December 07, 2016

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व्याकरण की सामयिकता

हिंदी अपने मूल में लोकतांत्रिक भाषा है और स्थानीयता ही इसकी वास्तविक पूंजी रही है।

प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।

भाषा एक व्यवस्था है, जो नियमों से संचालित होती है, लेकिन समाज इसका कर्म-क्षेत्र है और नियमों का अनुपालन समाज की प्राथमिकता से बाहर होता है। व्यावहारिक रूप में भाषा एक नदी के समान होती है। इसमें प्रवाह का होना आवश्यक है, तो व्याकरणिक व्यवस्था के रूप में दो स्पष्ट किनारों का होना भी उतना ही आवश्यक है। इसी से भाषा के प्रवाह की दिशा और धारा की गति निर्धारित होती है। पर गौरतलब है कि व्याकरण भी स्वयं में स्वायत्त नहीं हो सकता, बल्कि उसे भाषाविज्ञान के दूसरे अनुषंगों से सहयोग लेना होता है। अगर व्याकरण सामयिक हो, तो भी शब्दों का एक लंबा अतीत होता है और इनके प्रयोग के समय और संदर्भ भी विविध हो सकते हैं। हालांकि भाषिक संप्रेषण के क्रम में व्याकरण और कोश दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

हिंदी अपने मूल में लोकतांत्रिक भाषा है और स्थानीयता ही इसकी वास्तविक पूंजी रही है। अनेक विदेशी भाषाओं के सैकड़ों शब्द हिंदी में इस तरह रच-बस गए हैं कि आज इनको भाषा से बाहर करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। ध्यान रहे कि किसी भाषा का लोकतांत्रिक होना प्रकारांतर से उसे नियमों के बंधन से मुक्त होने की ओर प्रेरित तो करता है, लेकिन यही पक्ष एक भाषा के रूप में उसकी क्षमता पर प्रश्न भी खड़ा करता है। किसी वाक्य में संयोजित शब्दों से लक्षित अर्थ संप्रेषित हो, इसके लिए आवश्यक है कि शब्द उचित व्यवस्था तथा अनुक्रम में हों और यह तभी संभव है, जब वह वाक्य उस भाषा के व्याकरण की व्यवस्था के अनुरूप हो। इसमें शब्द-चयन की क्षमता लोकतांत्रिक हो सकती है, लेकिन इनके प्रयोग की शर्तें अपेक्षाकृत दृढ़ होती हैं। यहीं व्याकरण की उपस्थिति होती है, जहां उसकी क्षमता तथा सटीकता का परीक्षण होता है।

व्याकरण किसी भाषा की व्यवस्था के निर्धारक होने के साथ उसके समय, काल और सामाजिक संबंधों की आंतरिकता को बताता है। हिंदी-व्याकरण का वर्तमान इसके संरचनात्मक लचीलेपन के साथ खड़ा तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। गौरतलब है कि वर्तमान सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में व्याकरण, वर्तनी तथा शब्दार्थ का नियंता ‘माइक्रोसॉफ्ट’ और ‘गूगल’ जैसी कंपनियां बनने लगी हैं और सहज उपलब्धता या विकल्पहीनता की स्थिति में इन पर न सिर्फ आम जन, बल्कि बौद्धिक समाज भी आश्रित होने लगा है। बहरहाल, हिंदी को आज भी उसके सामयिक तथा प्रतिनिधि व्याकरण की आवश्यकता है। आज कहने को हिंदी की कई भाषाओं के माध्यम से सैकड़ों व्याकरण की पुस्तकें उपलब्ध हैं, इनमें जॉन जोशुआ केटेलर के ‘हिंदी ग्रामर’ (1698) से लेकर रमाकांत अग्निहोत्री के ‘हिंदी: ए एसेंशियल ग्रामर’ (2006) तक शामिल हैं। इनमें से अनेक पुस्तकों की उपयोगिता के बल पर ही हिंदी सुगठित हो पाई है, लेकिन कई का अपना समय और संदर्भ भी रहा है। इसके साथ अंगरेजी के व्याकरणिक ढांचे में हिंदी के व्याकरण को ढालना हिंदी के प्रति न्याय नहीं है, लेकिन ऐसा हिंदी व्याकरण की अनेक पुस्तकों में सहज पाया जा सकता है।

