December 08, 2016

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चंद्रबिंदु, बिंदी और नुक्ता

भाषा का उपयोग हम दो रूपों में करते हैं- बोल और लिख कर। वैसे भाषाविज्ञान ऐसे भेद नहीं मानता।

हिन्दी।

भाषा का उपयोग हम दो रूपों में करते हैं- बोल और लिख कर। वैसे भाषाविज्ञान ऐसे भेद नहीं मानता। उसकी नजर में, जो हम बोलते हैं, वास्तव में भाषा वही है। उसका लिखित रूप उसके मौखिक रूप की अभिव्यक्ति का एक साधन मात्र है। फिर भी, भाषा के लिखित रूप को उसके मौखिक रूप की प्रतिकृति या प्रतिच्छाया नहीं कहा जा सकता। वास्तव में भाषा के इन दो रूपों के दो अलग-अलग धरातल होते हैं। दोनों की अपनी-अपनी आंतरिक व्यवस्थाएं होती हैं।
भाषा के मौखिक रूप का आधार ध्वनि होती है और लिखित रूप का आधार लिपि। लिपि के दो भेद हैं- चित्रलिपि और ध्वनिलिपि। चित्रलिपि की प्रत्येक आकृति सीधे अर्थ को व्यक्त करती है; जबकि ध्वनि-लिपि में किसी भी भाषा की प्रत्येक ध्वनि को एक लिखित रूप दिया जाता है। पर ध्वनिलिपि की किसी भी आकृति (वर्ण) का अपना कोई अर्थ नहीं होता। वे आपस में मिल कर अर्थवान इकाइयों (शब्द, शब्दांश) का निर्माण करती हैं। चित्रलिपि की कठिनाई यह है कि उसमें चित्रों की संख्या बहुत अधिक होती है; जितनी अभिव्यक्तियां उतने चित्र; जबकि ध्वनिलिपि में लिपि-चिह्नों (वर्णों) की संख्या बहुत कम होती है। सीमित लिपि-चिह्नों (वर्णों) के विविध संयोजनों से असंख्य शब्द/ शब्दांश बनते हैं या बनाए जा सकते हैं, जो अर्थवान होते हैं।

आदर्श स्थिति यह मानी गई है कि किसी भाषा में उसकी एक ध्वनि को लिखने के लिए एक वर्ण हो। लेकिन किसी भी भाषा में ऐसा संभव नहीं हो पाता। इसका कारण है कि ध्वनि अपनी मूल प्रकृति में अत्यंत ‘तरल’ होती है; जबकि लिपि-चिह्न यानी वर्ण अपनी मूल प्रकृति में उतने ही ‘स्थिर’ होते हैं। ध्वनियों की तरलता का ही परिणाम है कि भाषाएं जिस गति या जिस अनुपात में बदलती या नया आकार ले लेती हैं, उसी अनुपात में या उसी के समांतर उनकी लिपियों में बदलाव नहीं आता। हम ऐसा कर ही नहीं सकते। अंगरेजी भाषा और रोमन लिपि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। अंगरेजी की समस्त ध्वनियों को लिखने में रोमन लिपि अत्यंत अपर्याप्त है।

इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं की ध्वनियों और उनकी लिपियों के बीच काफी नजदीकी संबंध है। ध्वनियों और वर्णों के बीच अंतर बहुत मामूली है। अन्य भाषाओं की तरह हिंदी में भी स्वर और व्यंजन दो प्रकार की ध्वनियां हैं। स्वरों के भी मुख्य दो भेद हैं- मौखिक और अनुनासिक। ‘मौखिक’ उन स्वरों को कहते हैं, जिनके उच्चारण के समय अंदर से आने वाली हवा मुख के रास्ते बाहर निकलती है और ‘अनुनासिक’ के उच्चारण के समय हवा मुख और नाक दोनों रास्तों से बाहर निकलती है। इसी तरह व्यंजनों के भी मुख्य दो भेद हैं- मौखिक और नासिक्य। अनुनासिक हिंदी के अपने स्वर हैं। हिंदी की पूर्ववर्ती भाषाओं- संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश में अनुनासिक स्वर नहीं हैं। इसलिए इन भाषाओं की वर्णमाला में अनुनासिक स्वरों को लिखने की कोई व्यवस्था नहीं है। संस्कृत में अनुनासिक स्वर नहीं हैं; इसीलिए देवनागरी की वर्णमाला में अनुनासिक स्वरों को लिखने के लिए अलग से वर्ण नहीं हैं। हिंदी में मौखिक स्वर वर्णों के ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) लगा कर अनुनासिक स्वर लिखे जाते हैं। यानी चंद्रबिंदु (ँ) अनुनासिक स्वरों की पहचान है।

हिंदी में बिंदी (ं) के दो रूप हैं- एक है चंद्रबिंदु का लघुरूप और दूसरा है अनुस्वार। जो स्वर वर्ण और उनकी मात्राएं शिरोरेखा के नीचे लिखी जाती हैं, उनके अनुनासिक रूप को लिखने के लिए उनके ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) लगाया जाता है और जो स्वर वर्ण और उनकी मात्राएं शिरोरेखा के नीचे और नीचे-ऊपर यानी दोनों ओर लिखी जाती हैं, उनके अनुनासिक रूप को लिखने के लिए उनके ऊपर एक बिंदी लगाई जाती है। इस बिंदी को चंद्रबिंदु का लघुरूप कहते हैं। ऐसा सिर्फ मुद्रण को सुगम बनाने के लिए किया जाता है। हंसना, आंख, ऊंट जैसे शब्दों को चंद्रबिंदु लगा कर लिखा और छापा जाता है; पर ‘नहीं’, ‘में’, ‘मैं’, ‘सरसों’, ‘परसों’ जैसे शब्दों में प्रयुक्त बिंदी चंद्रबिंदु का लघुरूप है।

