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भाषा का लोकतंत्र

लोकतंत्र वाणी की स्वतंत्रता देता है, लेकिन वाणी के प्रदूषण या हवस की नहीं। लोकतंत्र व्यवस्था की स्वायत्तता देता है, लेकिन सत्ता की निरंकुशता नहीं।
Author May 14, 2017 06:09 am
(भारतीय लोकतंत्र)

  रमेश दवे

लोकतंत्र केवल व्यवस्था नहीं है, वह एक संपूर्ण और श्रेष्ठ सभ्यता भी है। लोकतंत्र केवल राजनीतिजीवी नहीं होता, वह भाषाजीवी, संस्कृतिजीवी और मयार्दाजीवी भी होता है। जन जिसे नेतृत्व सौंपता है, अगर वह जन-प्रतिनिधि कहा जाता है, तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह विकास के नाम पर सड़क, बिजली, पानी, परिवहन और सार्वजनिक सुविधाओं का ही प्रतिनिधि बन कर रह जाए। वह जिस देश या राज्य का प्रतिनिधि है, उसे उसकी भाषा, उसकी संस्कृति, उसके समाज और समाज के समस्त लोकाचारों का भी प्रतिनिधित्व करना होगा, तभी वह एक सभ्य लोकतंत्र का सभ्य प्रतिनिधि माना जाएगा।  लोकतंत्र वाणी की स्वतंत्रता देता है, लेकिन वाणी के प्रदूषण या हवस की नहीं। लोकतंत्र व्यवस्था की स्वायत्तता देता है, लेकिन सत्ता की निरंकुशता नहीं। लोकतंत्र आत्मानुशासन, स्वशासित मर्यादा और आचरण की व्यवस्था है। उसे अगर हम सरकार यानी पुलिस, प्रशासन, अदालत और निर्वाचित संस्थाओं का लोकतंत्र बना कर रखते हैं, तो गांधी का यह कथन सच साबित हो जाएगा कि लोकतंत्र बहुमत की तानाशाही की व्यवस्था है।

हाल में विधानसभाओं और नगर निकायों के जो चुनाव हुए वे भाषा के विध्वंस और भाषा की वीभत्सता के चुनाव कहे जा सकते हैं। पक्ष-प्रतिपक्ष तर्कपूर्ण ढंग से आलोचना-प्रतिआलोचना कर सकते हैं, लेकिन आलोचना-भाषा का चरित्र संसदीय होना चाहिए, सभ्य होना चाहिए, उत्तेजना-रहित होना चाहिए, धार्मिक, मजहबी या सांप्रदायिक जुनूनों की आपत्तिजनक शब्दावली से मुक्त होना चाहिए। जब राजनेताओं की तर्क-बुद्धि भ्रष्ट या कमजोर हो जाती है, तो सबसे पहले भाषा बिगड़ती है। अपशब्दों का अंबार खड़ा हो जाता है। ‘साधु’ शब्द का अर्थ सज्जनता और शील से जुड़ा है, अगर वे साधु-संत या मजहबी नेता राजनीतिक जीवन की साधना करते हंै, तो उनकी भाषा, उनके बयानों, उनके विरोधों में भाषा का शील, भाषा की साधना और भाषा की मर्यादा प्रकट होनी चाहिए। अपशब्दों, अपवाक्यों और उत्तेजित बयानों से समाज में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास और संदेह पैदा होने लगता है।
हम अपने चुनाव-प्रचारों, राजनीतिक सभाओं, रैलियों और आंदोलनों में जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वह धर्म या मजहब की भाषा तो हो ही नहीं सकती, क्योंकि गीता, कुरान, या अन्य धर्मग्रंथ अपशब्दों में नहीं हैं, वे तो मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ भाषा में हैं। इन महान ग्रंथों या मजहबी, धार्मिक अनुशासनों को हम अपनी खराब भाषा का जामा पहनाते हैं, तो इससे खराब भाषा का उपयोग करने वाले ही बदनाम नहीं होते, बल्कि हम अपनी आस्थाओं, ग्रंथों, अनुष्ठानों, प्रार्थनाओं और साधनाओं का भी अनुमान करते हैं।

