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साहित्य : कविता की परख

सत्यपाल सहगल आग्नेय के संपादन में भोपाल से प्रकाशित विश्व कविता की पत्रिका ‘सदानीरा’ के ताजा अंक में हिमाचल प्रदेश के हिंदी कवि गणेश गनी का ‘कवि की चिट््ठी’ स्तंभ में एक पत्र छपा है। उसका शीर्षक है ‘रोष-पत्र’। हिंदी साहित्य के समर्थन या आक्रमण के मौजूदा दौर में, ‘रोष-पत्र’ शीर्षक ज्यादा मौजूं प्रतीत हो […]
Author May 24, 2015 12:02 pm

सत्यपाल सहगल

आग्नेय के संपादन में भोपाल से प्रकाशित विश्व कविता की पत्रिका ‘सदानीरा’ के ताजा अंक में हिमाचल प्रदेश के हिंदी कवि गणेश गनी का ‘कवि की चिट््ठी’ स्तंभ में एक पत्र छपा है। उसका शीर्षक है ‘रोष-पत्र’। हिंदी साहित्य के समर्थन या आक्रमण के मौजूदा दौर में, ‘रोष-पत्र’ शीर्षक ज्यादा मौजूं प्रतीत हो रहा है। बहरहाल, आधुनिक साहित्य के विकास में ‘रोष’ का अपना योगदान है। यों ‘रोष’ के व्यक्तिगत और सार्वजनीन कारण आपस में गड्डमड्ड होते रहते हैं। भावुक-मन और जटिल सामाजिक-साहित्यिक परिस्थितियों में जीने वाले लेखक अक्सर इनको अलग-अलग नहीं कर या देख पाते।

बहरहाल, एक सीमा में, संतोष की तुलना में ‘रोष’ ज्यादा कारगर साबित हो सकता है, क्योंकि वह हमें झिंझोड़ता और चुप रहने की संस्कृति के स्थान पर अभिव्यक्ति की संस्कृति की ओर ले जाता है। यों रोष, गाली-गलौज और व्यक्तिगत आक्षेप में अंतर साफ रहना चाहिए और कहना होगा कि इस तमीज की, हिंदी की वर्तमान साहित्यिक दुनिया को काफी जरूरत है।

पत्रिकाओं में छपे कुछ कवियों के काव्यांशों के हवाले से गणेश ने कुछ असुखद सवाल पूछे हैं: ‘‘कविता के कुछ तो नियम होंगे? अगर नहीं हैं तो फिर बिंब, रूपक, प्रतीक, शैली, ये सब किस-किस चिड़िया के नाम हैं। आए दिन ढेरों पत्रिकाओं में यही कुछ छप रहा है। एक जैसा। संपादक आंख मूंद कर छाप रहे हैं। उनकी हिम्मत ही नहीं होती होगी कि वे छापने से इनकार कर पाएं, क्योंकि नाम बड़े और स्थापित जो कर दिए गए हैं। अगर रचनाकार का मकसद केवल संदेश या प्रवचन देना है, तो फिर निबंध भी एक विधा है। कवि होने का मोह पालना क्या ठीक है? क्या ढेर सारी कविताएं लिख कर किताबें छापना जरूरी है? क्या आप कुछ सुंदर कविताएं लिखने के बाद आराम नहीं कर सकते? आपकी एक ही कालजयी रचना आपको अमर बना सकती है।…

बस अब बहुत हो गया। कविता के नाम पर ठगी करना बंद करें। संपादक भी साहस करके अपनी बात कह दें, जो वे पीठ पीछे बोलते हैं। या फिर कविता के नीचे यह भी लिखें कि किस आधार पर यह कविता है। पाठक का समय और पैसा बरबाद करने का आपको कोई अधिकार नहीं है।…

यह समय कठिन इसलिए नहीं है कि कविताओं का अकाल पड़ा है, बल्कि इसलिए है कि कविताओं की बाढ़-सी आई हुई है। गुणवत्ता और मौलिकता की बेहद कमी है। दो पत्रिकाएं पढ़ो और पांच कविताएं रच डालो, प्रेरित होकर। कल्पनाओं में गांव और गरीबी का ताना-बाना बुन कर मार्मिक कविता लिख कर पाठकों का दिल जीतने का प्रयास जारी है।’’

