December 05, 2016

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मिथक: आज के द्रोणाचार्य

आजकल अध्यापकों की बहुत निंदा होती है। विमर्शवादी लोग ज्यादातर प्राचीन अध्यापकों पर आक्रमण करते हैं। शैक्षिक परंपरा में ऐसे आक्रमणों के सर्वाधिक शिकार द्रोणाचार्य होते हैं।

Author October 30, 2016 05:10 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

देवशंकर नवीन

इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही भारत का बौद्धिक समाज एकमत हुआ कि वैश्विक स्पर्द्धा में आगे रहने के लिए अपने अनुसंधान-शिक्षण की परंपरा को समृद्ध किया जाए। ज्ञान-विज्ञान, शोध-आविष्कार में उन्नत होने, अपनी धरोहरों को सुरक्षित-संवर्द्धित करने के लिए अपनी शैक्षिक-प्रणाली की गुणवत्ता बढ़ाना अनिवार्य है। इसलिए देश के शैक्षिक संस्थानों को जागरूक और राष्ट्रोन्मुखी होना आवश्यक है। पर शैक्षिक संस्थाओं के अधिपति उसे रसातल में ले जाने में लिप्त हैं। विश्वविद्यालयों में अब शोध के बजाय डिग्री प्रमुख हो गई है। अध्यापक अब शोधार्थियों को शोध के बजाय अपनी आवभगत की ओर उन्मुख करते हैं। अब ‘थिसिस फॉर डिग्री’ लिखी जाती है। विश्वविद्यालयी शिक्षा की इस बदहाली से वैज्ञानिक उन्नति, शैक्षिक विकास और पारंपरिक धरोहरों का अनुरक्षण तो होने से रहा। सारा दोष अध्यापकों का नहीं है, शिक्षार्थियों की ज्ञानविमुखता भी कम उत्तरदायी नहीं है। शिक्षक उस पर अंकुश लगा सकते हैं, मगर उसकी संभावना दिखती नहीं।

आजकल अध्यापकों की बहुत निंदा होती है। विमर्शवादी लोग ज्यादातर प्राचीन अध्यापकों पर आक्रमण करते हैं। शैक्षिक परंपरा में ऐसे आक्रमणों के सर्वाधिक शिकार द्रोणाचार्य होते हैं। वे चाहें तो द्रोण-निंदा किए बिना भी शिष्यों की नजर में अपनी पवित्र छवि अंकित कर सकते हैं, पर वे करते नहीं। इसमें उनकी दिलचस्पी नहीं है।  चिंता इस बात की है कि इस देश के ज्ञानियों के आचरण में ऐसा स्खलन क्यों आया? वैसे उनके पक्ष में तर्क देने वाले ढेर मिल जाएंगे, जो कहते हैं कि चूंकि एकलव्य ने अपनी धनुर्विद्या का दुरुपयोग कुत्ते का मुंह बंद करने के लिए किया था, जो धनुर्विद्या की अवहेलना थी, इसलिए द्रोणाचार्य ने सोचा होगा कि जिस संपत्ति का सम्मान करना मनुष्य न जाने, वह उसके पास नहीं रहनी चाहिए। पर यह दलील तर्कसंगत नहीं लगती।

द्रोणाचार्य के बारे में सोचने पर अन्यत्र भी कई असुविधाएं होती हैं। शास्त्रकारों ने उनके आचरण का रेखाचित्र इस तरह पेश किया है कि पूरा पाठक-जगत भ्रांत है। वह समझ नहीं पाता कि द्रोण को किस तरह देखा जाए! देश के इतने बड़े ज्ञानी की बदहाली कि उनकी पत्नी अश्वत्थमा को दूध के नाम पर आटे का घोल पिला कर फुसला देती थीं। ज्ञानदान के प्रति नैष्ठिक इतने कि उन्होंने अपने बेटे से भी बेहतर ज्ञान अर्जुन को दिया। प्रतिशोध की आग में झुलसे हुए इस तरह कि जब तक अपने बाल-सखा को शिष्यों द्वारा पराजित करवा कर नतमस्तक नहीं करवाया, चैन की सांस नहीं ली। जब प्रतिशोध की आग शांत हो गई, तो पैंतरा बदल लेना चाहिए था, पर नहीं, कृतज्ञता का भाव भी तो कुछ होता है! धर्म, राज-निष्ठा और ईमानदारी के लिए प्रतिबद्ध इतने कि हस्तिनापुर के सम्मानार्थ अपने सर्वाधिक प्रिय शिष्य के प्रतिपक्ष में युद्ध किया। नीति और नियमों से इस तरह बंधे कि कौरवों की तमाम दुर्नीतियों के सहयात्री बने। पुत्रमोह इतना अधिक कि बेटे की मौत की खबर सुन कर बीच युद्ध में विचलित हो गए।… समग्रता में द्रोण का चरित्रांकन एक दिग्भ्रांत बुद्धिजीवी के रूप में किया गया है। अपने पूरे आचरण में वे कहीं मुकम्मल टिके हुए नहीं दिखते। थोड़ा-थोड़ा हर जगह दृढ़, थोड़ा-थोड़ा हर जगह समझौता परस्त।

