December 04, 2016

ताज़ा खबर

 

समाज: स्त्री सम्मान का सवाल और कानून

फ्रायड कहता है कि प्रकृति ने तो केवल दो भेद किए हैं प्राणियों में- स्त्री और पुरुष का। अतुल कनक का लेख।

Author नई दिल्ली | October 30, 2016 05:22 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

अतुल कनक

इंडोनेशिया में बलात्कार के दोषी व्यक्ति को नपुंसक बनाने के कानूनी प्रावधान के बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा है। किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसकी देह के साथ खिलवाड़ करने को लेकर दुनिया भर में आक्रोश है। कुछ देशों में बलात्कार के अपराधी को रासायनिक प्रक्रिया से नपुंसक बनाने का कानून पहले से अस्तित्व में है। खाड़ी के कुछ देशों में तो बलात्कार के दोषी को मृत्युदंड तक का प्रावधान है। कुछ समय पहले भारत में भी यह मांग उठी थी कि बलात्कार के दोषियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए।  महिलाओं को देवी, आराध्या, गृहलक्ष्मी जैसे विभूषणों से अलंकृत करने वाले हमारे समाज में बहुत सारी औरतें घरेलू हिंसा का शिकार हैं। मगर महिलाओं को लेकर कई जिम्मेदार राजनेताओं का भी नजरिया संकीर्ण ही देखा गया है। उन्हें शायद इस बात का अहसास नहीं कि लड़कों की गलती का खमियाजा जिन लड़कियों को भुगतना पड़ता है, उनकी आत्मा पर आई खरोंचों का क्या होगा? निश्चित रूप से बाजारवाद के कारण जीवन शैली में उन्मुक्तता आई है, इसने सामान्य जीवन में उच्छृंखलता को बढ़ावा दिया है। यह केवल लड़कों में नहीं, लड़कियों में भी दिखने लगा है। पर इसका यह अर्थ नहीं कि बलात्कार जैसी दुष्प्रवृत्ति के लिए लड़कियां जिम्मेदार हैं। जिस समाज में सदियों से केवल स्त्रियों को निशाना बनाया जाता रहा हो, वहां मान्यताओं के कारण सिकुड़ी-सिमटी रह कर स्त्री बंदिशें और अत्याचार कब तक बर्दाश्त करे।

जिन औरतों के खिलाफ यौन अपराध करने वाले को मृत्युदंड देने या नपुंसक कर दिए जाने की पैरवी हमारे यहां की जा रही है, उन औरतों में से कइयों को अपने घर के अंदर ही ऐसी कुत्सित मनोवृत्तियों का शिकार होना पड़ता है और वह भी ऐसी उम्र में जब लड़की अपने को गलत ढंग से छुए जाने के वास्तविक अर्थ तक को नहीं समझ पाती। कहीं मुंहबोले भाई, तो कहीं मुंहबोले चाचा अपनी यौन कुंठाएं मासूमों पर निकालते हैं। जब जवान होती बेटियां अपने ही घर की चारदीवारी में सुरक्षित नहीं हैं तो फिर कोई भी कड़ा कानून कैसे उन्हें बचा सकेगा? यह वह देश है, जहां कथित लोकलाज के मारे ऐसे अधिकतर मामले सबके सामने ही नहीं आ पाते।  आधुनिक जीवन शैली या लड़कियों की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक उन्मुक्तता को इसका दोष देने वाले शायद भूल जाते हैं कि स्त्री के प्रति कुत्सित मानसिकता अपने तिलिस्म हर युग में खड़ी करती रही है। स्त्रियों के प्रति भोगवादी ताकतें हर युग में सक्रिय रही हैं, लेकिन अब बाजार ने स्त्री को सिर्फ भोग की वस्तु में बदल दिया है। हम या तो स्त्री को देवी बनाने पर आमादा हो जाते हैं या उसे केवल ‘मस्त चीज’ मान बैठते हैं- जबकि स्त्री की आत्मा इन दोनों अतियों के बीच कहीं निवास करती है। हम उससे उम्मीद करते हैं कि वह सतत त्याग और कर्तव्यपरायणता की प्रतिमा बनी रहे। मगर हम भूल जाते हैं कि उसके अंदर भी एक दिल है, जो लगातार धड़कता है और उसके पास भी अपने अस्तित्व को महसूस करने के लिए और अपने सपनों की दुनिया में रंग भरने के लिए वे सभी प्राणेंद्रियां हैं, जो कुदरत ने पुरुष को सौंपी है।

