December 03, 2016

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चक्की जैसा शोध

पीछे मुड़ कर देखें तो लगता है कि वैचारिक साहस हमारी उच्च शिक्षा में एक मूल्य बनते-बनते रह गया।

Author November 6, 2016 04:44 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

कृष्ण कुमार

हमारे विश्वविद्यालयों में किया जाने वाला शोध आमतौर पर घटिया और कच्चा क्यों होता है, इसकी टोह हमें तीन दिशाओं में ले जाएगी। पहली दिशा माहौल की तरफ ले जाती है। शोध में ईमानदारी और गहराई तभी संभव है जब वैचारिक माहौल खुला हो और सवाल धैर्य से सुने जाते हों। समाज विज्ञान के हर विषय में अनुसंधान वैचारिक साहस की मांग करता है, जो हमारे विश्वविद्यालयों से गायब होता चला गया है। प्रश्न उठाने वाला यदि युवा है तो लोग उसकी हिमाकत पर हंसते हैं। हजारों युवा शिक्षक कच्ची नौकरियां करने पर मजबूर हैं, इसलिए जमे हुए वरिष्ठों के सामने जुबान खोलने का जोखिम नहीं उठाते। शोध की प्रस्तुति के समय होने वाली बहस नाममात्र के लिए होती है। विषय या विधि पर कोई पैना सवाल एक व्यक्तिगत चुनौती की तरह देखा जाता है, इसलिए चुप रहना ज्यादा व्यावहारिक माना जाता है।

पीछे मुड़ कर देखें तो लगता है कि वैचारिक साहस हमारी उच्च शिक्षा में एक मूल्य बनते-बनते रह गया। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के माहौल में राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना ज्यादा घुला है कि किसी बात को आराम से बोल या सुन लेना एक बड़ी उपलब्धि जितना दुर्लभ अनुभव हो गया है। उदारीकरण की आर्थिक नीति ने विचार को व्यर्थ का प्रयास या वक्त की बर्बादी बना दिया है। नए आर्थिक माहौल में उपायों, खासकर तकनीकी हलों की, वकत है, विचारों की नहीं। अनुसंधान की श्रेष्ठता के लिए विचार का आनंद जरूरी है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज के आर्थिक माहौल में स्पर्धा सिर्फ भौतिक रह गई है, विचारों की प्रतिस्पर्धा शोर या हिंसा के डर से आगे नहीं बढ़ती। इस परिस्थिति में समाज वैज्ञानिक शोध कच्चा या बुझा रहे, यह स्वाभाविक है।

दूसरी दिशा सुविधाओं के अभाव की तरफ इशारा करती है। अच्छा शोध समय यानी फुर्सत और इत्मीनान के साथ तथ्यों की जांच पर निर्भर होता है। आप एक किताब या रिपोर्ट के लिए चक्कर लगा रहे हैं, ऐसे में कायदे का शोध-लेखन संभव नहीं है। पुस्तकालय एकदम बुनियादी सुविधा है, पर आज उसे भी संस्थाई तंगी और टेक्नोलॉजी के धोखे में कमजोर बना दिया गया है। पुस्तकालयों पर किया जाने वाला व्यय अब इतना घट चुका है कि एकदम जरूरी पुरानी किताबें भी नहीं खरीदी जातीं, नई किताबों की क्या बात की जाए। यह भी सच है कि पुस्तकों की कीमतें बढ़ी हैं और विदेशी प्रकाशन बेतहाशा मंहगे होते चले गए हैं। शोध पत्रिकाओं को लेकर कहा जाता है कि अब इन्हें खरीदने की जरूरत नहीं रही, वे इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इस तरह की बातों को हमारे विश्वविद्यालय के प्रशासक मंत्र की तरह दोहराते हैं। वे भूल जाते हैं कि पुस्तकालय की समृद्धि से बनने वाला वातावरण चंद कंप्यूटरों से नहीं बनाया जा सकता।

