December 05, 2016

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कला समीक्षा और भाषायी धुंध

हमारे समाज के जिस वर्ग के लिए ये समीक्षाएं समर्पित हैं, वह भी कला समीक्षा के नाम पर चित्र और चित्रकारों की चामत्कारिक कथा-कहानियां सुनना ज्यादा पसंद करता रहा है।

Author नई दिल्ली | November 13, 2016 03:40 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अशोक भौमिक

भारतीय चित्रकला में समीक्षा की दिशा कई दशक से काफी हद तक बाजार द्वारा संचालित होती आई है। लंबे अरसे से चित्रकला की समीक्षा, मुख्यत: साहित्यिकों (मूलत: कवियों!) द्वारा मुद्रित संचार माध्यमों के लिए लिखी आलोचनाओं-समीक्षाओं के रूप में चित्रकला और आम जनता के बीच एक संपर्क सूत्र बनने का काम करती आई है। दूसरी ओर चित्रकला में अंगरेजी कला समीक्षा ने हिंदी कला समीक्षकों से कहीं ज्यादा असरदार ढंग से राजधानी केंद्रिक कला समीक्षा जगत पर अपना आधिपत्य कायम कर रखा है। आज चित्रकला को एक खास वर्ग की कला बनाने और आम जनता से इसे काट देने के पीछे भारत में अंगरेजी कला समीक्षा की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। अंगरेजी कला समीक्षा के इस प्रभावी स्वरूप को पिछली एक सदी से भी ज्यादा समय से बाजार ने सबसे बेहतर समझा और इस्तेमाल किया है। भारत में आधुनिक चित्रकला का विकास शुद्ध रूप से अंगरेजीभाषी व्यक्तियों, अखबारों-पत्रिकाओं, कला समीक्षकों और कला प्रबंधकों के जरिए ही संभव होता रहा है। साथ ही यह भी सच है कि जिन सैकड़ों प्रतिभावान चित्रकारों पर इस ‘समूह’ की मदद नहीं मिली, इतिहास में उनके बारे में हमें ज्यादा कुछ उल्लेख नहीं मिल पाता।

चित्र, अन्य कलाओं की तरह किसी भाषा विशेष के जरिए रचित नहीं होता और न ही इसे ‘समझने’ के लिए किसी भाषाज्ञान की आवश्यकता होती है। सामान्यतया सभी कलाओं की संरचना में एक ‘आरंभ’ होता है, फिर ‘विस्तार’ और ‘अंत’ होता है। कलाकार द्वारा कला की सृष्टि और प्रस्तुति इसी विन्यास के अनुसार होती है। कलाप्रेमी भी कला का आस्वाद इसी पूर्व-निर्धारित क्रम के अनुसार ग्रहण करते हैं। अन्य कलाओं में जहां आलाप, भूमिका, गत, संचारी, स्थायी, अंतरा, झाला, उपसंहार आदि का अस्तित्व होता है, वहीं चित्रकला में इनकी कोई भूमिका नहीं होती। चित्र-दर्शक, अपने इच्छानुसार चित्र के एक ही अंश पर बार-बार लौट कर आ सकते हैं और चाहें तो किसी अंश की उपेक्षा भी कर सकते हैं। वास्तव में चित्रकला का दर्शक खुद भी सृजन की एक खास प्रक्रिया से गुजरते हुए चित्र को नि:शब्द अनुभव करता है। इसी विशेषता के कारण, चित्रकला को रवींद्रनाथ ठाकुर ने मौन कला के रूप में चिह्नित किया था।
चित्रकला की इसी खासियत के चलते समीक्षकों ने (जिनके पास किसी भाषा विशेष के जरिए अभिव्यक्त करने की निपुणता हासिल थी) चित्र की मनचाही और विस्तृत व्याख्याओं की प्रस्तुति मात्र को ही चित्रकला समीक्षा माना और चित्रों में से ऐसे-ऐसे अभिनव तथ्यों का उत्खनन और आविष्कार किया, जिनसे चित्रकार खुद अनभिज्ञ थे। ऐसी समीक्षाओं में हम अनिवार्य रूप से साहित्य-आलोचना में इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावलियों का प्रयोग पाते हैं, जो निस्संदेह इन दुरूह समीक्षाओं को एक छद्म अकादमिक स्वरूप देते हैं।

सदियों से अन्य सभी कलाओं की तुलना में चित्रकला ही एक ऐसा कला-उत्पाद है, जिसे किसी कलाकार से न केवल खरीदा जा सकता है, बल्कि उसे ऊंची कीमत पर दूसरे क्रेता को बेचा भी जा सकता है। अगर किसी कलाकृति के एकाधिक क्रेता हों तो उसकी नीलामी भी की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर किसी कलाकृति का आपराधिक ढंग से नकल बना कर उसे कला व्यापार में लिप्त वैतनिक ‘कला विशेषज्ञों’ द्वारा ‘मूल’ के रूप में सत्यापित करा कर मांग और आपूर्ति के बीच की खाई को पाटने का काम भी संभव होता है। इससे यह तो सहज ही समझ में आता है कि ‘व्यापार’ आधुनिक चित्रकला का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और इसीलिए ‘विपणन’ के सभी सिद्धांत और नियम यहां क्रियाशील दिखते हैं। चूंकि किसी माल या पण्य के विपणन में ‘विज्ञापन’ की एक जरूरी भूमिका होती है, इसलिए चित्रकला में चित्रों और चित्रकारों का विज्ञापन, कला समीक्षा के जरिए ही संपन्न किया जाता है।

