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असहमति के वाबजूद

कृष्णदत्त शर्मा के लिए आलोचना कर्म तात्कालिक रणनीति न होकर अनिवार्य दीर्घकालिक दायित्व है। इस वजह से उनके अधिकतर लेख स्थायी महत्त्व के होते हैं।
Author March 20, 2016 03:14 am

कृष्णदत्त शर्मा के लिए आलोचना कर्म तात्कालिक रणनीति न होकर अनिवार्य दीर्घकालिक दायित्व है। इस वजह से उनके अधिकतर लेख स्थायी महत्त्व के होते हैं। उनकी नई पुस्तक आलोचना और सृजनशीलता में ऐसे ही चौदह लेख संकलित हैं। मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा, कॉलरिज, इलियट आदि से संबंधित इन लेखों में सृजन और आलोचना को परस्पर संबद्ध मानते हुए कुछ बुनियादी चिंताओं और समस्याओं को रेखांकित किया गया है।

कृष्णदत्त शर्मा मुक्तिबोध से बहुत प्रभावित हैं। कवि से ज्यादा उनका समीक्षक रूप उन्हें भाता है। इस पुस्तक में मुक्तिबोध पर पांच लेख हैं। इनमें दो लेख उनकी सैद्धांतिक आलोचना से संबंधित हैं और तीन लेख उनकी व्यावहारिक आलोचना से। कृष्णदत्त शर्मा जिस जमीन पर खड़े होकर अपनी अलोचना दृष्टि को विकसित करते हैं, वह मार्क्सवाद की जमीन है। यह मार्क्सवाद शीतयुद्ध कालीन है। इसमें ईमानदारी और प्रखरता है, पर कट््टरता भी कम नहीं है।

उनकी आलोचना पद्धति रामविलास शर्मा से दूर तक प्रभावित है। उनके लेखों की अंतर्योजना में अज्ञेय, विजयदेव नारायण साही के साथ-साथ नामवर सिंह का विरोध सर्वत्र दिखाई देता है। यह भी अपने आप में कम दिलचस्प नहीं है कि मुक्तिबोध के आलोचना कर्म का विश्लेषण करते हुए वे बार-बार नामवर सिंह पर कटाक्ष तो करते हैं, पर रामविलास शर्मा पर सचेत चुप्पी साध लेते हैं। ऐसा लगता है कि वे हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध के महत्त्व को रेखांकित करने का श्रेय भी नामवर सिंह से छीन लेना चाहते हैं। नई कविता के दौर में मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा एक-दूसरे के घनघोर विरोधी में रहे। इस संबंध में अमृत डांगे को लिखे पत्र के बाद भी कुछ कहने की शायद जरूरत नहीं रह जाती।
मुक्तिबोध के आलोचना कर्म का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन तब तक संभव नहीं है जब तक कि प्रगतिशील आलोचना के भीतर के उनके संघर्षों का विश्लेषण नहीं किया जाता। इस विश्लेषण के लिए रामविलास शर्मा से टकराना अपरिहार्य है। कृष्णदत्त शर्मा की समस्या यह है कि वे एक ही साथ मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा दोनों के कायल हैं। इस जबर्दस्त विरोधाभास का असर उनके विश्लेषण और आलोचकीय निष्कर्षों पर दिखाई देता है।

यह अकारण नहीं है कि वे मुक्तिबोध की आलोचना पद्धति को आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना पद्धति से और नामवर सिंह की आलोचना पद्धति को परिमल ग्रुप से जोड़ते हैं। इस तरह नामवर सिंह भले मुक्तिबोध को महत्त्व देते हों, पर उनके आलोचकीय सरोकार परिमल (साही) से जुड़े हैं, जिसके विरुद्ध मुक्तिबोध संघर्ष कर रहे थे। साथ ही, मुक्तिबोध और रामविलास शर्मा भले एक-दूसरे के विरोधी दिखते हों, पर दोनों रामचंद्र शुक्ल की परंपरा से जुड़े हैं। इस विश्लेषण के फलस्वरूप एक वृहद आलोचक-त्रयी का जन्म होता है- रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा और मुक्तिबोध। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह स्वत: गायब हो जाते हैं। वैसे तो लेखक ने आलोचना कर्म में रणनीति को त्याज्य माना है, पर उनके आलोचकीय निष्कर्षों को भी पूरी तरह निर्दोष नहीं कहा जा सकता।