हिंदी में लिखित व्याकरणों में आज भी पूरी बहस कामताप्रसाद गुरु की कृति ‘हिंदी व्याकरण’ (1920), किशोरी दास वाजपेयी की ‘हिंदी शब्दानुशासन’ (1957) और सूरजभान सिंह की ‘हिंदी का वाक्यात्मक व्याकरण’ (1985) आदि तक ही सीमित है। कामताप्रसाद गुरु ने अपनी पुस्तक की भूमिका में स्वीकार किया है कि ‘जो सिद्धांत निश्चित किए गए हैं, साहित्यिक हिंदी से संबंध रखते हैं… यह व्याकरण, अधिकांश में, अंगरेजी व्याकरण के ढंग पर लिखा गया है। इस प्रणाली के अनुसरण का मुख्य कारण यह है कि हिंदी में आरंभ से ही इसी प्रणाली का उपयोग किया गया है।’ दरअसल, इस पूरे संदर्भ में व्याकरण-लेखन की परंपरा को प्रसिद्ध भाषाविद चामस्की के प्रभाव ने नए सिरे से प्रभावित किया है। उनकी प्रथम पुस्तक ‘सिंटैक्टिक स्ट्रक्चर्स’ (1957) के बाद भाषाविज्ञान में जो क्रांतिकारी बदलाव आया, उसमें बहुत कुछ बदल गया और बहुसंख्य भाषाविद इनके अनुगामी बन गए।  चामस्की का भारत में प्रभाव यह पड़ा कि अकादमिक क्षेत्र में कार्यरत प्राय: भाषाविद उनके व्याकरण-सम्मत सिद्धांतों की आंतरिक बहसों के आईने में ही हिंदी सहित भारतीय भाषाओं को देखने लगे। यद्यपि यह आवश्यक ही है कि किसी अनुशासन की समकालीन बहसों से जुड़ा रहा जाय, लेकिन व्याकरण-लेखन की भाषावैज्ञानिक धारा से निकले व्याकरण अपनी व्यावहारिक दुरूहता के कारण आम जन की पहुंच से दूर ही रहे। दूसरी तरफ हिंदी में अनेक व्याकरण पुस्तकें आर्इं तो जरूर, लेकिन उनमें से कुछ तो नई बोतल में पुरानी शराब से कुछ अधिक नहीं हैं।

आज बाजार में ऐसी भी हिंदी व्याकरण की पुस्तकें उपलब्ध हैं, जो अपनी सामग्री के आधार पर शीर्षक तक को न्यायोचित नहीं ठहरा पाती हैं। ऐसी पुस्तकें व्याकरणिक परंपरा में योगदान देने के बजाय प्रदूषण ही फैलाती हैं। ध्यान रहे कि जिस प्रकार नदी पर पुल बनाने वाले अभियंता की कमजोरी का नुकसान समाज के साथ उस नदी को भी उठाना पड़ सकता है, उसी प्रकार एक गलत व्याकरण अपने अबोध पाठक को एक गलत व्याकरणिक व्यवस्था को अंगीकार करने के लिए प्रेरित करता है और भाषा की धारा तार्किकता भी कमजोर होती है। दुर्भाग्य से हिंदी में ऐसे व्याकरण भी समांतर अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं और ऐसा भाषाविज्ञान के अकादमिक क्षेत्र में न भी हों, तो भी समाज पर एक बोझ की तरह फल-फूल रहे हैं। समय के साथ इन सबका प्रभाव यह भी पड़ा कि हिंदी के व्याकरण का आम प्रशिक्षु इसके प्रति उदार होता चला गया और व्याकरणिक मानकता के अभाव में सब कुछ समय की धारा के भरोसे छूट गया।

इधर ‘हिंगलिश’ या ‘हिंग्रेजी’ का उभार भी हुआ है, जिसे मुख्यधारा के हिंदी अखबार भी विविध रूपों में मान्यता देने पर उतारू हैं। इधर हिंदी की सर्वाधिक शक्तिशाली उपस्थिति सिनेमा के माध्यम से हुई है और यहां भी इसके व्याकरण के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। ऐसे में हिंदी का उन्मुक्त विचरण ही इसकी नियति बनती जा रही है, जिससे आज भी राजभाषा, न्यायालय, उच्च-शिक्षा, चिकित्सा और शोध आदि सम्मानजनक क्षेत्रों में इसके प्रयोग पर लगातार संदेह बना हुआ है। हिंदी से जुड़ी वर्तमान अपेक्षाएं इसके स्थानीय, अखिल भारतीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर हैं। इनमें स्थानीय स्तरों पर इसके संरचनात्मक स्तर की उदारता बहुधा स्वीकार्य है, लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी की संरचनात्मक उपस्थिति का जवाब सीधे इसके व्याकरण से मांगा जाता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी-शिक्षण के क्रम में बिना सुदृढ़ व्याकरण के इसको तार्किक ठहराना संभव नहीं है। इस संदर्भ में हिंदी शिक्षकों के लिए विदेशी छात्रों के उलझे हुए प्रश्नों का मान्य समाधान खोजना एक व्यापक चुनौती है। इधर हाल के दिनों में कंप्यूटर से जुड़े शोधों में हर मानवीय भाषा नई चुनौतियों के साथ प्रस्तुत हुई है और हिंदी जैसी कंप्यूटर से विमुख भाषा के साथ तो यह चुनौती कई गुना बढ़ जाती है।

हिंदी को अगर समय-सापेक्ष समर्थवान और सम्मानजनक भाषा बनना है, तो उसे हर उस सवाल का उत्तर खोजना होगा, जो उसकी क्षमता पर संदेह जताता हो। अब इसके व्याकरण को लेकर एक निर्णायक पहल आवश्यक है, ताकि समकालीन हिंदी का एक बहुस्वीकृत और समग्र व्याकरण तैयार हो सके, जो भविष्य में न सिर्फ आम आदमी की आशंकाओं का निवारण करे, बल्कि भविष्य के शोधों और विकास को एक मजबूत आधार दे सके। इसमें प्रमुखता से समाजभाषावैज्ञानिक तथ्यों का समावेश होना चाहिए और स्थानीय उच्चारण तथा वर्तनी के विकल्पों पर भी विचार किया गया हो, ताकि संप्रेषणपरक हिंदी को भी संबोधित कर सके। इसके साथ इसके वर्तमान प्रयोग-क्षेत्रों को भी ध्यान में रखा जाए।

 

 

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First Published on November 27, 2016 5:01 am

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