शोध के क्षेत्र में भारत जिन देशों से प्रतियोगिता करना चाहता है, वहां पुस्तकालय और इंटरनेट साथ-साथ चले हैं। चीन हो या अमेरिका, अकादमिक रूप से आज की दुनिया का नेतृत्व कर रहे देशों के विश्वविद्यालयों में पुस्तकालय पूरे परिसर का केंद्र होता है। इसी तरह की बात शोध करने वालों को दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में कही जा सकती है। वे युवा हों या सयाने, हमारे देश में वे फोटोकॉपी के बिल चिपकाते, छोटी-छोटी राशियों के लिए क्लर्कों और अधिकारियों के चक्कर लगाते रहते हैं। शोधार्थी की कोई इज्जत या हैसियत नहीं होती। पीएचडी स्तर के छात्रों को भी आराम से बैठ कर शांति से अपना काम करने की जगह नहीं मिल पाती। इधर के दशकों में उनकी संख्या अविरल बढ़ी है। उनकी हैसियत और उन्हें मिलने वाली सुविधाएं घटती चली गई हैं। जो जूनियर फैलोशिप की अजीब-सी स्पर्धा में आगे नहीं निकल पाते। पांच हजार रुपए की माहवारी पर जीवनयापन और शोध करते हैं।

तीसरी दिशा है पढ़ाई और शोध के संबंध की। शोध हमारे देश में एक बेगाना काम है, उसका कोई संबंध स्नातक या आगे की पढ़ाई से नहीं बिठाया जाता। शोध करने वाला मान कर चलता है कि उसका काम एक बार सजिल्द जमा हो जाने के बाद किसी काम में नहीं ला जाएगा। यह स्थिति उन देशों से एकदम भिन्न है, जिन्हें आविष्कारों और खोजों की दृष्टि से आदर दिया जाता है। वहां नए शोध का संदर्भ युवा विद्यार्थियों द्वारा पढ़ा जा रहा पाठ्यक्रम होता है। शोध को नए ज्ञान की रचना का काम माना जाता है, जिसका सीधा प्रभाव पाठ्यक्रम पर पड़ता है। वरिष्ठ शिक्षकों की शोध परियोजनाओं में युवा छात्र अनिवार्य रूप से जुड़े होते हैं और शुरू से अपनी पढ़ाई में शोध के अनुभव का लाभ पाते हैं। उनके ज्ञान और विद्या संबंधी संस्कार शोध से जुड़ कर बनते हैं।

हमारे विद्यार्थी का ज्ञान-संस्कार परीक्षा बनाती है। इसलिए जब वह स्वयं शोधार्थी बनता है, किसी बड़ी जिज्ञासा या कुछ नया सिद्ध करने की अभीप्सा से प्रेरित महसूस नहीं करता। वैसे भी हमारी शिक्षा व्यवस्था बचपन से जिज्ञासा और कौतूहल पर प्रहार करना शुरू कर देती है। सफल होने के लिए अच्छे-अच्छे विद्यार्थियों को भी परीक्षा की तैयारी के चिर-परिचित नुस्खे अपनाने पड़ते हैं। कॉलेज पहुंचने तक ज्यादातर विद्यार्थियों की स्वाभाविक जिज्ञासा बुझ-सी जाती है। कॉलेज का पाठ्यक्रम यदि किसी बड़े अनुसंधान से जुड़ा हो तो छात्रों में जिज्ञासा की बहाली कर सकता है। पर ऐसा इक्का-दुक्का संस्थानों में, वह भी मुट्ठी भर विद्यार्थियों के लिए संभव हो पाता है। ज्यादातर की उच्च शिक्षा उन्हें निष्प्रेरित छोड़ देती है। उनका किया शोध भी निष्प्रेरक रहे तो क्या आश्चर्य? उनका किया शोध भी निष्प्रेरक रहे तो क्या आश्चर्य? शोध की उपाधि भी सामान्य पढ़ाई की चक्की सरीखी कोशिश से प्राप्त हो जाती है। ऐसे शोध से कोई गहरे सवाल न उठते हैं, न हल होते हैं।

 

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First Published on November 6, 2016 4:44 am

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