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कभी-कभार: मौन का अस्फुटन

यों तो कला और कलारचना के अनेक लक्ष्य और प्रक्रियाएं होती हैं, मोटे तौर पर उनमें यह सामान्य विभाजन किया जा सकता है: कला जो किसी ज्ञात-अज्ञात तक पहुंचना चाहती है और उसके अनुरूप शिल्प खोजती-गढ़ती है और वह कला, जो कहीं पहुंचना नहीं चाहती और जो निरंतर खोज होती है। पहले किस्म की कला […]
Author May 3, 2015 16:16 pm

यों तो कला और कलारचना के अनेक लक्ष्य और प्रक्रियाएं होती हैं, मोटे तौर पर उनमें यह सामान्य विभाजन किया जा सकता है: कला जो किसी ज्ञात-अज्ञात तक पहुंचना चाहती है और उसके अनुरूप शिल्प खोजती-गढ़ती है और वह कला, जो कहीं पहुंचना नहीं चाहती और जो निरंतर खोज होती है। पहले किस्म की कला परिणति की कला है, दूसरे किस्म की कला प्रक्रिया की। परिणति की कला कुछ कहना चाहती है और उस कहे हुए को कैसे सुघरता और सूक्ष्मता से कहा जाए इसका जतन करती है: अपने अन्वेषण के दौरान या उसके समापन पर वह कुछ ऐसा भी कभी-कभी कह जाती है, जो उसका अभीष्ट न था। प्रक्रिया की कला कुछ कहने की जिम्मेदारी से मुक्त होती है: वह कुछ न कहने का जोखिम भी सहज उठा लेती है- वह अज्ञात से शुरू होकर अज्ञात पर ही संपन्न होती है। उसके लिए शिल्प कुछ कहने या कह पाने का माध्यम या मार्ग नहीं है: उसके लिए शिल्प खोज है, निरंतर और असमाप्य। एक तरह से उसमें प्रक्रिया ही परिणति है, खोज ही मंजिल है।

इन दिनों हौजखास गांव में स्थित आकार प्रकार कला-वीथिका में मनीष पुष्कले के ताजा चित्रों की जो प्रदर्शनी चल रही है उसका शीर्षक है: ‘अज्ञात स्मृतियों का एक संग्रहालय’। उसमें जो चित्र शामिल हैं उन्हें जिन अवधारणाओं से समझा-सराहा जा सकता है वे हैं स्मृति, मौन, खोज। संभवत: बीज अवधारणा होगी मौन। हमारे समय में कलाएं भी बहुत शोरगुल, चीख-पुकार करती विधाएं हैं। ऐसा वे ध्यानाकर्षण भर के लिए करती हों, ऐसा नहीं है। उनकी अहर्निश मुखरता इस दबाव में होती है कि अगर आपके पास कुछ उग्र, क्षुब्ध-वाचाल कहने को नहीं है तो आपको कोई सुनेगा-देखेगा नहीं। इस आपाधापी के बरक्स मनीष की कला कुछ कहने से संकोच करती है। हमारे पास कुछ तत्त्व का कहने को कितना कम या लगभग नहीं होता! वह विस्फोट की नहीं, अस्फुटन की भाषा में रची गई कला है। उसमें मौन अपने विनय में स्मृति की अंतर्ध्वनियों से बुना-गुंथा तो है, पर बोलने से संकोच करता है।

वागर्थ की यह अल्पता साहित्य में सेमुएल बैकेट और कला में वासुदेव गायतोण्डे की याद दिलाती है। उनके यहां भी विवक्षा के अपव्यय से हटने की जिद है। संकोच किसी तरह की असमर्थता से नहीं उपजा; वह सारे कलाकौशल को विनय में अवस्थित करने का जतन है। मनीष की पिछली कलाकृतियों से यह प्रयत्न अपनी निरंतरता में देखा-समझा जा सकता। अपने माध्यम, शैली और सामग्री पर उनका अधिकार अब अधिक गहरा और सशक्त है। उनके रंगसंयोजन, रंगों की अनेक तहों में अधिक सुघर-सघन लालित्य है। अपने कुछ कहने से विरत होने की विडंबना का अहसास भी है। यह प्रदर्शनी अंतत: ऐसा संग्रहालय है, जिसमें स्मृतियां अज्ञात रहते हुए भी मुक्त हैं: वे दृश्य के भूगोल में आकर भी नहीं आतीं। वे न चित्रों पर बोझ हैं, न दर्शकों पर। वे मौन का अस्फुटन हैं।

