December 08, 2016

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तीरंदाज: महाबली के अखाड़े में

अमेरिका में आप किसी से भी बात कीजिए, वह असमंजस की स्थिति में है।

डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन (बाएं) और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप (दाएं) (फाइल फोटो)

अमेरिका आज बड़ी अजीब-सी स्थिति में है। अगले हफ्ते वहां राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं और अभी तक ज्यादातर लोग यह फैसला नहीं कर पाए हैं कि क्या वे वास्तव में सही व्यक्ति को ही वोट दे रहे हैं या फिर वे उस मजबूरी का शिकार हो गए हैं, जिसमें वोट वे किसी को भी दें, हाशिए पर उन्हें ही लगना है। दूसरे शब्दों में, क्या अमेरिका के राजनीतिक हालात लोकतंत्र के अंत (एंड आॅफ डेमोक्रेसी) की तरफ इंगित कर रहे हैं, जिसमें वही उम्मीदवार नामांकित किए जाते हैं, जो जबर्दस्त असर रखने वाले गुटों के पीट्ठू हों, न कि जनमत के नायक?

अमेरिका में आप किसी से भी बात कीजिए, वह असमंजस की स्थिति में है। बहुत सारे लोग रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थक रहे हैं और आज भी हैं। इसी तरह डेमोक्रेटिक पार्टी की हिलेरी क्लिंटन के भी प्रशंसक हैं। पर जैसे-जैसे चुनाव पास आता जा रहा है, दोनों खेमों के समर्थक अपनी ही पसंद पर शक करने लगे हैं। पिछले पंद्रह दिनों में जगजाहिर हो गया है कि दोनों उम्मीदवार अपने ही तैयार किए कीचड़ में सने हुए हैं और जैसे-जैसे समय गुजरेगा दोनों की और ज्यादा मट्टी पलीद होनी निश्चित है।

हिलेरी क्लिंटन पर इ-मेल सर्वर को लेकर कानूनी कार्रवाई होनी संभव लगती है। लीक किए गए इ-मेल इसी तरफ इशारा कर रहे हैं। अगर मौजूदा मेल काफी नहीं हैं, तो कई लोग प्रण किए बैठे हैं कि वे अपना इ-मेल पिटारा थोड़ा और खोल देंगे और तब तक सांस नहीं लेंगे जब तक क्लिंटन पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होती है। साफ है कि क्लिंटन को वोट देकर जिताने का मतलब देश के राष्ट्रपति पद की छीछालेदर करना होगा। अमेरिका के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ कि राष्ट्रपति को गैर-कानूनी कार्यों की वजह से सीधे वाइट हाउस से जेल हाउस जाना पड़ा हो। वैसे भी किसी भी लोकतंत्र के लिए इससे शर्मनाक बात नहीं हो सकती है।

दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रम्प भी दूध के धुले नहीं हैं। उन पर भी कानूनी कार्रवाई के पूरे आसार हैं। उन पर यौन शोषण से लेकर आर्थिक घोटाले तक के आरोप मुंह बाए खड़े हैं। साथ ही उनका महिलाओं, दलितों, उपेक्षितों और कमजोर वर्गों के खिलाफ रवैया उनके लोकतांत्रिक मूल्यों और सर्वजन हित सोच पर सवालिया निशान लगाता है। ट्रम्प कुछ आरोपों के चलते जेल भी जा सकते हैं और अपने चिह्नित कार्यक्रमों की वजह से देश को बंटवारे की कगार पर भी ला सकते हैं।

वास्तव में स्थिति बड़ी विषम है। देश के सामने एक लंबी अंधेरी रात धीरे-धीरे घिर रही है। दोनों ही उम्मीदवार ऐसे हैं, जिनके कार्यकाल के चार साल अमेरिका के वे सब मूल्य धराशाही कर देंगे, जिनकी बदौलत आम आदमी अपने देश पर नाज करता था। इन मूल्यों में सबसे प्रभावशाली मूल्य लोकतांत्रिक व्यवस्था के थे, निजी स्वतंत्रता के थे, पारदर्शिता के थे, सामाजिक समानता के थे। राष्ट्रपति चुनाव अभियान में इन मूल्यों को झटका तो लगा ही था, पर शपथ हो जाने के बाद ये शायद जड़-मूल से ही समाप्त हो जाएंगे।  बहुत से लोग मानते हैं कि राष्ट्रपति कोई भी बने और उसका कुछ भी हो, अमेरिका अमेरिका ही रहेगा, क्योंकि वहां पर व्यवस्था ऐसी बनी हुई है, जो हर स्थिति को संभालने में सक्षम है। वे मानते हैं कि क्लिंटन या ट्रम्प की विचारधारा या क्रियाकलाप कुछ देर की सनसनी जरूर पैदा करेंगे, पर अंततोगत्वा अमेरिकी व्यवस्था फिर से संतुलन की स्थिति कायम कर देगी। ऐ

