ताज़ा खबर
 

हकीकत और फसाना

हिंदी के लेखक धीरे-धीरे अपनी जमीन बनाते हैं। उसके लिए उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। हिंदी की दुनिया में बाजार, लेखक और पाठक के बाद आता है।
Author September 10, 2017 05:48 am
प्रतीकात्मक चित्र।

हिंदी साहित्य की दुनिया में सर्वाधिक बिकने वाली किताब यानी की बेस्ट सेलर कोई नई बात नहीं है। यह बात और है कि हिंदी साहित्य के प्रकाशकों ने किन्हीं खास कारणों से इसे स्वीकार नहीं किया। किसी भी भाषा के साहित्य में बेस्ट सेलर की बात करने से पहले हमें उस भाषा की सामाजिकता को समझना चाहिए। हिंदी साहित्य का विकास ऊर्ध्वगामी नहीं है, यानी कोई एक किताब आसमान को नहीं छूती, कोई एक लेखक यहां स्टार नहीं होता, बल्कि कई लेखकों की कई किताबें मिल कर हिंदी साहित्य की बड़ी दुनिया बनाती हैं। हिंदी का विकास जमीनी है। गांव-देहात, कस्बों, छोटे शहरों, महानगरों से इतर हिंदी साहित्य के लाखों पाठक हैं, जिन्हें कभी किसी गिनती में शामिल ही नहीं किया जाता। पर वह पाठक वर्ग हिंदी साहित्य की दुनिया में बहुत महत्त्व रखता है और उसी की पसंद और नापसंद से एक बड़े भारत की तस्वीर अपनी रचनाओं में खींचने वाले लेखक हिंदी के सदाबहार लेखकों के रूप में अपनी व्यापक उपस्थिति दर्ज करा पाते हैं, अपनी एक स्थायी पहचान बना पाते हैं। हिंदी के लेखक धीरे-धीरे अपनी जमीन बनाते हैं। उसके लिए उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। हिंदी की दुनिया में बाजार, लेखक और पाठक के बाद आता है।

हिंदी साहित्य के पूरे कार्य-व्यापार में तीन घटक हैं- लेखक, पाठक और बाजार। इस त्रिकोण में अगर अभिव्यक्ति ही नहीं होगी, तो आप क्या छापेंगे, कब तक पुरानी चीजें पाठक को परोसते रहेंगे। इसलिए इस पूरे कारोबार के केंद्र में लेखक को होना चाहिए और उसके साथ उसके पाठक को, पर हुआ यह है कि आज बाजार के लगातार बढ़ते प्रभाव से प्रकाशक केंद्रीय शक्ति बन कर उभरा है। आज बाजार की उपस्थति या उसकी उपयोगिता से न कोई इनकार कर सकता है, न उसका विरोध करके अपनी रचना को पाठकों तक पहुंचा सकता है। पर यहां गड़बड़ी कहां हो रही है, यह समझने वाली बात है। प्रकाशन के बाजार में दो चीजें हैं- एक सृजनात्मकता और दूसरी प्रबंधन। अब अगर बाजार अपने प्रबंधन में बदलते समय में थोड़ी सृजनात्मकता, थोड़ी रचनात्मकता लाए, अपने पाठकों की शिनाख्त करे, उन तक पहुंचने के नए तरीके ईजाद करे, उनकी क्रय शक्ति को समझे, लेखक को ईमानदारी से रॉयल्टी दे और लेखक-पाठक के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करे तब तो इन तीनों में एक समन्वय बनेगा। और बाजार का स्वागत भी होगा। पर हो यह रहा है कि बाजार प्रबंधन में रचनात्मकता लाने के बजाय, उल्टा रचनात्मकता को मैनेज करने की कोशिश कर रहा है। यानी वह बताने लगा है कि क्या और कैसे लिखा जाना चाहिए, यह लिखोगे तो ज्यादा बिकेगा, बाजार का यह रवैया साहित्य के लिए घातक है।

बाजार के इस कदम से ही एक ऐसी खाई पैदा होनी शुरू हो जाती है, जिसके एक सिरे पर ऐसा लेखक है, जिसके लिखे में गहराई है, उसके अपने सरोकार हैं, जीवन मूल्य हैं, उसके पास ऐसा साहित्य है, जो दीर्घजीवी है, जिसके लिए आज बाजार यह प्रचारित करता है कि उसके पाठक नहीं हैं और दूसरी ओर ऐसे लेखन का अंबार लगता जाता है, जिसमें कोई गहराई नहीं, जिसके कोई सरोकार नहीं, जिसमें जीवन के सच्चे अनुभव नहीं। उसे तमाम तरह की मार्केटिंग नुस्खों के जरिए बाजार में खपा दिया जाता है, जिसे खरीदा तो जाता है, लेकिन साहित्य की तरह पढ़ा नहीं जाता, याद नहीं रखा जाता। अब चूंकि सतह पर बहुतायत में यही दिखाई देता है, तो आम पाठक इसी को पसंद-नापसंद करके अपनी राय बनाने लगता है और बाजार विज्ञापन माध्यमों की ताकत का इस्तेमाल करके उसे पूरे हिंदी साहित्य जगत पर जनता की राय और पसंद के रूप में प्रचारित करने लगता है।

