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प्रसंगवश- जिया जरत रहत दिन रैन

अजीब बीमारी है। समूचा देश इस भयानक बीमारी की गिरफ्त में जकड़ गया है। शहर-शहर, गांव, गांव, कस्बा-कस्बा इस बीमारी से आक्रांत है।
Author November 12, 2017 05:42 am
इंडिया गेट पर कोहरे का नजारा। (फाइल फोटो)

उमेश प्रताप सिंह

जी जलता रहता है। दिन-रात जलता रहता है।’
‘क्यों? क्यों जलता रहता है?’
‘पता नहीं। मगर जलता रहता है।’
अजीब बीमारी है। समूचा देश इस भयानक बीमारी की गिरफ्त में जकड़ गया है। शहर-शहर, गांव, गांव, कस्बा-कस्बा इस बीमारी से आक्रांत है। यह बीमारी बाकी सारी बीमारियों को पीछे छोड़ कर अपने विस्तार में आगे निकल चुकी है। फिर भी इस बीमारी का सरकारी गजट में कहीं भी अता-पता नहीं है।
डॉक्टरों को इस बीमारी के निदान की जानकारी नहीं है। वैद्यों को इसकी दवा के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। उन्हें इस रोग का लक्षण, निदान और उपचार पढ़ाया ही नहीं गया है। मेडिकल की किताबों में यह रोग, रोगों की तालिका में है ही नहीं। दिलचस्प बात है कि यह रोग सारे डॉक्टरों को है। छोटे-बड़े सारे डॉक्टर इस रोग के रोगी हैं। यह रोग सारे राजपरिवारों में जड़ जमाए पड़ा है। राजकीय अधिकारियों और कर्मचारियों के खून में इस रोग के विषाणु लाल रक्त कणिकाओं से भी अधिक संख्या में मौजूद हो गए हैं। सारे कारोबारियों के दिमाग में इस रोग ने अपना स्थायी घर बना लिया है। यहां तक कि जिनके पास कुछ नहीं है, उनके पास भी यह रोग है। जिनके घर में चूल्हे नहीं जलते, उनका भी जी जलता रहता है। जिनके घर में सैकड़ों, हजारों चूल्हे जलते हैं, उनका भी जी जलता रहता है।

पता नहीं कैसी आग है कि जलती है, तो जलती रहती है। बरसात में भी। जाड़े में भी। गरमी में भी। मौसम का कोई असर ही नहीं! विचित्र है, मगर बिल्कुल नया नहीं है। जलना पहले भी रहा है। हमारी परंपरा का प्रिय शब्द रहा है। परिचित शब्द रहा है। पर वह जलना रहा है। जलन नहीं रहा है। जलना का मतलब ज्वलन से होता है। ज्वलित की अभा प्रज्ज्वलित की गरिमा में समाहित होने की योग्यता से परिपूर्ण है। भाषा का भी अद्भुत खेल है। कुछ समझ में नहीं आता। बहुत से तद्भव शब्द ऐसे होते हैं, जो तत्सम के विकसित रूप होते हैं। अपनी परंपरा की गरिमा के उन्नायक होते हैं। अर्थ विस्तार के समर्थ संवाहक होते हैं। ऐसे तद्भव बड़भागी होते हैं। मगर सब बड़भागी नहीं होते। बहुत-से हतभागी भी होते हैं। जलन हतभागी तद्भव है। अर्थ संकोच की संभावनाओं का अपने में समाहार करता हुआ। इतना हतभागी है कि उपसर्ग को ग्रहण करने के भी बिल्कुल अयोग्य है।  हमारे भक्तिकाल में जलना बड़ा महिमामय है। वहां जलना प्रकाश के लिए है। प्रेम के लिए, उत्थान, उत्कर्ष के लिए जलना है। अर्थ के लिए जलना है। सार्थक होने की अभीप्सा के लिए जलना है। कितना महत्त्वपूर्ण है जलना। जलन कितनी पवित्र हो उठती है, जब तुलसीदास के भरत कहते हैं- ‘भेंटे बिनु रघुनाथ को, जिय की जरनि न जाय।’

