशहूर शायर फैज अहमद ‘फैज’ लंबे समय तक जेल में रहे। उनकी तमाम मशहूर रचनाएं जेल में ही लिखी गर्इं। ‘संजय दत्त’ और ‘सुब्रत राय’ की तर्ज पर निबंधकार ‘फ्रांसिस बेकन’ का नाम भी लेसकते हैं, जो सरकारी कोष में गड़बड़ी करने के आरोप में जेल गए थे। ‘ओ हेनरी’ जिनकी तुलना चेखव और मोपांसा से की जाती है, उन पर भी गबन का आरोप था। इस तरह कहा जा सकता है की अपराधियों के लेखक बनने की परंपरा कोई नई नहीं है। अपराध के बारे में भी कहा जाता है कि वह कुछ नया और अलग करने की चाह में ही उपजता है। कहीं न कहीं लेखन की भी सर्जना कहीं वहीं से उपजती है, पर एक जहां सकारात्मक है, दूसरा नकारात्मक। हम अपनी सोच को किस दिशा में विकसित करें, उसे किस तरफ लगाएं, दरअसल, यह हमें खुद ही तय करना होता है और अपना निजी विवेक ही इसमें हमारा साथ देता है। हालंकि, यह भी कहा जाता है कि ‘ओ हेनरी’ पर लगाया गया इल्जाम गलत था। उसकी सजा सुनाते वक्त न्यायाधीश के गला रूंध गया था।

लगभग डेढ़ दशक पहले गोवा केंद्रीय कारागार में एक कैदी थे-‘सुधीर कुमार।’ देश की तमाम ख्यात पत्रिकाओं में जिनकी चिट्ठियां बतौर पाठकीय प्रतिक्रियाएं छपती रहीं थीं। तमाम नए पुराने लेखकों के पास उनके आलोचकीय पत्र बाकायदा पहुंचते रहे। उन पर नशीली पदार्थों की तस्करी करने का आरोप था। पर सुधीर न सिर्फ खुद ही अध्ययन में रुचि लेते रहे, बल्कि न जाने कितने अन्य कैदियों को भी उन्होंने इस तरफ मोड़ा। उनकी न सिर्फ चिट्ठियां बल्कि आत्मकथा भी ‘हंस’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छपी थी। बहुत पहले सुधीर जेल से आजाद हो गए, पर हैरत की बात यह कि खुली दुनिया में दाखिल होते ही उनकी वह पहचान, उनका वह हस्तक्षेप साहित्यिक दुनिया से लगभग खत्म हो गया। आजीवन कारवास की सजा भोग रहे एक कैदी राजकुमार ने जेल में बड़ी संख्या में रचनाएं लिखकर लोगों को हैरत में डाल दिया। उनकी एक व्यक्तिगत मांग भी है कि सरकार चौदह साल तक की सजा काट चुके अच्छे आचरण वाले कैदियों की आगे की सजा माफ कर दे। कह सकते हैं कि जेल अगर बंदी को उसके बुरे कर्मों को सजा देने की जगह है तो अपने पापों का प्रायश्चित करने, फुरसत से सोचने, सही-गलत को समझने और भविष्य का रास्ता खोजने की जगह भी है। भारतीय संदर्भ में जेलों को सुधार-गृह ही माना गया है। गांधीजी, विनोबा भावे आदि ने कारागार को कभी भी यातना गृह बनाने की पैरवी नहीं की थी। ०

 

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First Published on November 5, 2016 11:33 pm

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