‘राम, तुम्हारी रंगभूमि में…’

जबसे रामजन्मभूमि आंदोलन की राजनीति ने उग्रता, व्याप्ति और एक तरह की केंद्रीयता पा ली है, राम के बारे में वस्तुनिष्ठ भाव से सोच-विचार संभव नहीं रह गया है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि राम इतिहास की नहीं, संस्कृति की रचना हैं: वे इतिहास पुरुष नहीं, महाकाव्य पुरुष हैं। यह भी हमें याद नहीं रहता कि राम के अनेक रूप और संस्करण हैं: वे मौजूद हैं और संभव भी। अनेक रामायणें हैं और अनेक रामकथाएं। वाल्मीकि, भवभूति, कालिदास से लेकर तुलसीदास, कंबन, जैन आदि के राम अलग-अलग हैं। राम विजड़ित, स्थिर-स्थाणु, समय में बद्धमूल नहीं रहे हैं: उनकी परिवर्तनशीलता उनको प्रासंगिक बनाती रही है। वे प्रश्नातीत और विवादातीत भी नहीं रहे हैं: ‘उत्तररामचरित’ से लेकर अवधी और मिथिला की लोकपरंपरा उन्हें प्रश्नांकित करती रही हैं। कविता दिव्यता को मानवीयता में, आस्था को प्रश्नवाचकता में और चमत्कार को संभाव्यता में बदलती है। संस्कृत से लेकर आधुनिक काल तक कविता यही करती रही है।

बड़ी विडंबना यह है कि राम की अपनी संस्कृति और संस्कृति में उनकी गतिशील स्थिति का, उनके नाम पर की जा रही राजनीति से कोई मेल नहीं बैठता। दरअसल, अपनी दृष्टि और व्यवहार दोनों में यह राजनीति राम की समरसता, न्यायबुद्धि, मर्यादा और सम्यकता के विरुद्ध रही है। राम के नाम पर दंगे, हिंसा, विध्वंस, विद्वेष आदि सभी तत्त्वत: राम-विरोधी कार्रवाइयां हैं: राम की पूरी परंपरा से इनको किसी भी तरह उचित ठहराया ही नहीं जा सकता। तुलसीदास ने ‘रावण रथी, विरथ रघुवीरा’ वर्णन किया था और कुछ बरस पहले एक राजनीतिक सूरमा रथ पर चढ़ एक मस्जिद का ध्वंस करने गए थे। राम को इतिहासपुरुष में बदलने की चेष्टा वस्तुत: भारतीय परंपरा और संस्कृति की औपनिवेशिक समझ का दुष्परिणाम और नमूना है। हम यह भी भूल जाते हैं कि दशावतारों में अकेले बुद्ध ही इतिहास से गए हैं, बाकी सभी मिथकों या महाकाव्यों से आए हैं।

यह भी नोट करना चाहिए कि राम-परंपरा एक अटूट परंपरा है: वह काव्य-नाट्य-नृत्य-संगीत में, उनके शास्त्रीय और लोकरूपों में, चित्रकला में मिनिएचर से लेकर मकबूल फिदा हुसेन की रामायण चित्रावली, लोहिया द्वारा कल्पित रामायण मेला आदि तक फैली है, रामलीला और रामकथा प्रवचन आदि को मिला कर। अकबर के दरबार में जो मुगल शैली विकसित हुई वह ‘रामायण’ के फारसी अनुवाद की पांडुलिपि को चित्रित करने के सिलसिले में थी। ये सभी राम की व्याप्ति और समावेशिता के साक्ष्य हैं।

इन दिनों पर्यावरण का नया बोध जागा है: रामकथा तो उसके अनेक पक्षों से वाबस्ता रही है। पत्तियों और पक्षियों से ‘तुम देखी सीता मृगनैनी’ पूछने वाले राम के संसार में प्रकृति की उपस्थिति और सक्रियता निर्णायक है। शबरी, केवट से लेकर हनुमान, जामवंत, काकभुशुंडी, सुग्रीव, बंदर, भालू आदि उनकी विराट मानवीयता के हिस्से हैं।