एकलव्य को धनुर्ज्ञान न देने के लिए वे मजबूर रहे होंगे, क्योंकि बड़ी मुश्किल से जीवन में आई सुविधा छिन सकती थी। कोई राज्याश्रय प्राप्त गुरु किसी भील को कैसे शिक्षा देता! पर, गुरु-दक्षिणा में अंगूठा मांगने की उनकी क्या विवशता रही होगी। एकलव्य ने कुत्ते का मुंह बंद करने के लिए धनुर्विद्या का दुरुपयोग बेशक किया, पर उनके गुरुधर्म ने उन्हें उद्वेलित क्यों नहीं किया कि जो बालक केवल गुरु-स्मरण और अभ्यास से इतना हासिल कर चुका है, वह सिखाने-बताने पर धनुर्विद्या का महत्त्व भी सीख जाएगा? आखिरकार शिक्षार्थी की लगन की पहचान तो उन्हें थी! तभी तो उन्होंने अर्जुन को अपने बेटे से अधिक योग्य माना! अंगूठा-दान कराने के बाद एकलव्य के बारे में शास्त्रकारों की चिंता समाप्त हो गई। पर चिंता का विषय है कि द्रोणाचार्य को ऐसी शंका क्यों नहीं हुई कि जिस एकलव्य ने अपनी लगन से इतना कुछ कर लिया, वह चाह ले तो तीर चलाते वक्त अंगूठा और तर्जनी का विकल्प अपनी तर्जनी और मध्यमा को ही बना लेगा। शासकीय पदक्रम में एकलव्य बेशक अर्जुन का प्रतिस्पर्द्धी न होता, उसकी बराबरी में न आता, पर वे चाहते तो उसके जैसे गुरुभक्त और लगनशील धनुर्धर को बाद में पांडुपुत्रों का सैनिक ही बना देते! मगर अंगूठा कटवा कर तो उन्होंने प्रतिभा-लगन-अभ्यास के महत्त्व को नष्ट कर दिया! गुरु-गरिमा के इस स्खलन को शायद ही दुनिया का कोई तर्क नैतिकता की दृष्टि से मर्यादित करने की चेष्टा करे!

हस्तिनापुर के शैक्षिक, सांस्कृतिक परिक्षेत्र में अन्यत्र भी उन्होंने कई समझौते किए। संभव है कि उन समझौतों में उन्हें घनघोर द्वंद्व और तनाव झेलने पड़े हों, पर क्या कभी उनके ज्ञान-बल या नैतिक-बल ने उन्हें धिक्कारा नहीं?ढेर सवाल हैं। पर इससे बड़ी उलझन पैदा करता है आधुनिक द्रोण का आचरण, जिन्होंने पूरे शिक्षा-जगत को कर्मनाशा बना दिया है। द्रोणाचार्य के चरित्र पर वे चाहे जितनी मर्जी अंगुली उठाएं, पर पहले तनिक अपने गिरेबान में भी तो झांकें! प्राचीन द्रोणाचार्य आधुनिक द्रोणाचार्यों की तरह कभी स्खलित नहीं हुए। अपना महिमामय पद पाने के लिए द्रोण ने कभी अन्यथा तिकड़म नहीं किया, अपने ज्ञान-पराक्रम से पद-प्रतिष्ठा हासिल की। द्रोण का चयन विशेषज्ञों की मंडली ने नहीं, उनके संभावित शिष्यों ने किया था। पर देश की पूरी शिक्षण-परंपरा को नेस्त-नाबूद कर रहे लोग भी द्रोण-निंदा में लिप्त हैं!

अब तक यही माना जाता रहा है कि हर पराजय से मनुष्य आहत होता है, पर जब कभी अपनी संतान या शिष्य से पराजित होता है, तो उसे अपार प्रसन्नता होती है। क्योंकि हर गुरु की शिक्षण-प्रक्रिया का विधिवत पल्लवन उनकी शिष्य-परंपरा में होता है। हर गुरु अपने शिष्यों के कृति-कर्मों में पुनर्जीवन पाता है। अपना परिचय देते हुए हर वक्तव्य में अर्जुन कहते थे कि मैं द्रोण-शिष्य, कुंती-पुत्र अर्जुन हूं। मां से भी पहले गुरु का नाम लेते थे। पर आज के द्रोणाचार्यों को प्रतिभावान, लगनशील और निष्ठावान शिष्यों से बड़ी चिढ़ होती है। वे ऐसे शिष्य-शिष्याओं के आखेट में रहते हैं, जिनकी निष्ठा अध्यवसाय, शोध, राष्ट्रोत्थान, शैक्षिक नवान्मेष के बजाय गुरु के निजी एजेंडे में हो। जो शिष्य-शिष्याएं उनकी इन लिप्साओं को पूरा न करें, वे उनके लिए निरर्थक हैं। कुछ बेहतर गुरु निश्चय ही आज भी हैं, जिनके बूते देश की शिक्षा चल रही है, पर अध्ययन, अध्यापन, शोध, संगोष्ठी, बौद्धिक बहस, बहाली, प्रोन्नति की जैसी रिवायत्त चल पड़ी है, उसमें राष्ट्र के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है। आजकल निर्णय लेकर बैठकों और चयन-प्रक्रियाओं का आयोजन होता है, ताकि लिए गए निर्णयों को तर्कसम्मत साबित किया जाए। ज्ञान-विमुख, राष्ट्र-निरपेक्ष, स्वार्थोन्मुख शिक्षा की चपेट में भारत ऐसे समय में आ गया है, जब वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में देश को आगे जाना है। पता नहीं आज के द्रोणाचार्यों को यह भय क्यों नहीं होता कि जब द्रोण जैसे पराक्रमी आचार्य की फजीहत करने से वे बाज नहीं आते, तो कल जब उनकी कुर्सी छिनेगी, उनका क्या हाल होगा!

 

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First Published on October 30, 2016 5:10 am

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