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बारादरी- वैश्विक ज्ञान का परिसर बनें विश्वविद्यालय

सत्ता परिवर्तन की हवा का सबसे ज्यादा असर विश्वविद्यालय परिसरों पर होता है। विश्वविद्यालयों में ज्ञान-अनुसंधान, नियुक्तियां, छात्र संगठन हो या गोष्ठी, इन सबका एक सत्ता-सापेक्ष संबंध होता है। नवउदारवादी दौर में विश्वविद्यालय परिसरों में शिक्षण-प्रशिक्षण का भी ढर्रा बदला है। शोध और अनुसंधान के बरक्स शैक्षणिक संस्थानोें का महत्त्व इस बात से तय होने लगा है कि वहां से निकले कितने युवाओं को कैसी नौकरी मिली। इसके अलावा जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे संस्थान अल्पसंख्यक पहचान की चुनौती भी झेलते हैं। पिछले दिनों संघ से जुड़े एक संगठन ने तीन तलाक जैसे मुद्दे को लेकर वहां तनाव पैदा करने की कोशिश की। इस बार की बारादरी इन्हीं मुद्दों पर। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।
Author March 19, 2017 04:43 am
बारादरी की बैठक में तलत अहमद (फोटोे: आरुष चोपड़ा)

मुकेश भारद्वाज: आजकल विश्वविद्यालयों में प्लेसमेंट की बहुत बात होती है। जामिया में प्लेसमेंट की क्या स्थिति है?
तलत अहमद: जामिया में काफी अच्छी स्थिति है। वहां एक अलग विभाग है, जो यह काम देखता है। इस साल उनहत्तर कंपनियां हमारे यहां आर्इं और अकेले टीसीएस (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) ने एक सौ छत्तीस बच्चों को लिया। इस तरह हर कंपनी में कुछ न कुछ बच्चे जा रहे हैं। आइटी और मैनेजमेंट वाले करीब सत्तर लाख बच्चे हमारे यहां से जापान गए हैं। हमारी कोशिश है कि इसे और बढ़ाया जाए।

मनोज मिश्र: दिल्ली में वैसे तो कई विश्वविद्यालय हैं, पर तीन प्रमुख हैं। उनमें दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू की प्रतिष्ठा ज्यादा है, जामिया का उस तरह नाम क्यों नहीं हो पाया?
तलत अहमद: मैं आपकी बात से सहमत हूं। जिस पोजीशन के लिए जामिया डिजर्ब करती थी, वह उसे नहीं मिली। इसकी दो-तीन वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह है कि जामिया अभी तक अपनी सारी इन्फार्मेशन को इकट्ठा नहीं कर पाई थी। अभी मैंने शुरू कराया है कि सारी सूचनाएं वेब पर डाली जाएं। इतनी पुरानी यूनिवर्सिटी है, पर आज तक लोग इसका नैक का एक्रीडिएशन नहीं ले पाए थे। मैंने अब शुरू कराया है। मुझे पूरी उम्मीद है कि दो-तीन सालों में इसका असर नजर आने लगेगा। अब जामिया कंपटीशन में आ गई है।
जहां तक जेएनयू की बात है, वह रिसर्च बेस्ड यूनिवर्सिटी है। हमारे यहां ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पर जोर दिया जाता रहा है। रिसर्च पर उतना जोर नहीं था। अब हमने उस तरफ ध्यान दिया है। किसी भी अच्छी यूनिवर्सिटी के लिए जरूरी है कि अच्छी से अच्छी रिसर्च करें और अच्छी से अच्छी जगह उसे छपवाएं। अच्छी से अच्छी किताबें लिखें, जिसे भारत ही नहीं बाहर के लोग भी पढ़ें। यूनिवर्सिटी का महत्त्व इस बात से भी तय होता है कि वहां अधिक से अधिक बच्चे दाखिले के लिए आएं। इस लिहाज से जामिया में कंपटीशन बढ़ा है।