स्त्रियों के प्रति जघन्य अपराध उस युग में भी हुए हैं, जब वे छुईमुई बन कर घर की चारदीवारी में रहती थीं। सच तो यह है कि पर्दे की आड़ में स्त्री का शोषण अधिक हुआ है- भावनात्मक भी और शारीरिक भी। इतिहास या वांग्मय में ऐसी अनगिनत घटनाएं दर्ज हैं। पुरुष के लिए हो सकता है कि दैहिक क्रियाओं का संवाद केवल स्खलन के अल्पविराम पर पूर्ण हो जाता है, लेकिन स्त्री तब तक किसी को अपना स्पर्श नहीं दे सकती, जब तक वह मन से उस स्पर्श के साथ जुड़ी न हो। स्त्री के साथ का अमृत पाने के लिए उसके मन के फागुन से गुजरना होता है।… और ऐसा केवल अपराध की दुनिया में नहीं होता कि लोग अपनी ताकत के बल पर स्त्री के शरीर से मनमानी करना चाहते हों, बहुत सारे परिवारों में भी ऐसा होता है। घरेलू स्त्रियां अनेक अवसरों पर अपने ही जीवन साथी के कारण किस मानसिक यंत्रणा से गुजरती हैं, इसका अनुमान कई परिवारों में अपनी पत्नी के प्रति पुरुष के सार्वजनिक व्यवहार से ही लगाया जा सकता है।

फ्रायड कहता है कि प्रकृति ने तो केवल दो भेद किए हैं प्राणियों में- स्त्री और पुरुष का। इसके अलावा जितने भी भेद हैं, वे मनुष्य समाज ने कतिपय मर्यादाओं की रक्षा के लिए कृत्रिम तौर पर स्थापित किए हैं। फ्रायड का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ऐसे लोगों द्वारा स्त्री के प्रति यौन अपराधों की चेष्टा को समझने की एक दृष्टि तो देता है, जिन लोगों द्वारा स्त्रियों की देह पर कुत्सित निगाह डालने की कल्पना भी सामान्य तौर पर नहीं की जाती। लेकिन स्त्रियों के प्रति ऐसे अपराधों की चेष्टा के उदाहरण सारी दुनिया में मिल जाएंगे। ससुर तो पिता के समान होता है, लेकिन ससुर द्वारा बहू के यौन उत्पीड़न के किस्से अब परंपरावादी समाजों में आम हो गए हैं।

स्त्री के मन को समझे बिना उसकी देह तक पहुंचने की कोशिश ही परोक्षत: बलात्कार की प्रवृत्ति के पोषण के मूल में है। सच यह भी है कि अगर बहुत दिनों तक स्त्री इस तरह के चक्रव्यूह में घिरी रहती है, तो मुक्ति की छटपटाहट उसे विवाहेतर आकर्षण की ओर ले जाती है। ऐसे रिश्तों में कितने रिश्ते स्त्री को उसके मन का सुख दे पाते हैं, यह बात शायद कभी खुल कर सामने नहीं आ सकेगी, क्योंकि उन्मुक्त जीवन शैली के तमाम आग्रहों के बावजूद स्त्री अपने विवाहेतर संबंध या संबंधों को उजागर करने या स्वीकार करने से प्राय: परहेज ही करेगी (हालांकि अपवाद इस बात के भी देखे गए हैं), लेकिन प्रेमी द्वारा धोखा दिए जाने के बाद मुसीबत में पड़ी औरतों से जुड़ी खबरें सामान्यत: यही बताती हैं कि मन को समझने वाले साथी की ऐसी विवाहेतर तलाश अक्सर स्त्री को कपट और शोषण के नए चक्रव्यूहों में धकेल देती है।

तब समस्या का समाधान आखिर क्या है? जब वाइट हाउस में काम करने वाली मोनिका लेविंस्की के साथ बिल क्लिंटन के रिश्तों का खुलासा हुआ तो सारी दुनिया में बहुत हड़कंप मचा था। पर अब अमेरिकी राष्ट्रपति के पद की दौड़ में शामिल डोनाल्ड ट्रंप की स्त्री देह को लेकर की गई भद्दी टिप्पणियों का टेप सारी दुनिया में वायरल हो चुका है। डोनाल्ड ट्रंप के स्त्रियों के प्रति नजरिए और उनकी हरकतों से यह दुनिया अब अनभिज्ञ नहीं है। अमेरिका जैसे देश में अगर इतनी बदनामी के बावजूद कोई व्यक्ति शीर्ष पद की दौड़ में इतना आगे पहुंचता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिल क्लिंटन के कार्यकाल से लेकर इन चुनावों के समय तक क्या दुनिया की प्राथमिकताओं में स्त्री के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार की बात इतनी पीछे चली गई है? और अगर ऐसा होता है तो फिर कोई भी कानून स्त्री के प्रति सामान्य व्यवहार में सम्मान की स्थापना कैसे कर सकेगा?

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 30, 2016 5:22 am

सबरंग