बाजार के इसी उपक्रम का प्रतिफल बेस्ट सेलर बता कर प्रचारित की जाने वाली सूचियां हैं। इन सूचियों को देख कर गहरा संदेह होता है। हिंदी साहित्य जगत में हजारों प्रकाशकों के होते हुए आप तीस-चालीस प्रकाशकों की पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े लेकर एक सूची बना लेते हैं। क्या कारण है कि 2017 में होने वाले इस सर्वे में, जनवरी 2011 से लेकर अब तक छपी किताबें शामिल की जाती हैं और चालू वर्ष के बीच में अपनी सुविधा से किन्हीं तीन महीनों के आंकड़े उठा लिए जाते हैं? गौरतलब है कि इन आंकड़ों के लिए कुछ बड़े शहरों की कुछ खास दुकानों (ज्यादातर अंगरेजी साहित्य की पुस्तकें रखने वाली दुकानों से) और आॅनलाइन बिक्री को आधार बनाया जाता है। दूसरी बात- प्रकाशकों से उनकी किताबों की बिक्री के आंकड़े नहीं मांगे जाते। अगर उनसे पुस्तक की बिक्री के आंकड़े लिए गए होते तो आप एक-दो पुस्तकों के आंकड़ों को प्रकाशक से पूछ कर मिलान कर सकते थे। तीसरी बात- इसमें पाठकों की राय शामिल नहीं है। चौथी और अहम बात यह कि पुस्तक मात्र एक बाजारू उत्पाद नहीं है। यह एक तरह की बौद्धिक संपदा भी है। फिर इसका सर्वे एक प्रोडक्ट सर्वे करने वाली विदेशी कंपनी से क्यों कराया जाता है। क्या ऐसी सूचियों के जारी होने के साथ पाठक को यह जानने का हक नहीं होना चाहिए कि जो प्रकाशन जगत अपने लेखक को रॉयटी देने में सौ तरह के बहाने करता है, इस सर्वे का खर्चा उठाने के लिए कौन-सी संस्था, क्यों और कैसे तैयार हो जाती है। क्या इसको करने से पहले आल इंडिया पब्लिशर्स एशोसिएशन जैसी कोई संस्था अगर अस्तित्व में है तो उससे कोई राय ली गई है।

यह तो कुछ सीधे-सीधे दिखाई देने वाली बातें हैं। पर इसमें बहुत कुछ ऐसा भी है जिसे पहले से समझ कर केवल लेखक और पाठक को नहीं, प्रकाशकों को भी सचेत होने की जरूरत है। विश्व भर में छपी हुई किताबों की बिक्री में भारत का बहुत बड़ा हिस्सा है और इसमें बहुत बड़ा प्रतिशत भारतीय भाषाओं का है, जिसमें हिंदी की पुस्तकों की बिक्री सबसे ज्यादा है। जाहिर है, हिंदी की इस लगातार बढ़ती दुनिया पर विदेशी प्रकाशकों की भी नजर है। पर विदेशी प्रकाशकों के लिए हिंदी साहित्य के बाजार की पेचीदगियों को समझना और उनसे निपटना आसान नहीं है। इसलिए वे किसी हिंदी प्रकाशक से हाथ मिला कर अपने लिए कोई सरल रास्ता तलाशेंगे। वे अपने आकार के हिसाब से बिक्री के लक्ष्य तय करेंगे। और यही कारण होगा कि उनके आने की आहट मात्र से लगभग असंगठित और कुटीर उद्योग की तरह चलने वाला हिंदी साहित्य का प्रकाशन उद्योग वैश्विक बाजार के तौर-तरीकों की तरफ बढ़ेगा। विज्ञापनों और रेटिंग एजेंसियों की मदद से इसे कई गुना विस्तार दिया जाएगा। बाजार की नई रणनीति के तहत इसे अपने नए आइकन भी खड़े करने होंगे, क्योंकि पहले से अपनी पहचान बना चुके, अपनी अस्मिता के प्रति सजग लेखक आसानी से बाजार के बरगलाने में नहीं आते, जितने कि नए लोग हो जाते हैं। यहां लेखक बनने से पहले इनमें स्टार बनने की, प्रसिद्ध होने की भूख जगाई जाती है। इन्हें बताया जाता है कि लेखन सुधारने की जरूरत नहीं, जैसा बाजार चाहता है वही लिखो और हम उसे बिक्री के आंकड़ों और प्रायोजित समाचारों की मदद से तुम्हें पाठक की नजर में चढ़ा देंगे। पर इस सबके बीच अफसोस इस बात का होता है कि बाजार के इस दंगल में लेखक और भारतीय प्रकाशक का जो नफा-नुकसान होगा वह तो होगा ही, पर रचनात्मकता से किए जा रहे इस खिलवाड़ में, आंकड़ों और सूचियों के इस खेल में अंतत: ठगा तो हिंदी का पाठक ही

जाएगा।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.