April 23, 2017

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दूसरी नज़र: जनादेश के बाद की उम्मीद

इस स्तंभ को एक दिन देर से भेजने की इजाजत मैंने संपादकों से ले ली थी, ताकि पांच राज्यों के चुनाव नतीजों का जायजा ले सकूं।

Author March 12, 2017 04:46 am
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जीत का जश्न मनाते भाजपा कार्यकर्ता। ( Photo Source: PTI)

इस स्तंभ को एक दिन देर से भेजने की इजाजत मैंने संपादकों से ले ली थी, ताकि पांच राज्यों के चुनाव नतीजों का जायजा ले सकूं। यह जरूरी था, साथ ही समझदारी भरा निर्णय भी। इसमें दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा को जैसी जीत हासिल हुई है उससे यह बात एक बार फिर साबित हुई कि नरेंद्र मोदी आज देश में सबसे प्रभावी राजनेता हैं। इन दो राज्यों में भाजपा को जो भारी जीत मिली है वह अप्रत्याशित और विस्मयकारी है। किसी को भी इसका आभास नहीं था- जब तक एग्जिट पोल के आंकड़े नहीं आ गए। इस बार मुझे स्वीकार करना होगा कि चुनावी पंडित सही और (प्रशांत किशोर की टीम समेत) चुनावी रणनीतिकार गलत साबित हुए, जो कि बिहार के अनुभव से उलटा है! पंजाब ने भी अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस को स्पष्ट जनादेश दिया है। अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के राहुल गांधी के निर्णय ने सारी शंकाएं दूर कर दीं और मतदाताओं को एक ऐसा जाना-पहचाना नाम मिला, जिस पर वे दस साल का कुशासन झेलने के बाद भरोसा जता सकते थे। जब मैंने शनिवार को शाम चार बजे इस स्तंभ को पूरा किया, मणिपुर और गोवा मिश्रित नतीजे देते लग रहे थे। छोटी विधानसभाओं वाले छोटे राज्यों में जब त्रिशंकु विधानसभा आकार लेती है तो यह उन राज्यों में सुशासन के लिहाज से ठीक नहीं होता।

चतुर रणनीति
यह समय नरेंद्र मोदी का है। उन्होंने असंदिग्ध रूप से यह साबित कर दिखाया है कि उनका प्रभाव अखिल भारतीय है। यह गुजरात और गोवा से लेकर असम और मणिपुर तक है। बिहार में फिसलने के बाद वे फिर से अपनी रौ में आ गए हैं, यह साबित करते हुए कि लोगों के गले अपनी बात उतारने में उनका कोई सानी नहीं है। 2014 में उनका संदेश था विकास; 2017 में उन्होंने बड़ी चतुराई से उस संदेश को बना दिया है विकास+, अब बहस इस पर होगी कि वह मायावी और अबूझ चीज क्या है जिसे उन्होंने अपने संदेश में जोड़ा है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के ‘सब’ को उन्होंने बड़ी होशियारी से बदल कर उसमें कुछ वर्गों को सम्मिलित किया है और बाकी को बाहर कर दिया है।

उत्तर प्रदेश इस नए, बदले हुए संदेश को आजमाने की प्रयोगशाला थी। इसे पूरी कुशलता से आजमाया गया। लंबे समय से जातियों के आधार पर विभाजित और शोषित समाज में, जहां कि सतह के नीचे धार्मिक वैमनस्य बना रहता हो, भाजपा ने विभिन्न जातियों का हिंदुत्वकरण करने तथा उन्हें गैर-हिंदुओं से दूर करने (उत्तर प्रदेश के संदर्भ में मुसलिमों से) की कोशिश की। संदेश बारीकी से दिया गया- कब्रिस्तान के लिए जमीन दी जाए, तो समान रूप से श्मशान के लिए भी। ईद पर बिजली मिले, तो दीवाली पर भी। तथ्यों को खंगाला गया तो आरोपित भेदभाव का कोई उदाहरण सामने नहीं आया, मगर जब सुप्त पूर्वाग्रह और द्वेष भड़का दिए जाते हैं, तो तथ्य मायने नहीं रखते। भाजपा ने अपना निशाना तय कर लिया था, और उसके सबसे धुरंधर प्रचारक पूरी रौ में थे, और नतीजों ने साबित कर दिखाया है कि भाजपा के रणनीतिकार अपनी जगह सही थे।

