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पुस्तकायन : सर्जक और सृजन के बीच

सुपरिचित रचनाकार राजी सेठ की किताब जहां से उजास समानधर्मा अग्रजों और समकालीनों पर लिखे लेखों का संकलन है।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 03:58 am
जहां से उजास

सुपरिचित रचनाकार राजी सेठ की किताब जहां से उजास समानधर्मा अग्रजों और समकालीनों पर लिखे लेखों का संकलन है। इन रचनाकारों से अपनी व्यक्तिगत और बौद्धिक निकटता के कारण उन्होंने इन्हें ‘मेरी प्रेरणाएं’ कहा है। विभिन्न लेखकों पर लिखते हुए राजी खुद भी इन लेखों में मौजूद रही हैं- कभी यात्रा पथ के साथियों के व्यक्तित्व का खाका खींचते हुए, कभी स्थिति विशेष या घटना विशेष का शब्द-चित्र उकेरते हुए, कभी आलोचकीय टिप्पणियां देते हुए, कभी लेखक विशेष के प्रति हिंदी जगत की उपेक्षा पर सवाल उठाते हुए, तो कभी समानधर्मा के अवसान की क्षति से आहत-उद्वेलित।

साहित्य संसार में रचनाकार विशेष की उपस्थिति को उद्घाटित करने की प्रक्रिया में राजी की दर्शन की पृष्ठभूमि पथ-प्रदर्शक का काम करती है। इसलिए कार्य-कारण संबंधों को खोजना और तटस्थ होकर वस्तुपरक ढंग से सूक्ष्म-नैतिक पर्यवेक्षण उनके लेखन की विशेषता है। व्यक्ति, समाज और सृजनकर्म के अंतस्संबंधों को खंगालती हुई राजी रचनाकार के सामाजिक सरोकारों के प्रति उदासीन नहीं रही हैं। व्यक्तिगत पीड़ाओं को अपने ही भीतर झेलते, जज्ब करते हुए लेखकीय निर्वैयक्तिकता को कायम रखने की पक्षधर रही हैं। देश-विभाजन, विस्थापन का दंश झेलने वालों में से एक रहीं राजी उस मर्मांतक पीड़ा को ओट में रखने वाले लेखकों के साथ हैं, हालांकि उसकी टीस जब-तब उभर जाती है।

अपने गुरु डॉ देवराज पर लिखे दो लेखों में राजी मानती हैं कि देवराज द्वारा प्रतिपादित ‘सृजनात्मक मानववाद’ उन्हें हमारे युग का सबसे प्रखर बुद्धिवादी सिद्ध करता है। राजी को इस बात से गहरी पीड़ा है कि उनके गुरु के लगभग आधी सदी के सृजन और साहित्यिक-आलोचनात्मक चिंतन-मनन पर गंभीरता और खुलेपन से विचार नहीं किया गया।

अज्ञेय को वह अपना ‘गुरु-सम’ कहती हैं। इस पुस्तक में अज्ञेय पर तीन लेख हैं- स्मृतिलेख-‘अज्ञेय: कितने ठौर ठिकाने’, कविता पर केंद्रित लेख ‘अज्ञेय: स्वाधीनता का अर्थ’ और अज्ञेय जन्मशती पर प्रस्तुत व्याख्यान ‘अज्ञेय: कृतित्व में ‘अन्य’ की उपस्थिति’। स्मृतिलेख अज्ञेय के रचनाकार व्यक्तित्व के स्नेही अग्रज रूप को उजागर करने के साथ-साथ राजी के सर्जनात्मक संस्कारों को मिले ठोस आधारों को बड़े जीवंत और आत्मीय ढंग से उद्घाटित करता है। शेष दो लेख अज्ञेय-विरोधियों, उन्हें व्यक्तिवादी-पूंजीवादी कहने वालों को प्रत्युत्तर देते हुए अज्ञेय साहित्य में ‘अन्य’ के लिए स्पेस को, स्वाधीनता के लिए सम्मान को मम और ममेतर के ब्याज से स्थापित करते हैं।

