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समांतर संसार: पढ़ाई में भटकाव के रास्ते

सय्यद मुबीन ज़ेहरा ज्ञान का उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य बनाना है। शिक्षा प्राप्त ही इसलिए की जाती है कि हम मानवीय मूल्यों पर चलते हुए अपने उज्ज्वल भविष्य का आधार रख सकें। पर अब शिक्षा बहुत महंगी होती जा रही है और इसका उद्देश्य केवल भारी वेतन वाली नौकरी प्राप्त करना हो गया है। जहां […]
Author April 12, 2015 16:59 pm

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

ज्ञान का उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य बनाना है। शिक्षा प्राप्त ही इसलिए की जाती है कि हम मानवीय मूल्यों पर चलते हुए अपने उज्ज्वल भविष्य का आधार रख सकें। पर अब शिक्षा बहुत महंगी होती जा रही है और इसका उद्देश्य केवल भारी वेतन वाली नौकरी प्राप्त करना हो गया है। जहां शिक्षा सस्ती और मुफ्त में मिल रही है वहां वह मुश्किल में है। पिछले दिनों बिहार में नकल की जिन तस्वीरों को खूब उछाला गया, ठीक वैसी ही तस्वीरें हरियाणा और कुछ दूसरे राज्यों से भी मिली हैं, मगर उन्हें इस तरह नहीं दिखाया गया। बिहार की तस्वीरों को लेकर इतनी चर्चा हुई कि पिछले दिनों आस्ट्रेलिया के एक रेडियो स्टेशन से फोन आया और सीधे कार्यक्रम में इस पर मुझसे राय पूछी गई। जो चित्र हमारे एक राज्य के किसी छोटे से विद्यालय का था उसे दुनिया भर में भारत की छवि बना कर पेश कर दिया गया।

जो लोग अपने छोटे से लाभ के लिए गलत रास्ते अपनाते हैं उन्हें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि आज दुनिया के मोबाइल में सिमट जाने से कहीं की भी बात दुनिया के किसी भी कोने में बहुत तेजी से फैल जाती है। आज भारत के बच्चे कठिन परिश्रम के बाद दुनिया भर में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अधिक से अधिक भारतीय युवा पश्चिम के बड़े देशों में पढ़ाई के लिए जा रहे हैं और वहां नौकरी भी पा रहे हैं।

सब जानते हैं कि हमारे यहां की शिक्षा प्रणाली इतनी कड़ी है कि मेहनत के बाद ही बच्चे उसे पास कर पाते हैं, जबकि विदेशों की शिक्षा प्रणाली बहुत आसान है। यह बात मुझे तब भी महसूस हुई, जब स्कूल विनिमय कार्यक्रम के सिलसिले में इटली और जर्मनी से आए बच्चों को घर में रखने का अवसर मिला। वे मेरे बेटों के साथ ही स्कूल जाते थे। यहां की पढ़ाई देख कर वे हैरान थे। यहां जो चीजें दसवीं में पढ़ाई जाती हैं, उनके यहां वे बाद में पढ़ने को मिलती हैं। यही कारण है कि जब हमारे बच्चे बाहर जाते हैं, तो वे वहां के बच्चों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं। खुद को बेहतर साबित करने की जरूरत उनसे ज्यादा मेहनत करवाती है और वे विदेशों में भी अपनी जगह बना लेते हैं।

मगर नकल की ऐसी तस्वीरें उन बच्चों के सामने मुश्किल खड़ी कर देती हैं, जो विदेशों में अपनी जगह बनाने जाते हैं। इसलिए मैंने आस्ट्रेलियाई हिंदी रेडियो पर कहा कि यह केवल एक क्षेत्र के किसी एक स्कूल की छवि हो सकती है, पूरे भारत की नहीं। भारत के लोग मेहनती हैं और इसी के बल पर अपनी जगह बनाते हैं।

हो सकता है कि हमारे यहां कुछ शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षकों के चयन का तरीका कमजोर हो, जिससे अच्छे शिक्षक नहीं आ पा रहे हैं और बच्चों को सही शिक्षा नहीं मिल पा रही हो। हालांकि बहुत-से विद्यार्थी भी पूरे वर्ष शिक्षा को गंभीरता से नहीं लेते। जब परीक्षा समीप आती है तो पास होने के लिए गलत रास्ते अपनाते हैं। जबकि शिक्षा तो संपूर्ण व्यक्तित्व बनाने के लिए होती है। केवल पास होना महत्त्वपूर्ण नहीं होता। पास होने के लिए गलत रास्ता अपनाया जाता है तो वह पूरी शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करता है। इसलिए हमें इससे बचना चाहिए। शिक्षकों की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को शिक्षा और प्रशिक्षण इस प्रकार दें कि वे गलत रास्तों से बचते हुए हर हाल में मूल्यों का दामन थामे रहें।