मुक्तिबोध पर लिखे इन पांचों लेखों को हाल के वर्षों में उन पर लिखे गए कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण लेखों में शामिल किया जा सकता है। ‘ईमानदारी के मायने’ लेख में बहुत ही गंभीर और व्यापक विश्लेषण के माध्यम से लेखक ने यह समझाने का प्रयास किया है कि मुक्तिबोध जब ईमानदारी को एक साहित्यिक मूल्य बनाते हैं तो वह न सिर्फ ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’ जैसे काव्य मूल्यों का प्रगतिशील विकल्प बनता है, बल्कि इसके सहारे नई कविता में व्याप्त मध्यवर्गीय भावबोध, अवरवाद और प्रतिक्रियावाद से भी जोरदार संघर्ष करते हैं।

लेखक द्वारा नामवर सिंह की आलोचना का एक बड़ा कारण भी यही है कि मुक्तिबोध लेखक के लिए ईमानदारी और समीक्षक के लिए जिस चरित्र को अनिवार्य मानते हैं, उसका उनमें घोर अभाव है। ‘कवि शमशेर: मुक्तिबोध की दृष्टि में’ लेख के अंतर्गत कृष्णदत्त शर्मा ने बताया है कि शमशेर पर लिखा गया मुक्तिबोध का लेख साही के लेख से अधिक परिष्कृत और अंतर्दृष्टि संपन्न है। बावजूद इसके अगर साही का लेख बहुत चर्चित हो गया तो इसका बड़ा कारण यह है कि नामवर सिंह ने साही को अधिक वजन दिया। इस लेख में उन्होंने मुक्तिबोध के सहारे साही की शमशेर संबंधी मान्यताओं का तर्कसंगत खंडन किया है।

‘रामविलास शर्मा: आलोचना के हक में’ शीर्षक लेख सर्वाधिक विचारोत्तेजक और महत्त्वपूर्ण है। आचार्य शुक्ल, आचार्य द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह के आलोचकीय संबंधों के साथ-साथ हिंदी आलोचना के संपूर्ण परिदृश्य की दृष्टि से यह लेख असाधारण महत्त्व का है। इस लेख को नामवर सिंह के लेख ‘इतिहास की शव साधना’ के टक्कर का कहा जा सकता है। अंतर सिर्फ इतना है कि नामवर सिंह का लेख रामविलास शर्मा के विरोध में है और यह लेख उनके घोर समर्थन में है। तल्खी, तेवर और अंदाज में एकदम समान। यह लेख आचार्य शुक्ल और रामविलास शर्मा को जिस मात्रा में प्रतिष्ठित करता है, उसी मात्रा में आचार्य द्विवेदी को खारिज भी करता है। लेखक ने आचार्य द्विवेदी को बड़ा रचनाकार तो माना है, पर उन्हें बड़ा आलोचक मानने इनकार किया है। उनके अनुसार आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी के बड़े आलोचक रामविलास शर्मा हैं और उनके बाद नामवर सिंह। इस लेख से असहमति संभव है, पर इससे असहमत नहीं हुआ जा सकता कि ऐसे लेखों से ही हिंदी आलोचना का विकास होता है।

कृष्णदत्त शर्मा हिंदी आलोचना के साथ-साथ पाश्चात्य आलोचना पर भी बारीक नजर रखते हैं। टीएस इलियट और कॉलरिज पर लिखे गए उनके लेख इसके प्रमाण हैं। ‘टीएस इलियट और रचना प्रक्रिया’ लेख में इलियट के बहाने सृजन प्रक्रिया का गंभीर विश्लेषण है, तो दूसरे लेख में इलियट के धार्मिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि का तत्कालीन युग संदर्भों को ध्यान में रखते हुए गंभीर विश्लेषण किया गया है। लेखक पश्चिमी आलोचना के पूरे परिदृश्य से अवगत है। इसका एक अच्छा प्रभाव इस रूप में दिखता है कि एक आलोचक पर लिखते हुए वे प्राय: अन्य आलोचकों के मतों का तुलनात्मक विश्लेषण करते चलते हैं। इस लिहाज से उनके लेखों को पढ़ना एक तरह से आलोचना के पूरे वैश्विक परिदृश्य से परिचित होने जैसा है।
दिनेश कुमार
आलोचना और सृजनशीलता: कृष्णदत्त शर्मा; अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 4697/3, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 800 रुपए।

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