गणेश गनी के मत से कुछ सामान्य निष्कर्ष निकलते हैं। एक, कविता के कुछ आधारभूत, अनिवार्य कायदे होते हैं। इनमें बिंब, रूपक, प्रतीक, शैली को शामिल किया जा सकता है। समकालीन कविता का बड़ा हिस्सा इसकी अवहेलना कर रहा है। दो, संपादकों में साहस नहीं है कि वे बड़े और स्थापित ‘कर’ दिए गए नामों की काव्यत्व-विहीन कविताओं को न छापें, हालांकि निजी रूप से वे इधर की कविता के आलोचक हैं। तीन, कविता के माध्यम से केवल संदेश या प्रवचन देने वाले कवियों को कविता के स्थान पर निबंध लिखने चाहिए। चार, ढेरों कविताएं लिखना वांछित नहीं है; अच्छी कविताएं लिख कर कुछ विराम और विश्राम की भी जरूरत है। संख्या नहीं, गुणवत्ता कवि को अमर बनाएगी। पांच, कविता के नाम पर कविता नहीं परोसी जा रही है। पाठक आज की कविता से निराश है। छह, अति काव्य-रचना हो रही है। इसमें गुण के साथ मौलिकता का भी अभाव है। कविता अनुभवजन्य न होकर, अनुमानजन्य है।

हमारे समय की कविता पर गणेश गनी के आक्षेप नए नहीं हैं। पहले भी ऐसी टिप्पणियां सुनने को मिलती रही हैं। नया है, उनके द्वारा इन्हें अब उठाया जाना। उनकी कुछेक बातें सैद्धांतिक हैं। मसलन, कविता की मूलभूत प्रतिज्ञाएं, कविता के माध्यम से संदेश या प्रवचन और काव्य-रचना में संख्या, गुणवत्ता या मौलिकता का मामला। इन विषयों पर बहसें होती रही हैं। नई कविता, वाम-कविता और आपातकाल-उत्तर कविता के दौर में। दुनिया भर में आधुनिक कवि पर्याप्त प्रयोगशील रहे हैं। सफल काव्य-रचना में कवि काव्य-कला के कई नए सिक्के चला लेते हैं; हालांकि उनका प्रेक्षक-वर्ग खास हो सकता है। दरअसल, मामला व्यावहारिक स्तर पर निराशा और असंतोष का अधिक लगता है। क्या आज छपने वाली अधिकतर कविता विफल और झूठी है? यही बहसतलब है।

संपादनकर्म को लेकर की गई टिप्पणी पर चर्चा की जा सकती है। पर संपादकों की समस्याओं को भी समझना पड़ेगा। साहित्यिक पत्रिकाएं निकालना बड़ी सिरदर्दी है। कोई भी संपादक अच्छी रचनाएं छापना चाहेगा। अगर उसके पास अच्छी रचनाएं नहीं होंगी, तो वह कम अच्छी या बुरी से काम चलाएगा। आखिरकार गणेश शायद यही कहना चाहेंगे कि अच्छी कविताएं नहीं लिखी जा रहीं। इस पर गंभीर विमर्श होना चाहिए। मौजूदा कविता के बढ़िया होने या न होने पर कोई खास वैचारिक-रस्साकशी नहीं हो रही है। होने की संभावना भी नजर नहीं आ रही।

ऐसा क्यों है? क्या हममें बौद्धिक उत्तेजना की कमी या काहिलपन है? क्या इसके लिए परिस्थितियां प्रोत्साहनकारी हैं? क्या हिंदी-जगत अच्छे और बुरे का भेद करना नहीं जानता- हमारी अयोग्यता? क्या यह कोई भ्रष्ट क्षेत्र है? क्या इसके पीछे कोई गहरे समाजशास्त्रीय-सांस्कृतिक-ऐतिहासिक कारण हैं? क्या सचमुच कुछ हो रहा है और हम उसे देख नहीं पा रहे हैं? कई बार अच्छी सामग्री प्रकाशित हुई है; पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं बनता है! क्या हिंदी का अधिकतर चिंतन काफी अमूर्त किस्म का है और सदा लक्ष्य-च्युत रहता है? मात्र लफ्फाजी? हकीकत खोजने और बयान करने में असमर्थ? भावनाओं की कोख से निकले प्रलाप? अपनी ही कुंठाओं का सैद्धांतीकरण? क्या यह कोई विश्वजनीन समस्या है? इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में तलस्पर्शी चिंतन की कमी!

