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मुखरता और मौन का संयम

नंदकिशोर आचार्य का कविता संसार एक चिंतक कवि के अंत:-बाह्य उद्वेलनों का उदाहरण है।
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नंदकिशोर आचार्य का कविता संसार एक चिंतक कवि के अंत:-बाह्य उद्वेलनों का उदाहरण है। अपने नए संग्रह आकाश भटका हुआ में वे जीवन जगत के नित्य परिवर्तित क्रिया-व्यापार को हर पल निहारते और संवेदना के बहुवस्तुस्पर्शी आयामों में उसे उद्घाटित करते हैं। उनके यहां कविता जिन चाक्षुष दृश्यों में सामने आती है, उसके नेपथ्य में भूमंडल की महीन से महीन आहट होती है। उनकी कविता में बिंब जलतरंग की तरह बजते हैं। कविता अर्थ से ज्यादा प्रतीति में ध्वनित होती है। प्रतीति से ज्यादा गूंज और अनुगूंज में। उनके शब्द मौन में बुदबुदाते से प्रतीत होते हैं- मौन के संयम की गवाही देते हुए और अपनी मुखरता में सम्यक अनुशासित। मौन को वे किस रूप में देखते हैं: ‘यह जो मूक है आकाश/ मेरा ही गूंगापन है/ अपने में ही घुटता हुआ/ पुकार लूं अभी जो तुमको/ गूंज हो जाएगा मेरी।’
ये कविताएं जहां अनुभव के उपार्जन से निकली सदूक्तियों जैसी हैं, जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों के सारांश जैसी हैं। वहीं ये अपने ही प्रतिरूप सरीखे प्रियजन से संवाद भी करती हैं। ऐसी ही एक कविता: ‘न सही तुम्हारे दृश्य में/ मैं कहीं/ दृश्य से थक कर/ जब जब मुदेंगी आंखें/ पाओगी मुझको वही।’
बहुत बोलने वाली कविता उन्हें स्वीकार्य नहीं है। अकारण नहीं कि बार-बार आचार्य खामोशी की ओर लौटते हैं और उसमें डुबकी लगाते हुए एक विरल अर्थ खोज लाते हैं। वे सवाल करते हैं: ‘और क्या होता है होना/ कविता होने के सिवा…/ एक लय चुप कर देती है अपनी खामोशी में लेती हुई मुझे।’
कृतज्ञ है शिला, उसी हवा में और आस्मां ने अपने में- खंडों में फैले इस पूरे संग्रह में यह गूंज, अनुगूंज, यह संयमित मुखरता, मौन आद्यंत व्याप्त है। कविता में जो कुछ है वह जीवन ने दिया है। जीवनानुभवों ने दिया है। जिंदगी की चुभन से कविता निकलती है। जीवन को तभी तो वे आड़े हाथों लेते हैं।
यों हर कवि की कविता ही अपनी पारिभाषिकी रचती है। वही कवि का आत्म वक्तव्य होती है। दुनिया के महान से महान कवियों ने कविता को अपने तरीके से देखा-समझा है। आचार्य कविता को किस तरह देखते हैं, इसे उन्होंने ‘वही है कविता’ में व्यक्त किया है। दो के बीच की खामोशियां जिस बिंदु पर एक साथ मिलती हैं- एक-दूसरी से अपनी व्यथाएं साझा करने के लिए- वही है कविता- खामोशियों की व्यथा- आचार्य कहते हैं। इस समझ का एक दूसरा पहलू भी है। कविता में शब्द हर कोई अपनी तरह बरतता है, पर शब्द की बेकली अपने को पाने के लिए होती है- आचार्य कहते हैं: ‘वही है कविता। बाकी सब पता नहीं, क्या है।’