सूर्यनाथ सिंह: शोध के नाम पर अब नकल ज्यादा होने लगी है। आपने इस पर नजर रखने के लिए क्या उपाय किए हैं?
तलत अहमद: पहले जामिया में शोध से संबंधित सभी गतिविधियां रजिस्ट्रार आॅफिस के जरिए संचालित होती थीं। मैंने दो पद शुरू किए- डीन रिसर्च और डीन एकेडेमिक। डीन रिसर्च का काम है कि जामिया के जितने भी विभाग हैं, उनसे तालमेल बना कर उन्हें बताएं। रिसर्च के लिए आपको पैसे चाहिए, उसके लिए आपको प्रोजेक्ट्स लाने होंगे। अभी तक लोग इसके लिए कोशिश नहीं करते थे। मैंने लोगों पर दबाव डाला है कि आप अकेले नहीं तो दो-तीन साथी मिल कर प्रोजेक्ट लाइए। अब हमारी स्थिति काफी बेहतर हुई है। हिंदुस्तान में दूसरे देशों की तुलना में रिसर्च के लिए पैसे बहुत उपलब्ध हैं, लेकिन उसे लेने वाले बहुत कम हैं। अब मैं उसका लाभ ले रहा हूं। एक चीज होती है एच इंडेक्स। उसमें सारी सूचनाएं डाली जाती हैं। उसे मैंने शुरू कराया है। उससे पता चलता है कि कितनी रिसर्च हुई हैं, कितनी किताबें लिखी गई हैं। आप जानकर हैरान होंगे कि इस मामले में जामिया सबसे ऊपर है।

प्रियरंजन: लंबी अवधि की आपकी क्या योजना है?
तलत अहमद: जब मैंने ज्वाइन किया, तो यहां कोई योजना नहीं थी। हमने एक समिति बनाई, जिसमें बाहर के लोगों को भी शामिल किया गया। उनसे हमने कहा कि आप पांच-दस-पंद्रह साल आगे की योजना बनाइए। देखिए कि अभी जामिया कहां है और उसे कहां पहुंचना चाहिए। तो, इस तरह लंबे समय के लिए एक दृष्टिकोण बनाने की शुरुआत हुई। अब हम उस समिति के सुझावों पर अमल करेंगे।

अनिल बंसल: विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विस्तार के लिए आपने क्या सोचा है?
तलत अहमद: धीरे-धीरे कर रहे हैं। अभी हमने ज्योग्राफी डिपार्टमेंट में आपदा प्रबंधन का पाठ्यक्रम शुरू किया है। केदारनाथ त्रासदी के समय मैंने विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को जोड़ कर वहां मदद पहुंचाई थी। उसी अनुभव के आधार पर हमने सोचा कि यह कोर्स शुरू करना चाहिए। जलवायु परिवर्तन की वजह से इन दिनों काफी स्थिति खराब हो रही है। ऐसे में केदारनाथ जैसी त्रासदी से बचाव के लिए, लोगों में जागरूकता लाने और उसकी तैयारी के लिए यह कोर्स हमने शुरू किया। इसमें सिर्फ ज्योग्राफी के नहीं, सोशल साइंस, साइंस, इंजीनियरिंग, लैंग्वेजेज सभी के बच्चे शामिल होते हैं। ऐसी आपदा के बारे में जागरूकता पैदा हो, उससे बचाव की तैयारी शुरू हो, तो काफी राहत की बात होगी। अभी इसे एक अलग विभाग बनाने के लिए मैंने अर्जी दी हुई है। इसके विस्तार के लिए मैं सोच रहा हूं।