बिंदी के दूसरे रूप को ‘अनुस्वार’ कहते हैं। अनुस्वार का प्रयोग संयुक्त व्यंजन के प्रथम सदस्य के रूप में आने वाले नासिक्य व्यंजनों (ङ्, झ्, ण्, न्, म्) के स्थान पर किया जाता है। पर हिंदी में अनुस्वार (ं) के संबंध में एक बड़ी भ्रांति है। हिंदी के बहुत से व्याकरण लेखक और भाषा-चिंतक अनुस्वार (ं) को एक नासिक्य ध्वनि मानते हैं। यह निहायत गलत और भ्रांत धारणा है। वास्तविकता यह है कि ‘अनुस्वार’ संयुक्त व्यंजन के प्रथम सदस्य के रूप में आने वाले नासिक्य व्यंजनों को लिखने और छापने की सिर्फ एक वैकल्पिक व्यवस्था है। पहले जो शब्द गङ्गा, चञ्चल, पण्डित, सन्त, कम्प के रूप में लिखे जाते थे, बाद में वे गंगा, चंचल, पंडित, संत, कंप के रूप में लिखे जाने लगे। इनके उच्चारण में कोई भेद नहीं है। सिर्फ उनको लिखने में भेद है। वह भी मुद्रण की सुविधा के लिए- यांत्रिक कारण से; व्याकरणिक कारण से नहीं। ‘में’, ‘मैं’, ‘बातें’, ‘बातों’ में प्रयुक्त बिंदी को लोग भ्रमवश अनुस्वार कहते हैं। इन शब्दों में प्रयुक्त बिंदी चंद्रबिंदु का लघुरूप है; जबकि गंगा, चंचल, पंडित, संत, कंप जैसे शब्दों में प्रयुक्त बिंदी अनुस्वार है क्योंकि इन शब्दों में बिंदी ङ्, झ्, ण्, न्, म् के स्थान पर प्रयुक्त हुई है।

अब बात नुक्ते की। हिंदी में नुक्ता उस बिंदी को कहते हैं, जो अरबी और फारसी से हिंदी में आए शब्दों की कुछ ध्वनियों को लिखने के लिए देवनागरी के कुछ वर्णों के नीचे लगाई जाती है। हिंदी के क, ख, ग, ज और फ वर्णों के नीचे नुक्ता लगा कर अरबी-फारसी की ध्वनियों (क़, ख़, ग़, ज़, फ़) को लिखा जाता है। यह पद्धति उस दौर में शुरू हुई थी, जब हिंदी के परिष्कार और परिमार्जन का कार्य जोरों पर था। वह शुद्धतावादी लोगों का समय था। उनका मानना था कि अरबी-फारसी के जो शब्द हिंदी में प्रचलित हैं, उनको उनके शुद्ध रूप में हिंदी में लिखना चाहिए। हिंदी में क, ख और ग का उच्चारण जिस स्थान (कंठ) से होता है, उसके और नीचे (गले) से अरबी में इन ध्वनियों का उच्चारण होता है। इनका मूल उच्चारण दिखाने के लिए क, ख, ग के नीचे नुक्ता लगा कर क़, ख़, ग़ के रूप में अरबी की ये ध्वनियां लिखी जाने लगीं। ज़ और फ़ फारसी की ध्वनियां हैं। ये संघर्षी ध्वनियां हैं। हिंदी में ऐसी ध्वनियां नहीं हैं। हिंदी में ग और फ स्पर्श ध्वनि हैं।

हिंदी भाषा की संरचना की दृष्टि से अरबी-फरसी की इन ध्वनियों को उनके मूल रूप में लिखना आज अनावश्यक है। पर ‘केंद्रीय हिंदी निदेशालय’ और ‘सीबीएसइ’ को यह आज भी आवश्यक लगता है। सीबीएसइ के पाठ्यक्रम का यह एक हिस्सा है। परीक्षा में प्रश्न पूछा जाता है कि निम्नलिखित शब्दों में उचित स्थान पर नुक्ता लगाइए। यहां ध्यान देने की बात यह है कि उर्दू में क, ख, ग, ज, फ ध्वनियां भी हैं और क़, ख़, ग़, ज़, फ़ भी। यह तय करने का कोई उपाय नहीं है कि किस क, ख, ग, ज, फ के नीचे नुक्ता लगेगा और किसके नीचे नहीं लगेगा। ‘इजाज़त’ शब्द में दोनों ध्वनियां आती हैं। यह कैसे तय होगा कि पहले ‘ज’ के नीचे नुक्ता क्यों नहीं लगता और दूसरे ‘ज’ के नीचे नुक्ता क्यों लगता है? इसी आग्रह का परिणाम है कि सीबीएसइ के छात्र फल को फ़ल और फिर को फ़िर बोलते सुने जाते हैं। परीक्षा की दृष्टि से दस-बीस उर्दू शब्दों में नुक्ता लगाना सिखा देने से क्या हासिल होने वाला है। हिंदी की संरचना से नुक्ते का कोई संबंध नहीं है। फिर इसका आग्रह क्यों?

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First Published on November 13, 2016 3:44 am

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