उत्तर प्रदेश आबादी में ब्राजील के बराबर है। उत्तर प्रदेश में मुसलिम आबादी कई मुसलिम बहुल देशों से अधिक है। फिर भी, भाजपा को 403 सीटों में किसी एक सीट के लिए भी मुसलमानों में से कोई उम्मीदवार होने लायक नहीं लगा! संदेश साफ था: मुसलिम हमें वोट नहीं देंगे या हमारा समर्थन नहीं करेंगे, इसलिए हमें मुसलिम उम्मीदवार उतारने या मुसलमानों का साथ देने की जरूरत नहीं है। संदेश मुसलमानों के लिए उतना लक्षित नहीं था जितना उन जातियों के लिए जिन्हें ‘हिंदुत्व’ के झंडे के नीचे लाना है। मैं मानता हूं कि लगभग तीन साल प्रधानमंत्री रहने के बाद भी नरेंद्र मोदी चुनावी लड़ाई के अथक सेनापति बने हुए हैं। वे मूलत: प्रचारक हैं और प्रचार उन्हें बहुत रास आता है। वे परिपाटी और पुरानी समझदारी को ताक पर रख पूरे तीन दिन अपने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में डेरा डाले रहे। चूंकि उन्होंने जबर्दस्त चुनावी कामयाबी दिलाई है, इसलिए मुझे लगता है कि शायद ही कोई उनके इस रंग-ढंग पर उंगली उठाए।

नतीजों को स्वीकारना

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के अपने निहितार्थ हैं।बिहार चुनाव के ऐन पहले मैंने कहा था कि ‘जीते या हारे, भाजपा दो में से कोई एक दिशा चुन सकती है।’ मुझे उम्मीद थी कि वह थोड़ा ठहर कर हालात का जायजा लेगी, एक कदम पीछे हटेगी और देश को विकास के रास्ते पर ले जाएगी। भाजपा/सरकार ने वैसा नहीं किया। वह अति-राष्ट्रवाद के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में लग गई, जिसके स्वयंभू प्रतिनिधि हर जगह नजर आने लगे- सार्वजनिक स्थलों पर, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में (और हाल में तिरुवनंतपुरम की सड़कों पर भी)। दलित, धार्मिक अल्पसंख्यक, युवा लड़कियां, स्त्रियां, समलैंगिक, स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, शिक्षाविद और लेखक किसी न किसी हद तक भय में जी रहे हैं। इन विचलनों का नतीजा यह है कि सरकार ने अपना ध्यान अर्थव्यवस्था के तकाजों से हटा लिया है।

नियंत्रण रेखा पर तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक, कश्मीर घाटी में निर्मम, सैन्यवादी नीति और नोटबंदी मुख्य व्यवधान थे। मैं स्वीकार करता हूं कि जनता के बड़े हिस्से का प्रधानमंत्री की इस बात पर भरोसा है कि अस्त-व्यस्त कर देने वाली ये नीतियां लंबे समय में हितकारी साबित होंगी, और मैं अल्पमत में हूं। पर तथ्य यह है कि जीवीए यानी उत्पादित वस्तुओं तथा सेवाओं के सम्मिलित मूल्य के कुल योग (सरकार द्वारा समर्थित) द्वारा मापी गई अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2015-16 की आखिरी तिमाही से धीमी पड़ चुकी है। पिछली चार तिमाहियों में (यानी कैलेंडर वर्ष 2016 में) जीवीए की वृद्धि दर थी: 7.83, 6.89, 6.69 और 6.61 फीसद। अब भी मैं यह उम्मीद करता हूं कि भाजपा/सरकार कुछ ठहर कर सोचेगी और देश को सुशासन तथा सर्व-समावेशी विकास के रास्ते पर ले जाएगी। हम उम्मीद करते हैं कि नए रोजगार सृजित होंगे, निवेश होगा, किसानों को उनकी उपज के बेहतर दाम मिलेंगे, आय का स्तर बढ़ेगा, गरीबों के लिए कल्याण योजनाएं लागू की जाएंगी, और यह कि हम एक खुला, आजाद, उदार और लोकतांत्रिक समाज बने रहेंगे।

 

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First Published on March 12, 2017 4:46 am

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