मृणाल वल्लरी: आजकल विश्वविद्यालय परिसर अपनी अकादमिक गतिविधियों के बजाय राजनीतिक गतिविधियों की वजह से ज्यादा चर्चा में आ रहे हैं। जामिया भी इससे अछूता नहीं है। शाजिया इल्मी की वजह से जामिया में भी तनाव देखा गया। इस तरह के तनाव से बचने के लिए आपने क्या उपाय किए हैं?
तलत अहमद: पहले तो मैं शाजिया इल्मी के मामले को स्पष्ट कर दूं, कि इन लोगों का एक संगठन है फैन्स करके, उन्होंने हमसे संपर्क किया कि मुसलिम वुमन इंपावरमेंट पर एक सेमिनार करना है, उसके लिए आप हमें एक हॉल दे दीजिए। हम लोग ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं, तो हमने कहा कि ठीक है। इस तरह से यूनिवर्सिटी को कुछ पैसे भी मिल जाते हैं। हमने उन्हें सोलह फरवरी को कार्यक्रम करने का समय दिया था। पंद्रह तारीख को ये लोग आए। तब तक हमने सोचा कि शायद ये लोग इच्छुक नहीं हैं, क्योंकि जिसे कार्यक्रम करना होता है, वह आता है, पैसे जमा करके हॉल बुक करा लेता है। ये लोग आए नहीं तो हमने सोचा कि इन्हें कार्यक्रम नहीं करना है। इसलिए जब ये लोग पंद्रह तारीख को आए तो हमने कहा कि भाई, इतने दिन तक नहीं आए तो हमने किसी और को हॉल बुक कर दिया। फिर उन्होंने कहा कि हम विषय बदल कर तीन तलाक पर सेमिनार करेंगे। हमने कहा कि यह तो नहीं संभव है। शुरू में जो आपने कहा था, उसके लिए हम तैयार हो गए थे। अब आप उसे बदल नहीं सकते, क्योंकि हम देख रहे हैं कि सारे विश्वविद्यालयों में किसी जटिल समस्या को लेकर वाद-विवाद कराते हैं और हंगामे होते हैं। हमने कहा कि इसके लिए जामिया जगह नहीं है। आपको करना है, तो कहीं और कर लीजिए। यह संभव नहीं है। आपकी जो पहले मांग थी, उस पर कीजिए और उसकी अगली जो तारीख होगी, उस पर मैं हॉल दे देता हूं। तो, अट्ठाईस तारीख को हमने उन्हें समय दे दिया। मगर तीन तलाक को लेकर न तो हमारी उनसे बात हुई, और न सेमिनार हुआ। अगर हमारी उनसे इस पर सेमिनार करने की बात हुई होती तब शाजिया इल्मी दोष दे सकती थीं।

पारुल शर्मा: विश्वविद्यालय परिसरों में विचारधारा का टकराव बढ़ रहा है, वैचारिक संकीर्णता से निपटने के लिए आपके पास क्या तैयारी है?
तलत अहमद: सही बात तो यह है कि फैन्स वाले या आरएसएस वाले मेरे पास सीधे कभी नहीं आए। हमारे स्कूल आर्गनाइजेशन के सेक्रेटरी हैं- मिस्टर हारिश- वे आए कि साहब, हम लोगों को करना है। हमने कहा कि ठीक है, कीजिए। बाद में जब ये लोग आए कि हमने बुक कराया था, तो हमें हैरानी हुई कि फैन्स कहां से बीच में आ गए। फिर मैंने पता किया तो मिस्टर हारिश ने कहा कि उन लोगों के लिए मैंने ही बुक कराया था। लेकिन आप उनके लिए बुकिंग कराइएगा, तो जो टॉपिक उन्हें देंगे, उसी पर तो कराइएगा। आप रातोंरात विषय नहीं बदल सकते।

मृणाल वल्लरी: संघ के एक संगठन ने वह कार्यक्रम तय किया था। क्या जामिया संघ का कोई दबाव महसूस कर रहा है?
तलत अहमद: जामिया हिंदुस्तान के बाहर तो है नहीं। जो चीज सारे हिंदुस्तान में होगी, वह वहां भी होगी। हमने इसका एक तरीका निकाला कि डिस्कशन भी हो जाए, लोग अपनी बात भी रखें और कोई तनाव या टकराव भी न हो। लेकिन उन चीजों पर हो, जिस पर कोई बेवजह टकराव न हो। अगर आपको तीन तलाक पर डिस्कशन करना है तो जाइए कहीं और जाकर कीजिए, प्रेस क्लब में कीजिए, कौन मना करता है। आप ऐसा क्यों कह रहे हैं कि हम खासतौर पर जामिया में ही करेंगे या अलीगढ़ में ही करेंगे। इसीलिए न कि ऐसा कुछ हो, जिससे विवाद पैदा हो। देखिए, आरएसएस के कई लोगों से मेरी जान-पहचान है। उनसे मेरी बातचीत होती है, और मैं जानता हूं कि आरएसएस में कई लोग बहुत अच्छे हैं। उनके विचार बड़े अच्छे हैं। मगर छुटभैया नेता ज्यादा विवाद पैदा करने की कोशिश में रहते हैं। वही सबसे ज्यादा हल्ला करते हैं। जो बड़े लोग हैं, वे समझते भी हैं कि क्या समस्याएं हो सकती हैं। तो, वे दबाव नहीं डालते कि आपको यह करना ही पड़ेगा।