‘जैनेंद्र: कितने आधुनिक’ में राजी स्वचेतनता और नैतिकता के मूल तत्त्व तक पहुंचने की चाह को जैनेंद्र के अवदान की मौलिकता की आधारभूमि मानती हैं। उनके साहसी, विचारशील, स्वयंचेता स्त्री पात्रों को मनोविज्ञान और स्त्रीवादी चिंतन के परिप्रेक्ष्य से जोड़ती हैं। पीड़ा, घर की आकांक्षा, आत्म-शक्ति और आत्म-संघर्ष के ताप से तपी इन स्त्रियों को स्त्री विमर्श के पाले में रखते हुए वे इन पर विचलन और विवेचन की गुंजाइश पर जोर देती हैं। ‘फिराक और निराला: दो शती पुरुष आमने-सामने’ भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में आयोजित जन्मशती संगोष्ठी में प्रस्तुत व्याख्यान हैं। ‘नरेश मेहता: चुनाव और चुनौती’ में जो बात राजी को खासतौर पर उल्लेखनीय लगती है वह है उनकी शांत, शालीन, सौम्य मुद्रा, जिसमें एक रचनाकार में अनिवार्य रूप से दिखती अशमित बेचैनी गायब है। नरेश मेहता को पढ़ने के बाद वे महसूस करती हैं कि बेचैनी रचनाकर्म का आवश्यक सहकार नहीं है। ‘प्रभाकर श्रोत्रिय: एक असमीक्षित समीक्षक’ में श्रोत्रियजी के संपादक व्यक्तित्व की बेजोड़ कुशलता की चर्चा करते हुए आलोचक के रूप में उनके योगदान पर समुचित ढंग से चर्चा न हो पाने की सहित्य जगत की विडंबना को उजागर किया गया है।

‘इंतजार में मन्नू भंडारी’ इस संग्रह के श्रेष्ठतम स्मरण-लेखों में से एक है। इसमें रचना पथ की सहयात्री के निजी और सर्जनात्मक व्यक्तित्व को एक नितांत आत्मीय मित्र की सह-अनुभूति और आस्था के साथ उकेरा गया है। कथाकार के रूप में मन्नू की ख्याति, शीर्षस्थ कथाकारों के बीच प्रतिष्ठा का स्मरण कराते हुए रचना के उपादानों के उनके द्वारा उपयोग की प्रक्रिया और महत्त्व को उद्घाटित किया गया है। ‘गोविंद मिश्र: एक खिड़की यह भी’ में लेखक सहकर्मी और पारिवारिक मित्र गोविंद मिश्र के आत्मपक्ष की तस्वीर अंकित की गई है। व्यक्ति और रचना के बीच बनते सेतु को तलाशते हुए राजी को मिश्रजी के ‘रचना-कर्म में अनुभव से सट कर लिखने और बहते रहने की जिद’ दिखाई दी।

उत्तर-आधुनिक सैद्धांतिकी के विश्लेषक-चिंतक कथाकार देवेंद्र इस्सर को राजी ‘एक निर्वासित विराट’ कहती हैं। वे पाती हैं कि इस्सर प्रत्यक्ष और यथार्थ को ज्यों का त्यों प्रस्तुति के विरुद्ध हैं, क्योंकि वे मानते हैं की स्वप्न और स्मृति के बीच जो स्पेस रह जाता है, सृजन का सच उसमें जन्म लेता है और इस प्रकार वर्तमान को अतीत और अतीत को भविष्य से जोड़ता है।

शैलेश मटियानी पर दो लेखों में समानधर्मा के जीवन-संघर्षों के बीच अदम्य सर्जनात्मक संकल्प की आस्था के अनेक बिंदुओं को उद्घाटित किया गया है। ‘महीप सिंह: समय में हस्तक्षेप की चेतना’ में लेखिका संपादक और रचनाकार के रूप में महीप सिंह के सांस्कृतिक, राजनीतिक, सर्जनात्मक योगदान का अंकन करते हुए कथा-साहित्य में रोजमर्रा के जीवन के यथार्थ से निकले ताप की ओर संकेत करती हैं। ‘शिवप्रसाद सिंह: तेजोदीप्त अभिमानी’ स्मृतिलेख इस संकलन का सर्वाधिक जीवंत और सटीक शब्द-चित्र है। उनके बारे में राजी का आकलन कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से वास्तविक प्रतीत होता है।

अंतिम लेख ‘निगम बोध घाट पर’ समशील सहोदरा मंजुल भगत के अंतिम संस्कार के लिए प्रतीक्षा की पृष्ठभूमि में लिखा गया है। स्वाभाविक ही है कि इसमें राग-विराग-अवसाद की तीव्रता और सघनता है। साहित्य जगत और पत्रकारिता की तटस्थता, उपेक्षा को लेकर टिप्पणी है, वहीं मीडिया की तुरंता कार्यशैली को लेकर शिकायत भरी झुंझलाहट, आत्मीय खो देने के अवसाद भरे क्षण में व्यक्ति को खबर बना देने की मीडिया की हड़बड़ी भरी संवेदनशून्यता को लेकर बेचैनी है।
समानधर्माओं पर लिखे इन निबंधों में रचना और रचनाकार के अंतर्बाह्य के समागम के सूत्रों को पिरोते हुए राजी ने एक खास तरह की सर्जनात्मक ऊर्जा पाई है, जो उनके गद्य को संवेदना की स्निग्धता, भाव की ऊष्मा, विचार की सघनता और विश्लेषण-विवेचन की तार्किकता से संपन्न बनाती है।

रीतारानी पालीवाल
जहां से उजास: राजी सेठ; वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।

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