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वक्त की नब्ज : आजादी की आड़ में

मैं श्रीनगर काफी जाया करती थी उन दिनों, इस वास्ते कि कश्मीर पर किताब लिख रही थी और याद है मुझे कि किस तरह हिज्बुल मुजाहिदीन के मुजाहिद इस शहर की सड़कों पर घूम कर जबर्दस्ती बंद करवाते थे सिनमा घर, विडियो लाइब्रेरी और शराब की दुकानें।
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 10:29 am
कश्‍मीर घाटी में आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद से तनाव है। (Photo Source: PTI)

फ्रांस के नीस शहर में जिहादी हमला होने के कुछ ही घंटे बाद राष्ट्रपति ओलांद ने कबूल किया कि इस हमले को जिहादी आतंकवाद की लंबी हिंसक कड़ी में जोड़ा जा सकता है। फ्रांस जिहादियों के निशाने पर है, इस बात को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनानी होगी। फ्रांस के राष्ट्रपति के बयान की तरफ ध्यान देने की जरूरत है। जब तक हमारे राजनेता स्वीकार नहीं करते कि कश्मीर में जो हिंसा हो रही है बुरहान वानी की हत्या के बाद, वह जिहादी है, तब तक हम कश्मीर के मसले का राजनीतिक हल ढूंढ़ने में नाकाम रहेंगे। बल्कि यह भी कहना गलत न होगा कि जिहादी किस्म की हिंसा शुरू हुई है कश्मीर से।

कश्मीर की ‘आजादी’ के लिए हिंसक दौर शुरू हुआ था 1989 के आखिरी दिनों में, जब महबूबा मुफ्ती की बहन को यासीन मलिक और उनके साथियों ने अगवा किया था, लेकिन बहुत जल्दी उनके जेकेलएफ को पीछे छोड़ कर हिज्बुल मुजाहिदीन आगे निकल गया, क्योंकि इस जिहादी संस्था को समर्थन मिला पाकिस्तान का। और वह इसलिए कि पाकिस्तान को एक ऐसी तंजीम को आगे लाना था, जो जेकेएलएफ की तरह सेक्युलर मिजाज की न हो। सो, हिज्बुल मुजाहिदीन का इजाद हुआ और कश्मीर घाटी में उसके आते ही जिहादी किस्म की हिंसा शुरू हो गई थी।

मैं श्रीनगर काफी जाया करती थी उन दिनों, इस वास्ते कि कश्मीर पर किताब लिख रही थी और याद है मुझे कि किस तरह हिज्बुल मुजाहिदीन के मुजाहिद इस शहर की सड़कों पर घूम कर जबर्दस्ती बंद करवाते थे सिनमा घर, विडियो लाइब्रेरी और शराब की दुकानें। इसके बाद उन्होंने महिलाओं को निशाना बनाया और खूब डराया-धमकाया उनको, जो बेहिजाब घूमने की हिम्मत दिखाती थीं। यह वह समय था जब ज्यादातर कश्मीरी औरतें बेहिजाब थीं, लेकिन कुछ ही महीनों में यह बदल गया और आज हाल यह है कि आसिया अंदराबी जैसी महिलाएं न सिर्फ अपने चेहरे को पूरा ढक कर रखती हैं, बल्कि हाथों पर भी काले दस्तानें पहनती हैं। आसिया अंदराबी दुख्तराने मिल्लत की अध्यक्ष हैं, लेकिन लिबास उनका बिलकुल वही है, जो आइएसआइएस के मुताबिक औरतों के लिए अनिवार्य है।

दरअस्ल, कश्मीर में आजादी की लड़ाई अब इस्लाम के नाम पर लड़ी जा रही है, आजादी के लिए नहीं। सबूत चाहिए तो बुरहान वानी के विडियो देख लीजिए। पिछले हफ्ते मैंने कई देखे और उन सब में पाया कि वानी आजादी की कम और इस्लाम की बातें ज्यादा किया करता था। उसके जनाजे पर जो लोग आए मातम करने, उन्होंने ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहो-अकबर’ जैसे नारे लगाए। बुरहान था कश्मीरी, लेकिन उसका वास्ता पाकिस्तान से इतना गहरा था कि हाफिज सईद और सईद सलाउद्दीन ने शोकसभा बुलाई मुजफ्फराबाद में उसके लिए और पाकिस्तान सरकार को इतनी तकलीफ हुई उसकी मौत की खबर सुन कर कि टीवी में बहस करवाई उसकी भारत सरकार द्वारा ‘नाजायज हत्या’ को लेकर। क्या और सबूत चाहिए हमें कि हिज्बुल मुजाहिदीन एक जिहादी संस्था है, जिसको पूरा समर्थन मिलता रहा है शुरू से पाकिस्तान का।

बुरहान वानी ने मरने से पहले एक विडियो इंटरनेट पर अपलोड किया, जो वायरल हो गया था। इसमें उसने कश्मीर घाटी के लोगों को भारतीय सैनिकों और कश्मीर के पुलिसवालों पर हमले करने के लिए कहा। सो, कोई इत्तेफक नहीं था कि उसके मरने के बाद नौजवानों के हिंसक समूह निकले कश्मीर घाटी के शहरों में और उन्होंने पथराव इतना किया सुरक्षा कर्मियों पर कि उनको अपने बचाव में गोली चलानी पड़ी। ऐसा न करते तो शायद इन शहरों के सरकारी दफ्तरों पर कब्जा कर लेते ये नौजवान। कई थानों को जला कर राख कर दिया गया सुनियोजित तरीके से। कौन करवा रहा था यह सब? कहां बैठे हैं जिहादियों के जरनैल?

ये सवाल पूछने के बदले जब भी अशांति फैलती है कश्मीर घाटी में, हमारे बुद्धिजीवी और राजनीतिक पंडित लंबे लेख लिख कर सलाह देते हैं कश्मीर में ‘राजनीतिक हल’ ढूंढ़ने की। इन लोगों के इरादे बेशक नेक होंगे, लेकिन इनके लेख पढ़ कर मुझे ताज्जुब हुआ पिछले हफ्ते कि इनमें से एक भी व्यक्ति ने गौर नहीं किया कि कश्मीर घाटी में अब लड़ाई आजादी के लिए नहीं, इस्लाम के लिए लड़ी जा रही है। और इस्लाम के नाम पर जब जंग होती है, उसको अल्लाह के सिपाही अक्सर जिहाद कहते हैं।

मुझे विश्वास है कि कश्मीर का जिहाद पूरी तरह से उस जिहाद का हिस्सा है, जो दुनिया के तकरीबन हर मुल्क में लड़ा जा रहा है हम काफिरों के खिलाफ। इस जिहाद का केंद्र हमारे पड़ोस में है, लेकिन इस सच्चाई का सामना करने को हम तैयार नहीं हैं। हमारे ‘सेक्युलर’ राजनेता अब भी कहते फिरते हैं कि पाकिस्तान के साथ बातचीत का सिलसिला फिर से शुरू करना जरूरी है, अगर हम शांति चाहते हैं कश्मीर में। विनम्रता से अर्ज करना चाहूंगी कि इससे नुकसान होगा सिर्फ भारत का, क्योंकि ऐसा करके हम स्वीकार करेंगे कि कश्मीर अब भी विवादित जगह है और इस विवाद को सुलझाने के लिए हमको एक बार फिर भारत की सीमाएं बदलनी पड़ेंगी।

नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने साफ जाहिर किया था कि वे कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से बात करने को तैयार नहीं हैं। यह अच्छी पहल थी, लेकिन अब अगला कदम रखने का वक्त आ गया है और वह कदम यह होना चाहिए कि प्रधानमंत्री स्पष्ट शब्दों में कहें कि आजादी कभी नहीं मिलने वाली है कश्मीर घाटी को। ऐसा कहने के बाद ही राजनीतिक हल ढूंढ़ने का काम शुरू किया जाए।

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  1. हिंदू राष्ट्रवादी
    Jul 17, 2016 at 8:29 pm
    प्रधानमंत्री स्पष्ट शब्दों में कहें कि आजादी कभी नहीं मिलने वाली है कश्मीर घाटी को।तवलीन सिंह जी ने बिलकुल ी लिखा हे और कश्मीर की हकीकत वयां की हे .मोदी जी को अब कड़ा रूख अख्तियार करने की जरूरत he
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    सबरंग