कुछ ऐसा ही जायसी का प्रसिद्ध दोहा है- ‘यह तन जारौं छार करि, कहउं कि पवन उड़ाउं। मकु तेहि मारग उड़ि परै, धरै कंत जहं पाउं।’ जायसी की नायिका अपने तन को जला कर राख कर देने की उत्कंठा से आपूरित है। इसलिए कि उसके शरीर की राख भी प्रिय के पांवों की परस पा ले तो धन्य हो उठे। प्रेम के लिए विसर्जन और समर्पण की यह उच्चतम भावदशा, अन्यतम है। भक्तिकाव्य में ऐसे भावबोध के कथनों की भरमार है। वहां, जरनि, दाह, दाझणा, सीझणा जैसे तमाम तद्भव शब्द अर्थ की गरिमा का शृंगार करते हुए अपनी ज्योति में जगमगाते खड़े हैं। पड़े हैं, अपना प्रकाश और अपनी सुगंधि लुटाते हुए।
मगर हमारे समय में जलना कुछ और ही तरह का हो गया है। हमारे समय में कोई प्रिय नहीं है, कुछ भी नहीं है। केवल प्यास है। हमारे समय में सब कुछ जल रहा है। सब कोई जल रहा है। सबके जी में जलन समाई हुई है। जो जहां है, वहीं जल रहा है। खड़े-खड़े जल रहा है। पड़े-पड़े जल रहा है।
‘काहे लिए भाई? ‘उजाले के लिए? प्रकाश के लिए? उत्कर्ष के लिए?’
‘नहीं, नहीं।’
‘फिर….?’

‘फिर क्या, बस ऐसे ही। शायद… अपने अर्थ को क्षरित होने देने के लिए। अपने व्यर्थता बोध से निजात पाने के लिए। अपनी क्षुद्रता से आंख न मिला पाने के लिए। अपनी असहिष्णुता से आंख फिराने के लिए। अपने अहं को दुलराने के लिए। अपनी श्रेष्ठता की झूठी शान को जुगाने के लिए।’ सबका जी जल रहा है। सबके जी में जलन समाई हुई है।
बहुत कुछ मुरझा रहा है। हरियाली झुलस रही है। फूल कुम्हला रहे हैं। पानी बिला रहा है। रंग उखड़ रहा है। गीत गुम हो रहे हैं। उल्लास उजड़ रहा है। आंखे अंधी हो रही हैं। जबान पथरा रही है। दिल डूब रहा है। मगर हम सब जल रहे हैं। हमारे जी में जलन समाई हुई है। सारा जमाना जल रहा है।
हमारे समय में जो सत्ता में हैं, उनके जी में जलन है कि इससे पहले वे सत्ता में क्यों नहीं थे। हाय, कितने दिन नागा चले गए। जो सत्ता में नहीं हैं, उनके जी में जलन है कि उन्हें ही सत्ता में होना चाहिए था। हम बेरोजगारी में भी जल रहे हैं। रोजगारी में भी जल रहे हैं।
हमारे समय में हर आदमी में इस बात की जलन है कि कुछ भी करके अच्छा कहलाने का हक उसे ही है। खुद के अलावा दूसरे किसी का भी अच्छा होना, उसे जलाता है। आदमी जो है, उसमें जी नहीं पा रहा है। जो नहीं है, उसके लिए जल रहा है, दिन-रात।

कुछ भी हो रहा है, जी की जलन नहीं जा रही है। मौसम बदल रहा है, जी की जलन कम नहीं हो रही है। सरकार बदल रही है, जी की जलन कम नहीं हो रही है। देश बदल रहा है, जी की जलन कम नहीं हो रही है। बहुत कुछ कम हो रहा है, जी की जलन कम नहीं हो रही है।
हम पेट फाड़-फाड़ कर बेईमानी का धन खा रहे हैं। हम दवा के रूप में घूस खा रहे हैं। भ्रष्टाचार खा रहे हैं। मगर जलन कम नहीं हो रही है। हम पाताल का पानी चूस-चूस कर पी रहे हैं, मगर जलन कम नहीं हो रही है। हमारी जलन से नदियां सूख रही हैं। आकाश जल रहा है। जंगल सिमट रहे हैं। पहाड़ धसक रहे हैं। धरती बंजर हो रही है। मगर जलन जस की तस है। सब तरफ धुंआ-धुंआ है। हुंआ-हुंआ है। हवा में प्रदूषण। पानी में प्रदूषण। वाणी में प्रदूषण। हमारा सामूहिक मन प्रदूषण से भर गया है।
दिन-रात आग जलती रहेगी तो क्या होगा? यही सब होगा। जी में जलन जल रही है!

 

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