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मानसिक दूषण का खेल- ब्लू वेल

इस तरह की ट्रेनिंग उनके आधुनिक वास्तविक जीवन में बहुत काम की होती है। बदली सामाजिक व्यवस्था में अगर वास्तविक ट्रेनिंग की कोई व्यवस्था नहीं है, तो इस तरह के उपायों के अलावा क्या रास्ता हो सकता है।
Author August 20, 2017 06:20 am
प्रतिकात्मक फोटो।

मणींद्र नाथ ठाकुर

‘ब्लू वेल’ नामक एक खेल ने दुनिया भर में तहलका मचा दिया है। इस खेल के अंत में बच्चों को आत्महत्या के लिए उकसाया जाता है। अहिस्ता-आहिस्ता इंटरनेट ने हमारे लिए एक अलग संसार बना दिया है। हमारी जरूरत की हर चीज को उसमें उपलब्ध कराने की कोशिश की जाती है। मनुष्य की हर कमजोरी को बाजार विस्तार का माध्यम बनाया जाता है। जैसे सेक्स का एक फलता-फूलता बाजार है, वैसे ही भय, हिंसा, ईर्ष्या आदि का भी बाजारीकरण है। अब बाजार ही आज की विचारधारा है। कहते हैं, जो बिकता है वही सही है। इसका तर्क यह है कि कोई सामान बिकता तभी है जब मनुष्य को उसकी जरूरत होती है। हमें बाजार का शुक्रगुजार होना चाहिए कि हमारी जरूरतों पर शोध कर हमें सामान मुहैया करने का भरपूर प्रयास किया जाता है। ऐसे में क्या बिकने वाले किसी सामान पर रोक लगाना उचित है? इसके विपरीत तर्क यह है कि बाजार हमारी कमजोरियों का फायदा उठाता है और हम अपना हित-अहित सोचे बिना उस जाल में फंस जाते हैं। इसलिए राज्य को इसका ध्यान रखना चाहिए और बाजार पर नियंत्रण रखना चाहिए, ताकि जनता को ठगा न जा सके।
मगर बच्चों के इंटरनेट खेलों को बारे में यह तय करना ही कठिन है कि यह उनके हित में है या नहीं। गेम बनाने वालों की मंशा तो साफ है कि उन्हें फायदे से मतलब है। ‘आप खेलें और हम कमाएं’ की तर्ज पर चलने वाली इस दुनिया में कोई नैतिकता है भी या नहीं, यह शोध का विषय है। इतना तो जरूर है कि बाजार की अपनी नैतिकता होती है, जिसका मूल मंत्र है फायदा। मनुष्य अगर विकेशील प्राणी है और खुद तय कर सकता है कि उसके हित में क्या है और क्या नहीं है, तो बच्चों के बारे में इतना तो माना ही जा सकता है कि उनके लिए यह तय करना मुश्किल है। विवेक अभी विकसित होने की प्रक्रिया में है। उनमें मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियां ज्यादा प्रभावकारी हो सकती हैं, इसलिए उनके विकारों को उत्तेजित कर लाभ कमाने में बाजार सक्षम है। दुनिया भर में इस बात पर शायद ही कोई मतभेद हो कि बच्चों के खेलों पर नजर रखना जरूरी है।