यहां क्रेता वर्ग, सुचिह्नित भारत का अंगरेजीभाषी और आर्थिक क्षमता संपन्न वर्ग के साथ-साथ विदेश में रहने वाले कला संग्राहक है, इसलिए इस ‘उत्पाद’ के लिए विज्ञापन (समीक्षा!) का अंगरेजी में होना जरूरी है। इसी कारण भारत के सभी सफल चित्रकारों की सफलता के पीछे हम अनिवार्य रूप से विदेशी और अंगरेजीभाषी भारतीय समीक्षकों की अहम भूमिका रही है।

हमारे समाज के जिस वर्ग के लिए ये समीक्षाएं समर्पित हैं, वह भी कला समीक्षा के नाम पर चित्र और चित्रकारों की चामत्कारिक कथा-कहानियां सुनना ज्यादा पसंद करता रहा है। आज तक के अधिकतर सफल चित्रकारों की सफलता के पीछे समीक्षकों द्वारा रोचक कथा-कहानियों के प्रचार का बहुत बड़ा योगदान रहा है। भारत में आधुनिक कला बाजार के विकास के दौर का मतलब शुद्ध रूप से कला नीलामी के नतीजों के उछाल से जुड़ा रहा है और इसलिए चित्रकारों और उनके चित्रों को एक (छद्म) सैद्धांतिक या दार्शनिक ऊंचाई देने की नीयत से चित्रों की व्याख्याओं के नाम पर भाषायी धुंध प्रस्तुत करना, समीक्षकों के लिए एक आम हथकंड़ा बन गया है। इस प्रकार लोगों में, चित्रकार की जीवन शैली, बाजार में उनके चित्रों की कीमत, चित्रों के पीछे उनके आध्यात्मिक दर्शन आदि को केंद्र में लाकर एक ऐसा धुंध पैदा किया गया, जिसके पीछे उनकी कला का तटस्थ मूल्यांकन गैरजरूरी-सा बन गया।

आम दर्शकों को हालांकि इन महान कलाकारों की कृतियों को देखने का अवसर नहीं मिलता, पर वे पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ऐसी कथाओं के साथ-साथ इन कलाकारों के चित्रों के लिए लगने वाली बोलियों के हैरतअंगेज आंकड़ों के बारे में जान कर, बचपन में सुनी परीकथाओं को याद करते रहते हैं। समीक्षकों द्वारा निर्मित इस धुंध के चलते आज हम यह मानने लगे हैं कि बड़ा कलाकार वही है, जिसकी कृतियां बड़े दामों में बिकती हैं!  बाजार की मांग को पूरा करने के उद्देश्य से भारत में यामिनी राय और उनके बाद की पीढ़ी के सभी सफल कलाकारों ने अपने चित्रों को बार-बार बनाए हैं (रचा नहीं है), पर समीक्षकों ने (किसी भी अन्य कला-सृजन में पुनरावृत्ति के इस निंदनीय पक्ष के समर्थन में) इसे कई बार आध्यात्मिक ‘साधना’ कहा, तो कई बार इसे कलाकार के कौशल और अनुशासन का प्रमाण माना। इन समीक्षकों ने अपनी समीक्षाओं में अनाप-शनाप संदर्भों को लाकर, चित्रकारों की कृतियों के सही मूल्यांकन पर बातचीत करने से अपने को दूर रखा। समीक्षकों की इस प्रवृत्ति के सैकड़ों उदाहरण हैं।

समीक्षकों और कला-व्यापारियों की सम्मिलित साजिशों के चलते चित्रकला से आम कला प्रेमी विच्छिन्न हो गया और समूची नई पीढ़ी के लिए जटिल से जटिलतर व्याख्याओं में फंस कर, चित्रकला ने अपना आकर्षण खो दिया। आज चित्रकला के जिस स्वरूप को हम तेजी से उभरते देख रहे हैं, वह वैश्विक होने की होड़ में ‘फिक्सिंग’ के आसान रास्ते पर गतिमान है और यह वास्तव में बाजार के तमाम निकृष्ट हथकंडों का नतीजा है। इसी प्रवृत्ति ने आज चित्रकारों को पीछे छोड़, क्यूरेटर, कला प्रबंधक, कला समीक्षकों और कला व्यापारियों को चित्रकला के केंद्र में प्रतिष्ठित कर दिया है। आज चित्रकला की दुनिया के सबसे नीचे का स्थान चित्रकार का है, जिसे कठपुतली की तरह कलाबाजार की अन्य तमाम शक्तियां निर्देशित और संचालित कर रही हैं। हमें आश्चर्य नहीं होता, जब हम पाते हैं कि आधुनिक चित्रकला के मटमैले इतिहास और कलुषित वर्तमान में एक भी ऐसा सफल चित्रकार नहीं है, जो किसी कला प्रबंधक या कला व्यापारी द्वारा प्रायोजित न हो!

आज की चित्रकला, आम जनता से विच्छिन्न कला-बाजार के लिए एक ‘माल’ या विपणन योग्य पण्य से अधिक कुछ भी नहीं है। कला समीक्षकों ने कला को अपने विशाल दर्शकों से काट कर मुट्ठी भर आबादी वाले द्वीप में निर्वासित कर दिया है, जहां कलाकारों को ‘जनता’ की आवाज नहीं सुनाई देती है।

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First Published on November 13, 2016 3:36 am

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