सा शायद हो भी सकता है, पर ऐसा विश्वास के साथ कहना असंभव है, क्योंकि अमेरिका के सामने कभी भी ऐसी आंतरिक परिस्थिति आई ही नहीं है। अमेरिका जब भी परेशान हुआ है, विदेशी मुद्दों को लेकर हुआ है। ये मुद्दे देश के सामाजिक ढांचे पर कभी भी असर नहीं डाल पाए हैं। पर इस बार मुद्दे विशुद्ध आंतरिक हैं, जो हर गांव और हर गली को दो फाड़ कर चुके हैं। ऐसे में सरकार और सिविल सोसाइटी किस तरीके से इनका निपटारा करती है, यह देखना बाकी है।

पर इन सब मुद्दों से ज्यादा गंभीर मुद्दा लोकतांत्रिक व्यवस्था के औचित्य से ही सीधे जुड़ा है। जो व्यवस्था क्लिंटन और ट्रम्प जैसे उम्मीदवारों को आगे बढ़ाती है, वह क्या देश के लिए हितकर है? क्या वह लोकतंत्र के वास्तविक मूल्यों को सुरक्षित रख सकती है या अब तक सुरक्षित रख पाई है? क्या अमेरिका में स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव हो रहे हैं या बीते समय में होते रहे हैं? क्या 2016 का चुनाव एक ढकोसला है, जिसकी हकीकत अब तक छिपी हुई थी, पर उम्मीदवारों के आचरण ने उस पर से पर्दा उठा दिया है?

अब यह साफ हो गया है कि अमेरिका की तथाकथित लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर निहित स्वार्थों का पूरी तरह से कब्जा है। ये स्वार्थ इतने ताकतवर हैं कि पलक झपकते गधे को घोड़ा और घोड़े को गधा बना सकते हैं। देश उनकी मन मर्जी से चलता है और आम आदमी वह रोबोट है, जिसके मताधिकार का बटन किसी बड़े खरबपति के हाथ में है। साथ ही राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार महज कठपुतलियां हैं, जो अपने आकाओं के इशारे पर इतराते हैं।  कहने का मतलब यह कि अमेरिका में लोकतंत्र का अंत हो गया है। इसी की कहीं न कहीं कुछ हलकों में छटपटाहट है। इसी का डर नागरिकों को अंदर ही अंदर सता रहा है। वास्तव में वोट पड़ने से ठीक पहले अमेरिका की वह स्थिति है, जो उस व्यक्ति की होती है, जिसके चेहरे के ठीक सामने काला नाग फन फैलाए खड़ा है और वह उस नाग से सम्मोहित भी है और भयभीत भी। वह कुछ नहीं कर सकता, बस डंसने का इंतजार कर सकता है। सच में अमेरिका का लोकतंत्र पिछले एक साल में इतना विषैला हो चुका है कि आखिरी वार की भी शायद जरूरत नहीं है।

अगर लोकतंत्र का चिरपरिचित प्रतीक अमेरिका ही लोकतंत्र का विफल प्रयोग हो गया है, तो इससे यह साबित होता है कि असरदार निहित स्वार्थ ही वास्तव में हमारे-आपके असली भाग्य विधाता हैं। इन्होंने चुनाव प्रक्रिया को ध्वस्त कर दिया है और खुद सम्राट हो गए हैं। इनके चंगुल से कौन-सी व्यवस्था बचा सकती है, खासकर अब जब कि वैश्विक प्रभावों के चलते प्रक्रियाएं और भी जटिल हो गई हैं, इस पर आंदोलनात्मक विचार अब जरूरी हो गया है। साम्राज्यवाद का विकल्प लोकतंत्र था। लोकतंत्र अब स्वार्थ सिद्धि का तंत्र हो चुका है। इसका विकल्प क्या है? आठ नवंबर से ही मंथन शुरू हो जाना चाहिए।

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First Published on November 6, 2016 4:29 am

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