मौलिकता, मौलिकता! यह क्या बला है? कब से तरसे हैं हम इसके लिए! क्या हम मौलिकता का सामना करने को तैयार हैं? कौन है मौलिक और किस आधार पर? क्या मौलिकता पैदा करने के लिए जरूरी खुलापन और छूट, कभी काफी सरल और कभी अति-यथार्थवादी हिंदी-जगत में है? क्या इस सारे माहौल को समझें या यह इतना बरबाद है कि इसमें बारूद लगा दें?

न केवल ठीकठाक संख्या में काव्य-संकलन छपते रहते हैं, बल्कि कविता छापने के मामले में पत्र-पत्रिकाएं भी पीछे नहीं हैं। इंटरनेट के आगमन ने इस काम को कई गुना बढ़ा दिया है। हिंदी जगत से इसने कई नए कवि और कवयित्रियां जोड़ी हैं। कई बार प्रतिभा का विस्फोट जैसा भी लगता है। एक अनूठी ताजगी का अहसास! काफी कुछ मूल्यवान भी है यहां। पर यह कहना होगा कि कविता-परिदृश्य के बड़े हिस्से में कई समस्याएं भी हैं। बहुत बार ‘खुली कविता’ की विश्वसनीयता और वैधता ही संदेहास्पद लगती है। मालूम पड़ता है, काव्य-रचना को आसान काम मान लिया गया है। बड़ी दिक्कत शब्द-स्फीति की है। शब्द-साधना, वाक्य-साधना की अनुपस्थिति भी सामने आती है। रचनाकार और पाठक के बीच पुल तलाशने की कोशिश का पता नहीं मिलता। कवियों के काव्य-सिद्धांतों या काव्य-दर्शन का साफ-साफ ज्ञान प्राप्त नहीं होता। बहुतेरे कवियों का अध्ययन भी कमजोर नजर आता है।

कविता लिखने में तो हमारी दिलचस्पी है, मगर उस पर सोचने-विचारने में नहीं! प्रभावी काव्य-आलोचना से भी हम लगभग वंचित हैं। इस इलाके में किसी ‘प्रतिभा-विस्फोट’ का अनुभव नहीं होता। कविता का अध्यापन या उसकी आलोचना करने वाले समूचे परिवेश को समझने और उसे चमकदार ढंग से परिभाषित करने की महत्त्वाकांक्षा से रहित दिखते हैं। जो भी प्रयास हुए हैं, वे टुकड़ों में बंटे हुए हैं और एक बड़ी या मुकम्मल तस्वीर नहीं बनाते। युगीन कविता के ऊंचे व्याख्याकार, प्रस्तोता और वकील हमारे पास लगभग नही हैं। प्रतिनिधि काव्य-आलोचना की एक पूरी पीढ़ी गायब है।

क्या हमने काव्य-आलोचना के भविष्य का कोई प्रारूप बनाया है? या फिर हिंदी-जगत, ‘वरिष्ठ और नामी-गिरामी’ आलोचकों पर मनोवैज्ञानिक रूप से इतना ज्यादा निर्भर है कि नए स्वर निरुत्साहित हैं या ठीक से पहचाने नहीं जा रहे? कहां हैं आलोचना के नए नायक? और अगर वे नहीं हैं, तो इसका कारण कहीं हिंदी की बौद्धिक-अकादमिक संस्कृति का गड़बड़झाला तो नहीं? गहरी, न्यायकारी और मर्मस्पर्शी आलोचना या आत्मालोचना के अभाव में, हिंदी कविता का विस्तृत हिस्सा निरंकुश हो गया प्रतीत होता है।

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