December 10, 2016

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उपाधि का पर्याय नहीं अनुसंधान

हिंदी में अनुसंधान की नींव एक विदेशी जिज्ञासु ने अपने व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक दायित्व निभाने के लिए रखी थी, वे थे ‘गार्सां द तासी’।

Author नई दिल्ली | November 6, 2016 04:49 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

अमरनाथ

शोध की समकालीन दशा को देख कर लगता है कि शोध को उपाधि का पर्याय मान लेना आधुनिक भारत की एक दुर्घटना है। इसके लिए हमारी वह व्यवस्था जिम्मेदार है, जिसने इसे नौकरी से जोड़ कर मांग और पूर्ति के गणित में उलझा दिया। यह सही है कि सभ्यता के विकास में अब तक जो कुछ हमने अर्जित किया, वह सब अनुसंधान की देन है और जिज्ञासु मनुष्य साधनों के अभाव में भी अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण अनुसंधान से जुड़ा रहता है। जेम्सवाट ने किसी प्रयोगशाला में पता नहीं लगाया था कि भाप में शक्ति होती है और न तो धरती में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति का पता लगाने के लिए न्यूटन को किसी अनुसंधान केंद्र में जाना पड़ा था। उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति ने अभावों में भी उन्हें इतने बड़े सत्य के उद्घाटन के लिए विवश कर दिया।

‘शोध’ शब्द ‘शुध्’ धातु से बना है। इसका अर्थ है शुद्ध करना, परिमार्जित करना, संदेह रहित बनाना या प्रामाणिक बनाना। भलीभांति व्याख्या सहित परिकल्पना या समस्या को हल करने की व्यवस्थित और तटस्थ प्रक्रिया का नाम ही शोध है। अनुसंधान एक प्रवहमान प्रक्रिया है। इसका आदि तो है, पर अंत नहीं। शोध, ज्ञान की किसी एक सीमा तक पहुंच कर रुक नहीं जाता, वह आगे बढ़ता रहता है। विज्ञान के सिद्धांतों को लोग प्राय: शाश्वत मानते रहे हैं। अब यह मान्यता भी खंडित हो चुकी है। कोई भी सिद्धांत समय और परिस्थिति-विशेष में भले सत्य या अकाट्य रहा हो, पर उसकी सत्यता और अकाट्यता सार्वकालिक सिद्ध नहीं हो सकती। मसलन, पहले अणु को पदार्थ का न्यूनतम अंश माना जाता था, पर आधुनिक शोध ने परमाणु को उसका न्यूनतम अंश सिद्ध कर दिया है। यानी शोध में सर्वथा नूतन सृष्टि का नहीं; अज्ञात को ज्ञात करने का भाव है। शोधकर्ता का कार्य भूले हुए तथ्य को पुन: प्रकाश में लाना और उसे पूर्व ज्ञान की शृंखला से जोड़ देना भी है। इतना ही नहीं, शोध नए तथ्यों की खोज ही नहीं, उनकी तर्कसम्मत व्याख्या भी है।

हमारे देश में अनुसंधान के विकास में राष्ट्रीय और बौद्धिक जागरण का महत्त्वपूर्ण योगदान है। हमारे बुद्धिजीवी अंगरेजों के संपर्क में आए और उनकी विकसित सभ्यता से प्रभावित हुए। 1828 से लेकर 1885 तक का कालखंड इस दृष्टि से विशेष महत्त्व का है। इस कालखंड की ऐसी घटनाएं हैं, जिनके कारण भारत के बौद्धिक समुदाय में अपनी अस्मिता के प्रति विवेक और जागरूकता का संचार हुआ। संचार व्यवस्था, रेल संपर्क, छापाखाने आदि भी इसी दौर में विकसित हुए। इससे साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नई चेतना का संचार हुआ।

हिंदी में अनुसंधान की नींव एक विदेशी जिज्ञासु ने अपने व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक दायित्व निभाने के लिए रखी थी, वे थे ‘गार्सां द तासी’। 1839 में फ्रेंच में ‘इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐंदुई ऐंदुस्तानी’ और इसके आठ वर्ष बाद इसका दूसरा भाग प्रकाशित हुआ था। इसकी उपलब्धियां और गुणवत्ता विवादास्पद हो सकती हैं, पर इसमें हिंदी-उर्दू के कवियों का परिचय, नवीन तथ्य और सूचनाएं अनुसंधापरक दृष्टि की परिचायक हैं। यह एक व्यक्ति का उपाधिनिरपेक्ष निजी प्रयास है। हिंदी अनुसंधान के विकास में यह एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है। उन्यासी वर्ष बाद एक दूसरे विदेशी विद्वान ने लंदन विश्वविद्यालय से उपाधि सापेक्ष अनुसंधानकार्य किया। वे थे जेएन कारपेंटर और उनका विषय था ‘थियोलॉजी आॅफ तुलसीदास’। इस पर उन्हें 1918 में शोध उपाधि प्राप्त हुई।

1913 में भारत के विभिन्न स्थानों में विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव पारित हुआ और देश के प्रमुख शहरों लखनऊ, आगरा, नागपुर आदि में विश्वविद्यालय खुलने लगे। हालांकि 1857 में कलकत्ता, बंबई और मद्रास में विश्वविद्यालय खुल चुके थे और बाद में वहां अनुसंधान कार्य भी आरंभ हो चुके थे। इस तरह प्रतिष्ठानिक रूप में उपाधि सापेक्ष अनुसंधान कार्य मूलत: विश्वविद्यालयों में शुरू हुए, पर इसके साथ ही स्वैच्छिक रूप से उपाधिनिरपेक्ष अनुसंधानकार्य पूर्ववत जारी रहे और आज भी हो रहे हैं। इस तरह अनुसंधान की दो परंपराएं मौजूद हैं, पहला वैयक्तिक और दूसरा प्रतिष्ठानिक प्रयास।

आज देश के सैकड़ों विश्वविद्यालयों में हजारों शोधछात्र पंजीकृत हैं, पर शोधकार्य के स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा इसका स्तर उठाने के लिए समय-समय पर कुछ कठोर कदम भी उठाए गए हैं, पर वस्तुस्थिति में कोई खास बदलाव दिखाई नहीं देता। इसका सबसे प्रमुख कारण है, शोध उपाधि को नौकरी से जोड़ दिया जाना। हिंदी की दशा तो यह है कि शोध के नाम पर जमा किए जाने वाले ज्यादातर प्रबंध या तो दस-बीस पुस्तकों से उतारे गए उद्धरणों के असंबद्ध समूह होते हैं या निजी स्वार्थ की सिद्धि के लिए ऊंचे पदों पर आसीन आचार्यों या साहित्यकारों के गुणगान।

गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरने वाले प्रबंध यदाकदा ही देखने को मिलते हैं। आखिर क्या कारण है कि आज शोध के लिए आधुनिक साहित्य ही शोधार्थियों और निर्देशकों को अधिक आकर्षित कर रहा है और उसमें भी कथा साहित्य? आजकल जीवित और रचनाकर्म में रत रचनाकारों पर भी धड़ल्ले से शोध कार्य संपन्न हो रहे हैं। इतना भी नहीं विचार किया जाता कि अगर रचनारत किसी साहित्यकार पर कोई थीसिस या अवधारणा बना ली गई और उसके कुछ दिन बाद उस साहित्यकार की विचारधारा में बदलाव आ गया तो उस थीसिस का क्या होगा? आखिर रचनाकार जड़ तो होता नहीं, वह निरंतर सीखता और वैचारिक रूप से बदलता रहता है। पर निर्देशक को तो शोध के बहाने उससे अपने रिश्ते जोड़ने हैं। उपाधि मिल जाने के बाद किसी को क्या लेना-देना?

आजकल शोधप्रबंध का नतीजा तभी घोषित हो जाता है जब शोधछात्र अपना निर्देशक चुनता है, क्योंकि परीक्षक शोधप्रबंध नहीं, निर्देशक का नाम पढ़ता है और कुछ कमियों का उल्लेख करके यह जानते हुए भी कि ऐसे शोधप्रबंध के आधार पर उसे डिग्री नहीं दी जानी चाहिए, विश्वविद्यालय को डॉक्टरेट की उपाधि देने की सिफारिश कर देता है। अनेक शोधछात्रों की दशा डरे-सहमे गुलामों जैसी होती है और सामंती मिजाज के शोध निर्देशक डिग्री मिल जाने तक उनका शोषण करते रहते हैं और बदले में स्तरहीन शोधप्रबंधों पर डिग्री दिला कर उन पर कृपा करते हैं। आजकल तो शोध निर्देशकों ने डिग्री ही नहीं, नौकरी दिलाने का भी मानो ठेका ले रखा है। बहुत से शोध निर्देशक विषय विशेषज्ञ के रूप में जहां भी जाते हैं अपने शोध छात्रों को साथ लेकर जाते हैं और अयोग्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति करके किसी सुयोग्य का हक छीनते हैं और प्रकारांतर से पीढ़ियां बर्बाद करते हैं।

वैश्वीकरण के बाद अनुसंधान के क्षेत्र में तेजी से गिरावट आई है। अब तो हमारे देश की पहली श्रेणी की प्रतिभाएं मोटी रकम कमाने के चक्कर में मैनेजर, डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहती हैं और जल्द से जल्द विदेश उड़ जाना चाहती हैं। किसी पारंपरिक विषय में पोस्टग्रेजुएट करके शोध करना उन्हें नहीं भाता। जो डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन पाते वे ही अब मजबूरी में शोध का क्षेत्र चुन रहे हैं। वैश्वीकरण और बाजारवाद ने नई प्रतिभाओं का चरित्र ही बदल दिया है।

 

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First Published on November 6, 2016 4:49 am

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