बच्चों को लेकर टेलीविजन के विषय में भी पहले बहस हो चुकी है। खासकर एशिया के माता-पिताओं पर शोध करने वालों का मानना है कि हम अनावश्यक रूप से टेलीविजन देखने पर रोक लगाते रहे। रिमोट छिपा देना, केबल नहीं रखना और बच्चों को डांटना तो घर-घर की कहानी हो गई थी। बच्चों की हर विफलता के लिए टेलीविजन को ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा। लेकिन सच तो यह है कि उसमें माता-पिता की बदलती संस्कृति का हाथ ज्यादा ही था। क्या इन गेम के साथ भी ऐसा ही कुछ नहीं है? मैंने कई ऐसे बच्चों से बात की, जो इस मुकाम से गुजर चुके हैं। उनका मानना है कि उन्हें एक परेशानी तो रही कि उनका बहुत-सा समय इसमें लगा। लेकिन यह भी सही है कि कभी भी उन्होंने अन्य बच्चों के साथ खेलने की जगह इस तरह के गेम को बेहतर नहीं माना। इसलिए समस्या हमारे समाज के एकाकीपन का भी है। उनका यह भी मानना है कि समाज में बढ़ती हिंसा से इसे जोड़ना बिल्कुल अनुचित होगा। बल्कि शायद इससे हिंसा कम ही हुई हो, क्योंकि उसे प्रवाहित होने का मौका मिल जाता है। उन्होंने एकाग्रता और तार्किक चिंतन के विकास की बात भी की।
उनका मानना है कि ‘एंग्री बर्ड’ जैसे खेल में जहां अपने गुस्से को निकालने का मौका मिलता है, वहीं हिंसक दिखने वाले कई और खेलों में कठिन परिस्थितियों में धैर्य के साथ स्ट्रैटेजी और प्लानिंग की ट्रेनिंग भी मिलती है। उनका यह भी मानना है कि इस तरह की ट्रेनिंग उनके आधुनिक वास्तविक जीवन में बहुत काम की होती है। बदली सामाजिक व्यवस्था में अगर वास्तविक ट्रेनिंग की कोई व्यवस्था नहीं है, तो इस तरह के उपायों के अलावा क्या रास्ता हो सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि बहुत से ऐसे खेल जिस तरह के ऐलोग्रिथम पर बने होते हैं उससे बच्चों की अच्छी-खासी दिमागी कसरत होती होगी।

कई देशों में इन खेलों पर प्रतिबंध लगाने का कारण हिंसा में बढ़ोतरी नहीं, बल्कि खेलों में गुप्त रूप से निहित विचारधारा और संस्कृति है। मेरे खयाल से यह ज्यादा विचारणीय प्रश्न है। इन खेलों में जो सामाजिक ताना-बाना उन्हें दिखता है, उसका प्रभाव बच्चों के अवचेतन मन पर पड़ता होगा, इसमें कोई शक नहीं है। यहां तक कि ऐसा भी देखा गया है कि कई खेलों में अतिकामुकता जानबूझ कर डाली जाती है, ताकि बच्चों की काम भावना को उकसा कर इसका बाजार स्थापित किया जा सके। आप शायद ही किसी खेल में सामाजिक सरोकार के विकास की संभावना देख पाएंगे। इसमें एक व्यक्तिवादी विचारधारा को पुष्ट करने के सभी तत्त्व मौजूद होते हैं। एकाकी होते आधुनिक समाज में इसका प्रभाव और भी खतरनाक हो सकता है। इस तरह के खेलों को खेलने की प्रक्रिया भी एकाकाकीपन को बढ़ावा देती है। और एकाकाकीपन से जीवन में उद्देश्यहीनता आ सकती है। लेकिन इसके लिए केवल गेम को जिम्मेदार मानना ठीक नहीं होगा। हमें अपने समाज के बदलते परिवेश को लेकर चिंतित होने की जरूरत है।

विचारधारा का यह खेल ज्यादा खतरनाक है। इससे कैसे निपटा जाए, यह एक अहम सवाल है। इसका एक तरीका तो यह हो सकता है हम भी अपने सांस्कृतिक आदर्शों पर आधारित खेलों के निर्माण का प्रयास करें। दुनिया भर में उसके विस्तार का प्रयास करें। इंटरनेट गेम या डिजिटल गेम एक तरह का ‘सॉफ्ट पवार’ है। लोगों के वैचारिक क्षेत्र पर कब्जा के लिए चल रहे युद्ध का एक हिस्सा है। हमें उस स्तर पर सोचने की जरूरत है। आने वाले समय में जिस नई क्रांति से हमारा साबका पड़ने वाला है, उसका लेना-देना दिमाग से है। सॉफ्टवेयर के दौर में दुनिया की अर्थव्यवस्था में जो हिस्सेदारी हमें मिली है, उसे आगे बचाए रखने के लिए इस नई परिस्थिति को समझना जरूरी है। जानकारों का मानना है कि अगले चार-पांच वर्षों में हमें कृत्रिम बैद्धिकता का सामना करना पड़ेगा। फिर हम कहां तक बच सकते हैं इस तरह के खेलों से। इसमें कोई शक नहीं है कि हमें इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है और खतरनाक खेलों को बाजार से निकाल बाहर करने की भी जरूरत है। लेकिन हम इसे पूरी तरह से खारिज नहीं कर सकते हैं। यह हमारे समय का युग धर्म है।

 

 

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