यह दुर्भाग्य है कि ऐसे राम, उसकी संस्कृति, गांधी द्वारा कल्पित रामराज्य को दूषित-विकृत कर, उनकी अनेक दुर्व्याख्याएं की जा रही हैं और ऐसी शक्तियां राजनीति और सत्ता में सक्रिय हैं। जैसे हिंदू धर्म को सबसे अधिक खतरा हिंदुत्व नामक प्रवृत्ति की अवधारणाओं और व्यवहार से है वैसे ही राम को खतरा राम के नाम पर सामाजिक समरसता और सौहार्द को भंग करने के सुनियोजित प्रयत्न करने वालों से है। मैथिलीशरण गुप्त ने दशकों पहले लिखा था: ‘तुम निरखो हम नाट्य करें/ राम, तुम्हारी रंगभूमि में कहो कौन-सा रूप धरें?’ उन्होंने नहीं सोचा होगा कि राम को अपनी रंगभूमि को ऐसे रंक्तरंजित और कलुषित देखना होगा। गांधीजी तो अपनी हत्या पर ‘हे राम’ कह सकते थे। लेकिन क्या मृत्युंजय राम अपने ऊपर इन प्रहारों के उत्तर में कह रहे होंगे: ‘हे गांधी’। या कि ‘हे वाल्मीकि, हे तुलसी, हे गांधी!’

 

सौ के निकट ‘पहल’

इधर जब ‘पहल’ पत्रिका का ताजा अंक पलट रहा था तो इस ओर ध्यान गया कि यह उसका निन्यानबेवां अंक है: वह जल्दी ही सौ तक पहुंच जाएगी। इतनी लंबी यात्रा सिर्फ ‘पहल’ के लिए नहीं, हिंदी समकालीनता के लिए भी बड़ी सार्थक यात्रा रही है। हालांकि जिस विचारधारा का वह इस लंबे दौर में प्रतिपादन-पुष्टि-समर्थन आदि करती रही है उसमें व्यक्ति का विशेष महत्त्व नहीं होता, सच तो यही है कि वह एक ऐसी पत्रिका है, जो कई स्तरों पर उसके संपादक कथाकार ज्ञानरंजन से ही अपनी शिनाख्त पाती रही है। बिना किसी सार्वजनिक साधनों के और कई तरह की कठिनाइयों का लगातार सामना करते हुए इस वरिष्ठ कथाकार ने बहुत बड़ी संख्या में नए युवा लेखकों को पहचाना, जगह और अवसर दिए और अनेक किस्म के नए प्रयत्नों को बहुत जतन और जिम्मेदारी से प्रोत्साहित किया है। ऐसा कम ही हुआ है कि एक कथाकार अपनी रचनाओं से जितना जाना जाएगा उतना ही अपने संपादन और पत्रिका के लिए: ज्ञानरंजन इस अर्थ में एक अद्वितीय नाम है।

रचनाओं के अलावा आलोचना के क्षेत्र में भी अनेक नए नाम पहले पहल ‘पहल’ से ही उभरे। ज्ञानरंजन ने अपने मनपसंद और विचारधारापसंद लेखों और कृतियों पर अनेक युवा आलोचकों को गंभीरता, विशद अध्ययन और जिम्मेदारी से लिखने के लिए प्रेरित किया। हालांकि वह मुख्य रूप से आलोचना और विचार की पत्रिका नहीं है, इन क्षेत्रों में उसका लगातार योगदान और सक्रियता अलक्षित नहीं जाने चाहिए। हमारे विचारधाराग्रस्त समय में अधिकांश प्रतिबद्धताएं कमोबेश औपचारिक और अवसरवादी ही रही आई हैं। लेकिन ज्ञानरंजन में यह प्रतिबद्धता अटूट और अक्षुण्ण रही है। साहित्य और विचारधारा के लिए उनके जैसा पैशन अन्यत्र दुर्लभ है। किसी बल्कि किन्हीं युवाओं को अब यह करना चाहिए कि वे ‘पहल’ के सौ अंकों में से अनेक विधाओं की सामग्री चुन कर संचयन बनाएं। ऐसे संचयन ‘पहल’ के योगदान को अधिक टिकाऊ बनाने की ओर अच्छे कदम होंगे।

अशोक वाजपेयी

 

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