दीपक रस्तोगी: क्या आपको लगता है कि अभिव्यक्ति आजादी का किसी न किसी स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है, चाहे वह यूनिवर्सिटी परिसर के अंदर हो या उसके बाहर?
तलत अहमद: अगर आप अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग करना चाहते हैं, तो करते हैं। अभी जो शाजिया इल्मी ने किया, वह मेरी नजर में सबसे गलत बात है। जो सच नहीं है, उसके बारे में पूरे मीडिया को बुला कर कह दिया जाए कि साहब, मुझे नहीं बोलने दिया गया। वह भी अगर आपको कहना था, तो उसी दिन प्रेस को बुला कर कहना चाहिए था। सोलह को नहीं कहा, तो सत्रह को कहते। मगर वे चुप रहीं और जिस दिन रामजस का हंगामा हुआ, उसके अगले दिन आ गर्इं सामने कि मुझे तीन तलाक पर नहीं बोलने दिया गया।

अनिल बंसल: एक कुलपति के नाते आपका सरकार के साथ कैसा अनुभव रहा है?
तलत अहमद: बहुत अच्छा अनुभव रहा है। मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि कश्मीर यूनिवर्सिटी में मैं पहला आदमी था, जिसे दूसरा कार्यकाल बिना मांगे मिला। वहां राज्यपाल थे एनएन वोहरा साहब, वे बड़े ही सहयोगी थे। बहुत अनुभवी आदमी थे। उस समय के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला साहब भी बड़े मददगार थे। उन्होंने साफ कह दिया था कि आप यूनिवर्सिटी को जैसे चलाना चाहते हैं चलाइए, इसे बेहतर बनाइए। कोई भी मंत्री कुछ कहता है तो आप उनकी बात मत मानिए, आप अपना काम कीजिए। और सचमुच मैं जब तक था यूनिवर्सिटी को लाइम लाइट में ला दिया था। यहां आने के बाद भी मुझे कोई दिक्कत नहीं आई आज तक। किसी तरह की दखलंदाजी का सामना नहीं करना पड़ा।

मनोज मिश्र: कुछ साल पहले बाटला हाउस कांड हुआ तो उसकी आंच जामिया पर भी आई। इस तरह की घटना दुबारा न होने पाए, उससे बचने के लिए आपने क्या उपाय किया है?
तलत अहमद: उस लिहाज से मैं खुद भी बहुत प्रैक्टिकल आदमी हूं। मैंने अपने साथ सिर्फ यूनिवर्सिटी के बजाय बाहर के लोगों को भी रखा। मैंने एक रजिस्ट्रार नियुक्त किया है, जो आइपीएस आॅफीसर रहे हैं। वे रजिस्ट्रार के साथ-साथ यह भी देखेंगे कि कैंपस में क्या हो रहा है। उसी तरह हमारे फाइनेंस आॅफीसर बाहर से आए हैं। समस्या तब आती है जब यूनीवर्सिटी के लोग एक गुट बना लेते हैं। आप नियम-कायदों का पूरी तरह पालन कीजिए, जिसका जो हक है दीजिए, तो समस्या शायद नहीं आएगी। मैं खुद सारे हॉस्टल में जाता हूं, बच्चों को समझाता हूं, और देखिए कि जबसे मैं आया हूं, कोई इस तरह की घटना नहीं हुई है। यहां तक कि पूर्वोत्तर के बच्चे-बच्चियों को किसी तरह की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। छेड़खानी वगैरह कुछ नहीं है। बहुत शांत है। कोशिश यही रहती है कि कोई अप्रिय घटना न घटने पाए।

