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समाज-अपशिक्षा से उपजा अपराध तंत्र

यूरोप में शिक्षा का औपचारिक तरीका चर्च में अपनाया गया। वहां बच्चों, किशोरों, युवाओं की धार्मिक शिक्षा-दीक्षा होने लगी।
Author April 9, 2017 04:24 am
प्रतीकात्मक चित्र।

उद्दंडता से जन्मी दंड की शिक्षा का यूरोपीय प्रारूप अपनाने का पहला परिणाम अपशिक्षा था और अपशिक्षा का परिणाम एक सार्वजनिक अपराध-तंत्र है, जो स्कूल से विश्वविद्यालय तक और सामाजिक जीवन से राजनीतिक जीवन तक व्याप्त है। यह किसी भी लोकतंत्र की विडंबना ही कही जाएगी कि शिक्षा से संस्कार के बजाय विकार इतने पैदा हो गए कि राजनीति भ्रष्ट हो गई, नेता और जन-प्रतिनिधि भ्रष्ट या अपराधी बन गए, शिक्षित बुद्धिजीवी मात्र एकांत या अपनी पसंद के मुताबिक सरकारों के प्रशंसक या आलोचक बन गए। रहा सवाल जनता का, जिसने चाहे शिक्षित हो या अशिक्षित, लोकतंत्र का वह रास्ता अपना लिया, जो राजनीति और नेताओं से मिला और इस प्रकार जनता का एक बड़ा हिस्सा सुविधा हासिल करने के नाम पर भ्रष्ट हो गया। जिस लोकतंत्र में हिंसा, अपराध, भ्रष्टाचार और अभिव्यक्ति की अराजकता बलशाली हो, वहां लोकतंत्र कैसे हो सकता है? क्या इसके कारण हमारी समूची पारंपरिक और औपनिवेशिक शिक्षा में मौजूद नहीं हैं?

यूरोप में शिक्षा का औपचारिक तरीका चर्च में अपनाया गया। वहां बच्चों, किशोरों, युवाओं की धार्मिक शिक्षा-दीक्षा होने लगी। यूरोप का एक धार्मिक विश्वास यह रहा कि बच्चे पाप की सृष्टि हैं और उन्हें दंड देने का अधिकार माता-पिता को है। साथ ही शिक्षा भी दंड के आधीन है, जिससे ‘छड़ी पड़े छम छम, विद्या आए धम धम’ जैसी कहावतें बनीं। जो जर्मनी स्कूल का जनक माना जाता है, वहां के एक शिक्षक ने शिक्षा और दंड की जुगलबंदी का दिलचस्प वर्णन किया है। उसका कहना है कि उसने अपने जीवन में इक्यावन वर्ष तक नौकरी की और इन वर्षों में उसने बच्चों को तरह-तरह से पीटने का रेकार्ड भी अपनी डायरी में नोट किया। कितने भयावह ये आंकड़े हैं, जो शिक्षक और शिक्षातंत्र से पैदा हुए!
उस शिक्षक का कहना है कि उसने अपनी इक्यावन साल की नौकरी में नौ लाख ग्यारह हजार पांच सौ सत्ताईस बार बच्चों को रॉड या डंडे से पीटा, एक लाख चौबीस हजार दस बार बेंत से पीटा, बीस हजार नौ सौ नवासी बार रूलर से पीटा, एक लाख छत्तीस हजार सात सौ पंद्रह बार थप्पड़ मारे, दस हजार दो सौ पैंतीस बार मुंह पर घूंसे मारे, सात हजार नौ सौ पांच बार कान उमेठे, और ग्यारह लाख अट्ठाईस हजार आठ सौ बार पूरे शरीर पर घंूसे बरसाए। इस प्रकार उसने कुल तेईस लाख तीस हजार एक सौ इक्यासी बार बच्चों को शारीरिक दंड दिया।

जब शिक्षा का यह यूरोपीय प्रारूप पीटने और पिटने से शुरू हुआ, तो उसका परिणाम न केवल यूरोप, बल्कि जहां-जहां यूरोप के उपनिवेश बने वहां-वहां प्रकट हुआ। आज अगर हमारे देश में बच्चों के पीटे जाने, उन्हें शारीरिक चोट पहुंचाने, उनका यौन शोषण या बलात्कार करने और शिक्षा से घबराए छात्रों की आत्महत्या के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं, तो क्या यह उस यूरोपीय कारपोरल पनिशमेंट से पैदा की गई अपशिक्षा का अपराधीकरण नहीं है? मादाम मांटेसरी ने बाल जीवन की ग्रहणशीलता को इसलिए पहचाना कि वे न केवल शिक्षा की नवाचार-नारी, बल्कि एक डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक भी थीं। उन्होंने शिक्षा को खेल से जोड़ कर आनंद का उत्सव बनाने की कोशिश की और धीरे-धीरे सरकारी तंत्र ने भी शिक्षा को दंड की प्रक्रिया के घिनौने स्वरूप से मुक्त करने के कानून बना दिए। आज स्कूल में बच्चों को पीटना अपराध है और हर बच्ची-बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार है, लेकिन ये सारे अधिकार तंत्र के पास हैं और तंत्र हमारे देश में ही नहीं, सभी जगह जनता की मर्जी से न चल कर सरकारों की मर्जी से चलता है। जब कोई भी व्यवस्था तंत्रग्रस्त होती है, तो निरंकुश हो जाती है और अधिकार का उपयोग वह डर पैदा करके करती है। इसलिए शिक्षा जहां संस्कारों से भटकी है, वहीं वह तंत्र, शिक्षक, स्कूल के डर, होमवर्क, हाजिरी और घंटी के डर में बदल कर केवल डर की व्यवस्था बन कर रह गई है। जॉन होल्ट ने इसका वर्णन अपनी पुस्तक ‘हाउ चिल्ड्रन फेल’ में किया है।