इस संग्रह में आचार्य की दो कविताएं हैं- ‘खयाल हक है’ और ‘नीड़ में’। उनकी कविताओं के मिजाज को इन कविताओं से पकड़ा जा सकता है। इनमें वे कहते हैं: ‘तुम्हारे सूने में रमता ख्याल हूं।’ या ‘तुम्हारे खयालों के नीड़ में बैठा उड़ता रहता हूं मैं।’ ये कविताएं ऐसे रमते हुए खयाल की कविताएं हैं। खयालों के नीड़ में बैठे कवि की कविता है। वे बारिश में दग्ध होते पेड़ के विपरीत जख्मों के हरे होने का सबब खोजते हैं, तो यह अनुभव भी करते हैं कि हर मौसम को यानी खिलने से झरने तक को अपने भीतर महसूस करना ही एक पेड़ होना है। हरे-भरे होने से कोई पेड़, पेड़ नहीं होता।
नंदकिशोर आचार्य जिस जमीन से ताल्लुक रखते हैं, वह राजस्थान की रेतीली धरती है। सो, उनके यहां जल, नदी, बारिश, पेड़, पावस और हरे आदि का जैसा जिक्र होता है उसकी तासीर अलग-अलग होती है। यहां वसंत भी अलग तरह से आता है। पावस, पतझड़ का बिंब भी आता है, पर जहां कहीं संयोग से मरुथल से एक दृश्य भर की हरियाली भी खिल उठती है, वह कवि के चाक्षुष फ्रेम में आ बसता है। हल्की-सी बारिश से हरापन ही नहीं, किसी की याद का दर्द भी खिल कर हरा हो उठता है। खिलने, मरने, जीने, बारिश, पतझड़, उड़ान भरने और बिछड़ने-मिलने तक के कितने ही प्रतीक आशय गरिमामय ढंग से उनकी कविता में आते हैं।
आचार्य के यहां जल और जल-संकट को लेकर जितने बिंब और अनुगूंजें मिलेंगी, उतनी शायद अन्य कवियों में नहीं। अचरज नहीं कि कविता के सरोवर में आचार्य के उतरने का पहला साक्षी ‘जल है जहां’ रहा है, जो कि उनका पहला संग्रह ही नहीं, कविता में उनकी प्राथमिक पैठ का परिचायक भी है। उनके भीतर अक्सर अवसान, मृत्यु और उदासियों का लगभग वैसा ही सुपरिचित वातावरण मिलता है, जैसा प्राय: कलावादियों के यहां। पर यह अच्छी बात है कि उनके यहां समकालीनों जैसी स्थूलता के दर्शन नहीं होते, बल्कि प्रकृति, स्वभाव, पंचभूतों और फैले हुए अछोर जीवन के छोटे से छोटे क्षण-कण बीनते-बटोरते हुए वे एक ऐसी अर्थच्छटा बिखेर देते हैं जैसे धरती पर हास बिखेरती चांदनी या आकाश में उजास फेंकती तारावलियां। उनकी कविताओं में अनुभूति के हर लम्हे को महसूस किया जा सकता है। इन कविताओं के बिंबबहुल संसार में कहीं झरे पत्तों की सुलगन है, मन के अतल अंधियारे हैं, सघन कोहरे को चीरती चिड़ियों की आवाज है, आकाश में बदलती पुकार है, धरती के साज पर बारिश की अनुगूंजें हैं, ओठों की कोरों में कांपती स्मिति-सी किरणाभा है, आवाज की बारिश में भीगना है, अपनी कविताओं में भी उसी की अनुगूंजों को सुनना है।
कुल मिलाकर आचार्य की कविता सूनेपन में एक अनुगूंज की तरह है और अनुगूंज में एक सूनेपन की तरह। पर अगर उनकी कविता में शब्द अपना होना ढूंढ़ते हैं, अपनी बसावट ढूढ़ते हैं तो शायद शब्दों की नियति भी यही है कि वे कविता के सही पते पर पहुंच सकें। यहां उर्दू शायरी की सोहबत भी नजर आती है और दार्शनिक अभिप्राय भी। प्रेम और अनुराग की संयत पदावली भी मिलेगी। वे अपनी कविताओं में मानवीय सुगंध का एक कोना हमेशा बचाए रखते हैं। सच तो यह है कि आज की अति मुखर कविता के शब्दारण्य में उनकी कविता आत्मा के उपचार की तरह है, जिसकी जरूरत आज सबसे ज्यादा है।
ओम निश्चल
आकाश भटका हुआ: नंदकिशोर आचार्य; वाग्देवी प्रकाशन, पॉलीटेकनिक कॉलेज के पास, बीकानेर; 170 रुपए।

 

 

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