मृणाल वल्लरी: विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप से बचने के लिए क्या होना चाहिए।
तलत अहमद: यूजीसी ने अभी जो नियम बनाए हैं, अगर उनका सही तरीके से पालन हो तो वह बहुत अच्छा है। वाइसचांसलर के लिए नियम तय होना चाहिए कि वह शिक्षा के क्षेत्र का ही व्यक्ति हो। कई आइएस, आइपीएस, फौज के लोग वाइसचांसलर बन जाते हैं। वह ठीक नहीं है। अध्यापक कुलपति बनेगा तो उसे पता होगा है कि बच्चे क्या सोचते हैं, क्या चाहते हैं, यूनिवर्सिटी का माहौल कैसा होना चाहिए। जैसे आज मुझे सेनाध्यक्ष बना दिया जाए, तो मैं पूरी तरह विफल साबित होऊंगा। उसी तरह दूसरे क्षेत्र के व्यक्ति को कुलपति बनाएंगे, तो उसके सामने मुश्किलें तो आएंगी। पहले होता यह था कि शिक्षा क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोग पांच-सात नाम छांट कर देते थे और उसी में से एक का चुनाव कर लिया जाता था। अब एक पद के लिए चार-पांच सौ आवेदन आते हैं। मैं समझता हूं कि जैसे पहले नियुक्तियां होती थीं, वैसे ही होनी चाहिए।

मनोज मिश्र: वहां छात्रसंघ का चुनाव कराने के बारे में आपने क्या सोचा है?
तलत अहमद: हमसे बहुत पहले से वहां समस्याएं थीं, तब चाकूबाजी जैसी घटनाएं भी हुई थीं। तब वाइसचांसलर साहब ने यूनियन का चुनाव रोक दिया था। फिर अदालत ने रोक लगा दी कि जब तक वहां सब कुछ ठीक नहीं होता, चुनाव नहीं होंगे। हम इस साल से स्टूडेंट्स की काउंसिल बना रहे हैं। जो क्लास रिप्रजेंटेटिव चुने जाते हैं, उन्हीं में से मैं कहता हूं कि आप अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, संयुक्त सचिव चुन लीजिए। वह सीधा चुनाव नहीं है, क्योंकि अदालत ने रोक लगाई है। लेकिन उसने कहा है कि आप एक रास्ता निकालिए। इस तरह मैंने यह रास्ता निकाला है कि अदालत की अवमानना भी न हो और छात्रों का प्रतिनिधित्व भी हो जाए।

सूर्यनाथ सिंह: इधर देखने में आ रहा है कि उच्च शिक्षा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ध्यान में रख कर पढ़ाई-लिखाई कराने का जोर बढ़ा है। यह कहां तक उचित है?
तलत अहमद: शिक्षा का व्यवसायीकरण नहीं होना चाहिए। यूनिवर्सिटी का मतलब है कि वहां यूनिवर्सल नॉलेज हो। आप पढ़ाई सिर्फ इसलिए कराएं कि कल को उसे नौकरी मिल जाएगी, तो वह कभी पक्का बुद्धिजीवी नहीं बन पाएगा।

तलत अहमद क्यों

केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद से देश के ज्यादातर बड़े विश्वविद्यालय परिसरों में तनाव तो है ही, अल्पसंख्यक संस्थान अपनी खास पहचान के कारण दोहरा तनाव झेलने को मजबूर हैं। पिछले दिनों जब रामजस मामले में अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस हुई, तो दक्षिणपंथी संगठन से जुड़ीं शाजिया इल्मी ने जामिया पर आरोप लगाया कि उन्हें तीन तलाक पर बोलने से रोकना उनकी आजादी पर हमला था। इन मसलों के साथ ही वैश्विक ज्ञान के संदर्भ में जामिया की स्थिति बताने के लिए संस्थान के कुलपति से बेहतर व्यक्ति भला कौन हो सकता है?

 

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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First Published on March 19, 2017 4:43 am

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