क्या डर की शिक्षा से अपराध और अपराधी पैदा होते हंै? ऐसा जरूरी नहीं, मगर डर का एक परिणाम है परीक्षा में पास-फेल होना। इस पास-फेल ग्रंथि से पैदा हुआ परीक्षाओं में नकल का अपराध, बाजारों में कुंजियों, प्रश्न बैंकों और तरह-तरह के सस्ते नोट्स बेचने का अपराध, शिक्षकों द्वारा ट्यूशन या कोचिंग क्लास चला कर अपनी नौकरी का कर्तव्य न निभाने का अपराध और शैक्षिक प्रशासन के भ्रष्टाचार का अपराध। शिक्षा तो सभ्यता का सार्वजनिक व्यवहार है, मगर क्या शिक्षा सभ्यता का प्रतीक बन सकी? जब शिक्षातंत्र प्ले-स्कूल से विश्वविद्यालय तक आर्थिक लूट के अपराध से ग्रस्त हो, तो क्या उस तंत्र से शिक्षित या अपशिक्षित डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजर, प्रशासक, कर्मचारी, शिक्षक, नेता, जनप्रतिनिधि सबके सब लालच से बंधे आर्थिक अपराधी नहीं हैं? क्या ऐसा लोकतंत्र संस्कारों के बजाय विकारों की बुनियाद पर नहीं खड़ा है?दुनिया भर के लोकतंत्रों में शिक्षा का औपनिवेशिक प्रारूप ही प्रचलित है। जब-जब नवाचार हुए, वे सीमित होकर रह गए, उसका पूरा सार्वजनीकरण नहीं हुआ। इसलिए जो भी सुधार हुए वे अत्यंत सीमित हुए, बल्कि सुधारों के नाम पर ऐसे प्राइवेट स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों का जाल बिछ गया, जहां केवल फीस उद्योग चल रहा है।

लोकतंत्र में लोकशिक्षण को आचार्य विनोबा अनिवार्य मानते थे। हमारा लोकशिक्षण आज तक ठीक से हुआ ही नहीं। लोकशिक्षा के अभाव में नेता निरंकुश और मर्यादाहीन हो गए और चुनाव में प्रचार और हार-जीत की भाषा गाली-गलौज से भर गई। ऐसे-ऐसे अपशब्दों या घृणित शब्दों का उपयोग होने लगा, जो किसी भी लोकतंत्र की मर्यादा के लिए लज्जाजनक है। हम सरकारों से, जीतने वालों से, नेतृत्व से असहमत हो सकते हैं, हमें स्वस्थ आलोचना का भी पूरा अधिकार है, मगर तथ्य के बजाय असत्य अपना कर अपशब्दों की बौछार करना क्या किसी भी लोकतंत्र के लिए गर्व की बात हो सकती है? जब पक्ष या प्रतिपक्ष अपनी भाषा विकृत करता है, तो लोकतंत्र अपमानित होता है। वह जनता भी अपमानित होती है जो वह सरकार बनाती है। आज हमारे पास ऐसा कोई चमकदार बौद्धिक नेतृत्व नहीं है, जो जन को लोकतंत्र के संस्कारों में सही ढंग से दीक्षित करे। हमारे पास स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक ऐसा चिंतन, ऐसा बौद्धिक उन्मेष भी नहीं है, जो शिक्षा को लोकतंत्र की कार्यशाला बनाए। हम राजनीति का धर्म भूल कर धर्म की राजनीति करने लगे, शिक्षा का मानवीय संस्कार रचने के बजाय गालियों, गोलियों और अपशब्दों, अपराधों का विकृत व्यवहार बनाने लगे, जब लोकतंत्र नेताओं की वाणी, कर्म और व्यवहार से ग्रस्त होगा, तो हमारी सामूहिक चेतना, स्वायत्त और स्वतंत्र चेतना का अपहरण राजनीति करेगी ही और यह हमारी दो सौ वर्षों से जारी उस शिक्षा का भयावह परिणाम है, जिसने हमें अपशिक्षा में धकेल कर अपराधों की राजनीति और अपराधियों के लोकतंत्र में धक्का देकर पीस दिया।

 

 

 

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  1. E
    Europe Wasi
    Apr 9, 2017 at 5:03 am
    Dave bhai, aap ko Europe ke baare me kucch pata bhi hai? Bura mat maniyega parantu lagta hai aap jhumri talaiyya me baith kar Europe ke sambandh be apne dimaag ka gyan baant rahe hain. Yeh theek nahi.
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग