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स्त्री विमर्शः राष्ट्रीय एकता का स्त्री पक्ष

पुरुष-सत्ता स्त्री के कंधे पर बंदूक रख कर स्त्री को निशाना बनाती है, चाहे वह भ्रूण-हत्या हो, दहेज या अन्य कारणों से युवा स्त्रियों को जिंदा जलाना हो, चाहे बहू या पुत्री पर दूसरे तरह की हिंसा या नियंत्रण हो। सारी नीतियां, कार्यक्रम, एजेंडा, योजनाएं पुरुष या उनकी सोच में ढली महिलाएं बनाती हैं और बाकी सामान्य स्त्रियों के लिए उन्हें अनुकरण के लिए जारी कर दिया जाता है।
Author March 20, 2016 03:11 am

दुनिया भर के स्त्री-संघर्ष को देखें तो तमाम बंधनों और बंदिशों के बावजूद स्त्री ने यथास्थिति के प्रति कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। उसे पराधीन बनाया गया, उसकी पराधीनता को वैधानिक संरचना दी गई; लेकिन यह उसकी अप्रतिहत मानवीय अंत:शक्ति, इच्छाशक्ति ही थी कि जब-जब मौका मिला, उसने अपना विरोध और प्रतिरोध दर्ज कराया। हालांकि इस विरोध और प्रतिरोध के लिए भी निरंतर उसे प्रतारणाएं और अवमाननाएं मिलीं, लेकिन पराजय उसने नहीं स्वीकार की। पराजय और पराधीनता में फर्क है। आप किसी को पराधीन तो कर सकते हैं, उसे कैद में तो डाल सकते हैं, पर जरूरी नहीं कि वह आपसे पराजित भी हो जाए! यह एक रणनीतिक पैंतरा होता है, जो अवसर, स्थान और आवश्यकता के हिसाब से तय होता है। अपनी अस्मिता और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए किया गया स्त्री का संघर्ष लगभग इसी रास्ते चलता और आगे बढ़ता रहा है।

राष्ट्रीय एकता के निर्माण में लगभग इसी प्रकार की संघर्षशीलता सबसे अधिक काम आती है। एक ऐसी अप्रतिहत और अपराजेय संघर्ष-क्षमता या चेतना, जो यथास्थितिवाद से कभी समझौता नहीं करती, जो आजादी की मौलिक कल्पना में हमेशा दत्तचित्त रहती है, जो अनर्गल तात्कालिकताओं और प्रतिक्रियावादी उपक्रमों से परहेज करते हुए मूल्यनिष्ठ और सिद्धांतपुष्ट पक्ष-ग्रहण में विश्वास करती है, जो इतिहास और परंपरा से बहुत कुछ सीखते हुए भी उसका अंधानुकरण करने के बजाय उसे अपने समकाल और उसके संदर्भ में आगामी कल के संभावनाशील अनुमानों के मद्देनजर पुनर्व्याख्यायित और पुनर्मूल्यांकित किए जाने से हिचकती नहीं है, जो हर स्थिति में अग्रगामिता की हिमायती और एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखने की तलबगार होती है।

ऐसी संघर्ष-क्षमता या चेतना बहुत सतर्क और सुपरीक्षित वैचारिकता या कि विचारधारागत अंतर्दृष्टि से आती है। जाति, वर्ग और जेंडर; इन तीनों स्तरों पर समग्रता और समेकन करती है। यानी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक आदि स्तरों पर अभेद, असमानता और अन्याय से व्यापक और संपूर्ण मुक्ति। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के निर्माण का स्थायी और अनवरत रास्ता संभवत: एकमात्र यही है, जिस पर चल कर पूरी तरह निश्चिंतता अपनाई जा सकती है।
राष्ट्रीय एकता के निर्माण में स्त्री की क्या भूमिका हो सकती है, यह प्रश्न और बहुत सारे दूसरे प्रश्नों को पैदा करता है और उनसे गहरे अंतर्संबद्ध है। मसलन, इनमें से सबसे पहला प्रश्न तो यही है कि हमारे यहां राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्ति-संतुलन में जेंडर के आधार पर क्या और कितना भेदभाव है?

देश के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्ति-स्रोत कहां हैं? इन शक्ति-स्रोतों पर कौन कुंडली मारे बैठा है? उसके पीछे तर्क-प्रक्रिया क्या है, उसे वैधता कहां से मिली है? इस पूरी कवायद का कुल परिणाम क्या है, इसके नफा-नुकसान क्या रहे।
जब तक इन प्रश्नों का जवाब नहीं मिलता तब तक हम यही मानते हैं कि स्त्री का इन सारी चीजों से क्या लेना-देना! उसका काम है, घर की देखभाल करना, पति-सेवा के साथ-साथ घर के हर सदस्य का ध्यान रखना, घर और उसके हितों के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर देना और बदले में कोई प्रतिदान न चाहना। वह चाहे कथित तौर पर गृहिणी हो या कामकाजी; प्राथमिक तौर पर उसका दायित्व यही है। कामकाजी स्त्रियां तो दुतरफा दायित्व-निर्वाह की चक्की में पिसती हैं और हमेशा आधी इधर और आधी उधर बंटी रहती हैं। वे इस कदर व्यस्त रहती हैं कि राजनीति, समाज, अर्थशास्त्र आदि विषय उन्हें गैरजरूरी लगते हैं और इनके प्रति अपना कोई सरोकार उन्हें महसूस ही नहीं होता। और संयोग से किसी स्त्री को यह अनुभव होता भी है तो वह इस कदर पिछड़ी होती है कि उसे अद्यतन होने में ही बहुत सारा समय बेकार करना पड़ जाता है।

वे स्त्रियां दूसरी होती हैं, जो समय के समांतर हर समय अपडेट होती हैं और देश में आए दिन चलने वाली बौद्धिक बहसों, प्रतिरोधी कार्यक्रमों, सत्ता में हस्तक्षेपकारी गतिविधियों में संलग्न रहती हैं। इन स्त्रियों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ती ह। वहां न कथित परंपरागत घर है, न उसकी कथित सुरक्षात्मकता, न कथित पे्रम या दांपत्य की स्थितियां हैं, न स्थिरता। इतिहास, कथित सभ्यता और धर्मशास्त्रों ने स्त्री के साथ यही तो किया है कि उसकी सारी सृजनशीलता को एक तरह के ठसपन के नीचे दफ्न करते हुए हमेशा के लिए उसे एक मादा में तब्दील करने का महाभियान चलाया है। आज की स्त्री ने इस अभियान का और ज्यादा हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है।

अगर किसी स्त्री को राष्ट्र की मुख्यधारा में आना है और अपनी स्वतंत्र हैसियत में कुछ योगदान करना है तो यह आवश्यक है कि वह पितृसत्तावादी छूत से पूरी तरह मुक्त हो और एक संपूर्ण नागरिक की तरह राष्ट्र की गतिविधियों में शामिल हो सके।
राष्ट्रीय एकता को खंडित करने वाले सबसे केंद्रीय अवयव हैं, जातिवाद आधारित विभेद और ऊंच-नीच, वर्ग आधारित वैषम्य और शोषण तथा लिंगीय भेदभाव और अन्याय-अत्याचार। इनके अलावा उपराष्ट्रीयताएं, क्षेत्रवाद, उपजातिवाद, कबीलावाद आदि कुछ ऐसी बीमारियां हैं, जो अच्छे-अच्छे राष्ट्रों को अंदर ही अंदर खोखला करती चलती हैं।

भारत में दो सबसे बड़ी बीमारियां हैं। एक, धार्मिक कट््टरता; जिसे अन्य शब्दों में संप्रदायवाद कह सकते हैं और दूसरी, जातिवाद। साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी ताकतों ने लगातार इनका फायदा उठाया है। भारतीय समाज में स्त्री के समाजीकरण/ संस्कृतीकरण की प्रक्रिया की प्रकृति पर गौर करें तो कहा जा सकता है कि अधिकतर स्त्रियां मां बनने की उम्र तक मौजूदा और परंपरागत पितृसत्तात्मक अभिकल्पों की मुरीद हो जाती हैं। पुरुष-सत्ता स्त्री के कंधे पर बंदूक रख कर स्त्री को निशाना बनाती है, चाहे वह भ्रूण-हत्या हो, दहेज या अन्य कारणों से युवा स्त्रियों (बहू आदि) को जिंदा जलाना हो, चाहे बहू या पुत्री पर दूसरे तरह की हिंसा या नियंत्रण हो।

हमारे यहां महिलाओं को बकायदा सांगठनिक तौर पर जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र आदि की सीमाओं में बांध कर रखा गया है, जिनके संचालन-सूत्र कथित और ऊपरी तौर पर तो स्त्रियों के हाथों में हैं, लेकिन दरअसल होते वे उस जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र आदि से जुड़े महीयान शक्ति-पुरुषों के हाथों में। सारी नीतियां, कार्यक्रम, एजेंडा, योजनाएं पुरुष या उनकी सोच में ढली महिलाएं बनाती हैं और बाकी सारी सामान्य स्त्रियों के लिए उन्हें अनुकरण के लिए जारी कर दिया जाता है। यही कारण है कि इन स्त्रियों को पता भी नहीं होता कि उन्हें आगे करना क्या है। राष्ट्रीय एकता की बात तो बाद की चीज है।

निश्चय ही यह परिदृश्य बदल सकता है और सचमुच स्त्रियां जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र आदि की संकीर्णताओं से मुक्त हो सकती हैं, अपनी संततियों को नए संस्कार दे सकती हैं, बशर्ते उन्हें मौजूदा सामाजिकीकरण/ संस्कृतीकरण, नियंत्रण की यौन-राजनीति से मुक्त कर दिया जाए। लेकिन ऐसा हो कैसे पाएगा? क्योंकि ऐसा करते ही स्त्रियां अपना अलग व्यक्तित्व निर्मित करने लगेंगी और राष्ट्र की मुख्यधारा में आने लगेंगी।

और, यह एक कड़वी सच्चाई है कि जिस दिन स्त्रियां उत्पादन की प्रक्रिया में सीधे-सीधे शामिल होने लगेंगी, पुनरुत्पादकता के स्थान पर उनकी उत्पादक-क्षमता को महत्त्व दिया जाने लगेगा, स्त्री-एक्टीविज्म को मान्यता दी जाने लगेगी; उनका स्वतंत्र व्यक्तित्व बनना शुरू हो जाएगा और राष्ट्र-निर्माण और राष्ट्रीय एकता के निर्माण में पुरुष से दुगुनी-तिगुनी बड़ी भूमिका वे निभाने लग जाएंगी।
हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि कुछ क्षेत्रों में स्त्रियों ने स्त्री-एक्टिविज्म की पहल की है और इसके बहुत ही सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं और पूरा समाज इससे लाभान्वित हुआ है। अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी पहल की जरूरत है।

शंभु गुप्त

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