चुनावों के दौरान नेताओं, उम्मीदवारों, उनके कार्यकताओं, यहां तक कि साधु-संतों, पीर-फकीरों, मौलवियों ने जिस प्रकार की भाषा और मीडिया बहसों में उत्तेजना का इजहार किया उससे क्या उनकी लोकप्रियता बढ़ी? बहसों में उनके उत्तेजना भरे एंकरों ने जो भाषाई प्रदर्शन किया, उससे लोकतंत्र बदनाम ही हुआ। लोकतंत्र का श्रेष्ठतम ग्रंथ होता है उसका संविधान, जो हमें नीतियां, मर्यादाएं, कर्तव्य और अधिकारों के साथ हमारे राजनीतिक, सामाजिक और सार्वजनिक आचरण सिखाता है। अगर उस संविधान की हर धारा, उपधारा, बंध-उपबंधों को लेकर हम एक महान राष्ट्र के ग्रंथ का ही अपमान करने लगेंगे तो क्या लोकतंत्र संविधान के जरिए जीएगा या हमारी भाषा और व्यवहार से स्वयं ही आत्महत्या कर लेगा?
लोकतंत्र सार्वजनिक विचार का तंत्र है, यहां व्यक्ति या व्यवस्था से अधिक जन महत्त्वपूर्ण होता है। जन को हमने अपनी जातिवादी व्यवस्था में अनेक वर्गों या पंथों में बांट रखा है, मगर जन का एक व्यापक अर्थ तो पूरी कौम, पूरा समाज, पूरी जनता और पूरा राष्ट्र होता है। लोकतंत्र ऐसे ही जन से बनता है, इसलिए इसे जनतंत्र भी कहा जाता है। जनतंत्र में जन शिक्षित और दीक्षित होता है। भाषा से भाषा में साहित्य, संगीत, कला और हमारे लोकाचार आदि प्रकट होते हैं, तो भाषा लोकसंवेदी और सुंदर हो जाती है। अगर हम राजनीतिक मंचों से मनुष्य से मनुष्य को जोड़ने की भाषा बोलेंगे तो सामाजिक-समरसता पैदा होगी और अगर हम चाहे पक्ष हों या प्रतिपक्ष, सबको लेकर अपशब्दों या हिंसक उत्तेजना से भरी भाषा बोएंगे तो जन क्या संस्कार ग्रहण करेगा? यह तो भाषा का अपराधीकरण है, जो अंतत: सामाजिक तत्त्वों को जन्म देता है और हिंसक हो जाता है।

हम चाहे शिक्षा हो, साहित्य, कलाएं, राजनीति हो, विज्ञान या लोकजीवन हो, अगर अपने जन को अच्छे शब्द देंगे, अच्छे वाक्य देंगे, अच्छे बयान देंगे, अच्छा साहित्य देंगे और अच्छी राजनीति देंगे, तो हमारा लोकतंत्र सभ्यता का प्रतिनिधि बनेगा, न कि उद्दंड और उत्तेजित नेताओं की अभद्रता का उदाहरण।सरकारें बनती हैं, आती और जाती हैं, जन अपनी जगह बना रहता है। हम जितना अपने आचरण पर आत्मचिंतन कर सकते हैं, करें, मगर जन-चिंतन भी करें। किसी भी लोकतंत्र की सभ्यता, अभिव्यक्ति उसकी संस्कृति, समाज, बौद्धिक पीढ़ी, साहित्यकारों और कलाकारों में होती है। हम अपनी शिक्षा में कोई अपशब्द की किताब या डिक्शनरी नहीं देते, हम अपने लोकतंत्र की शपथ में एक भी अपशब्द या उत्तेजना भरा या भेदभाव भरा वाक्य नहीं देते, हमारा संविधान दुनिया की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है, जिसमें कोई खराब शब्द नहीं, हमारी न्याय व्यवस्था और कानून मानवीय संवेदना की शब्दावली में लिखे गए हैं। किसी स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय या संस्थान में कोई पाठ्यक्रम या पुस्तक अपशब्दों में नहीं है और कोई अध्यापक या प्राध्यापक अपने अध्यापन के दौरान अपशब्दों से भरी भाषा का इस्तेमाल नहीं करता, फिर यह कितनी बड़ी विडंबना या आश्चर्य की बात है कि हमारे राजनीतिक लोकजीवन में पढ़े-लिखे नेताओं द्वारा भाषा, व्यवहार, आचरण, चरित्र आदि सब विवाद के विषय बना दिए जाते हैं। इससे तो यह भी सिद्ध होता है कि हम राजनीति में चुनाव लड़ना और वोट दिलवाना तो सीख गए हैं, लेकिन लोकतंत्र का चरित्र और अनुशासन नहीं सीख पाए हैं।

देश के तमाम बौद्धिकों और खासकर अध्यापक-प्राध्यापकों, वकीलों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, वैज्ञानिकों, एनजीओ और धार्मिक संस्थाओं को मिल कर अब आगे करना होगा और लोकतंत्र में राजनेताओं को भाषा का सभ्य संस्कार देना होगा। राजनीति में राज चलाने की नीति है। उस नीति को हम मर्यादाहीन या अपनीति न बनने दें। भाषा का भी अपना विज्ञान है, वह तर्क करने, सच कहने, विरोध करने, प्रशंसा करने, आलोचना करने और हमारे जीवन से जुड़े सभी कार्यकलाप संपन्न करने की प्रणाली और शब्दावली देता है। कहा जाता है कि मनुष्य से पहले तो शब्द ही जन्मा था। अगर शब्द मनुष्य के पूर्व जन्मा है और पृथ्वी का पूर्वज है, तो शब्द ही तो भाषा का तत्त्व, पुरातत्त्व और पृथ्वी का प्रथम नागरिक है। अगर हम लोकतंत्र को एक भद्र व्यवस्था कहते हैं तो उसे भाषा की अभद्रता से बचा कर सभ्यता का मानक बनाना होगा।

 

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