आज भारत के युवा बाहर निकल रहे हैं और अपने हुनर का लोहा मनवा रहे हैं, तो एक तरह की घबराहट उन देशों में हो रही है, जिन्हें यह खतरा है कि कहीं ये बच्चे अपनी मेहनत से उन पर हावी न हो जाएं। आस्ट्रेलिया में पिछले साल और इस साल भी जैसी नफरत भारतीय मूल के लोगों के प्रति देखने को मिली, वह उसी का सबूत है।

कनाडा में पढ़ाई करने गए मेरे भतीजे ने जब आस्ट्रेलियाई रेडियो वाली बातचीत सुनी तो उसने कहा कि मुझे इससे बहुत हौसला मिला है, क्योंकि उसकी शिक्षिका ने यह नकल वाली वीडियो पूरी क्लास को दिखाई थी, जिससे वह काफी मानसिक दबाव में था। इसलिए मीडिया को भी ध्यान रखना चाहिए कि वह ऐसी तस्वीरों को बढ़ा-चढ़ा कर न पेश करे, जिससे देश की नकारात्मक छवि बनती हो।

हमारे यहां की एक और छवि है, जो न हमारे यहां कहीं दिखाई गई, न इस बारे में कोई चर्चा करता है। बर्तानिया में एक परियोजना के तहत शोध में यह बात सामने आई है कि वहां हर बीसवां छात्र सेक्स कार्यकर्ता है। छह हजार सात सौ पचास छात्रों पर किए गए शोध से यह चौंकाने वाली और दर्दनाक बात सामने आई है कि ये बच्चे विश्वविद्यालय में महंगी शिक्षा जारी रखने के लिए अपने शरीर का सौदा करते हैं। यह सोचने की बात है कि आखिर शिक्षा का उद्देश्य क्या है। शिक्षा का उद्देश्य तो एक अच्छा इंसान बनाना है, अपने मूल्यों के साथ जुड़ना है। अगर वही मर रहा है, तो ऐसी शिक्षा किसी को कहां ले जाएगी!

सच तो यह है कि शिक्षा को बाजार के पंजे से हर हाल में निकालना होगा, वरना यह हमारे बच्चों के भविष्य को डस लेगी। सवाल यह भी है कि क्या केवल शिक्षा का खर्च उठाने के लिए ऐसा हो रहा है या फिर अपने बढ़े हुए खर्च और अपनी बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए। जो भी हो, यह परेशानी की बात है और इस बुराई को दूर किया जाना चाहिए। केवल यही बुराइयां नहीं हैं, बल्कि पश्चिमी देशों के कई विश्वविद्यालयों में नशीले पदार्थों की लत लगाने के लिए ऐसे छात्रों का उपयोग किया जाता है, जो अपना खर्च निकालने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। ऐसे हालात में बच्चे कैसे बुराइयों से दूर रह सकते हैं। इसके लिए बच्चों में नैतिक मूल्यों का भरा होना जरूरी है। जिन बच्चों को शुरू से बुराई से दूर रहने की आदत डाली गई है वे इन सब बातों से बच जाते हैं। मगर यह दुख की बात है कि शैक्षणिक संस्थानों में ऐसी बुराइयां पनपने लगी हैं।

शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने की जरूरत है। अभी तो ऐसा लगता है कि हम बाजार के हिसाब से सब कुछ तय कर रहे हैं। पर क्या बाजार शिक्षा के साथ-साथ वह संस्कृति और मूल्य दे पा रहा है, जो हमारी भारतीयता की विशेषता रहे हैं। वे मूल्य जो पहले हमारे गुरुकुल और मदरसों का हिस्सा थे। हमें हर हाल में अपने बच्चों को ईमानदारी के साथ और उसके सही संदर्भ में शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा देनी होगी। जरूरी नहीं कि बच्चे इंजीनियर या डॉक्टर बनेंगे तभी उनका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। अब ऐसे छोटे-छोटे कई व्यवसाय हैं, जिनके बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है।

अगर सोच-समझ कर, अपनी क्षमता के अनुसार वे अध्ययन करें तो निश्चित रूप से उनका भविष्य अच्छा हो सकता है। वे चाहे जैसी शिक्षा प्राप्त करें एक बात का ध्यान रखना होगा कि ईमानदारी से परीक्षा दें और कभी कुछ ऐसा न करें जिससे उनके परिवार और देश बदनाम हों। एक छोटी-सी तस्वीर न केवल देश को बदनाम करती, बल्कि वहां के नौजवानों के भविष्य की राह का रोड़ा बन जाती है।

 

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