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दूसरी नजर: गरीब सपने न देखें

वर्ष 2005 में मैंने तथाकथित शिक्षा-ऋण नीति की पड़ताल शुरू की। मैंने पाया कि ये ऋण गरीबों को अमूमन नहीं मिल पाते थे। गरीबों में से कुछ को ही कॉलेज में दाखिला मिल पाता था, या तो वहां उपलब्ध कुछ छात्रवृत्तियों के सहारे, या संपत्ति के नाम पर उनके पास जो कुछ होता था
Author July 23, 2017 04:01 am
स्कूल जाते बच्चे (फाइल फोटो)

हर चीज के लिए सरकारी नीति बनी होती है। यह बहुधा तकनीकी शब्दों से भरी अर्थहीन पदावली होती है। उदाहरण के लिए, 1991-92 से पहले की आयात-निर्यात नीति को देख सकते हैं। लिहाजा, सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का यह दावा अचरज का विषय नहीं था कि वे शिक्षा-ऋण भी देते हैं। व्यावहारिक हकीकत को छोड़ दें, तो उनकी बात सही थी। बैंकों द्वारा दिए गए शिक्षा-ऋण बहुत कम थे। बैंक हमेशा जमानत के रूप में अचल संपत्ति के कागजात मांगते थे। इसलिए समृद्ध परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों को ही शिक्षा-ऋण मिल पाता था, क्योंकि वही ऐसे कागजात पेश कर जरूरी आश्वस्ति दे सकते थे। नतीजतन, इस नीति या योजना से गरीब बाहर ही रहे।
गरीब बाहर कैसे हुए
वर्ष 2005 में मैंने तथाकथित शिक्षा-ऋण नीति की पड़ताल शुरू की। मैंने पाया कि ये ऋण गरीबों को अमूमन नहीं मिल पाते थे। गरीबों में से कुछ को ही कॉलेज में दाखिला मिल पाता था, या तो वहां उपलब्ध कुछ छात्रवृत्तियों के सहारे, या संपत्ति के नाम पर उनके पास जो कुछ होता था उसे बेच कर- आमतौर पर यह जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा होता था या कुछ गहने होते थे। बैंकों के शीर्ष प्रबंधकों ने शाखा प्रबंधकों को शिक्षा-ऋण मंजूर करने से रोक रखा था और हिदायत दे रखी थी कि इस तरह के आवेदन पात्रता-आकलन व निर्णय के लिए क्षेत्रीय कार्यालय या मुख्यालय को भेज दिए जाएं।
बैंक प्रबंधक अमूमन इस आधार पर अर्जी खारिज कर देते थे कि आवेदक का निवास-स्थान या कॉलेज, बैंक-शाखा के सेवा-हलके में नहीं आता। अगर कोई अध्यवसायी आवेदक सारी बाधाएं पार कर लेता, तो इनकार का आखिरी हथियार था संपत्ति के कागजात मांगना। अगर विद्यार्थी किसी तरह यह शर्त पूरी कर देता, तो किसी अस्पष्ट नियम का हवाला देकर आवेदन में मांगी गई राशि का एक अंश ही मंजूर किया जाता था।
हमने उस स्थिति को आग्रहपूर्वक और सुचिंतित दखल देकर बदला। नतीजतन, शिक्षा-ऋण की संख्या में बढ़ोतरी हो गई, ऋण का औसत आकार भी बढ़ा और ऋण की कुल राशि भी साल-दर-साल बढ़ती गई। बैंकों से कहा गया कि वे अपनी शाखाओं को शिक्षा-ऋण मंजूर करने का अधिकार दें, और संपत्ति के कागजात के रूप में जमानत तभी मांगें जब ऋण की राशि साढ़े सात लाख रुपए से अधिक हो। सेवा-हलके की अवधारणा समाप्त कर दी गई। फिर, धीमी मगर निरंतर प्रगति दर्ज की गई। वर्ष 2007-08 और 2013-14 के दरम्यान औसत वृद्धि दर बीस फीसद रही।
सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में बदलाव
औसत आकार के शिक्षा-ऋण की संख्या में हुई बढ़ोतरी से कहीं ज्यादा नाटकीय बदलाव विद्यार्थियों (आवेदकों) की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि की बाबत हुआ। ऐसे हजारों विद्यार्थियों को ऋण मिले, जिनके परिवार से पहले किसी ने कॉलेज का मुंह नहीं देखा था। बैंकों ने समारोह आयोजित किए और इन अवसरों पर छोटे किसानों, कृषि मजदूरों, चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों, दिहाड़ी मजदूरों, पटरी दुकानदारों आदि को शिक्षा ऋण दिए गए। ऋण पाने वाले बहुतेरे आवेदक अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखते थे। इनमें से एक प्रसंग आज भी मेरी स्मृति में अंकित है- घूम-घूम कर और ढोल बजा-बजा कर सगुन बताने वाला एक व्यक्ति बड़े गर्व से यह बताता फिरता था कि उसके बेटे को इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए शिक्षा-ऋण मंजूर हुआ हैे!
जब 31 मार्च, 2014 को यूपीए सत्ता से विदा हुआ, बकाया शिक्षा-ऋणों की संख्या 7,66,314 थी, और बकाया राशि थी 58,551 करोड़ रुपए। इस सिलसिले में शिक्षा-ऋण की वह तादाद भी जोड़ी जानी चाहिए जो यूपीए के दस साल की अवधि में बांटे गए और जो चुकता हो गए थे। इस कार्यक्रम ने लाखों परिवारों के सपनों को पंख लगा दिए।
अफसोस, लगता है राजग सरकार के तहत वह अध्याय बंद होने जा रहा है। (देखें तालिका) जहां भी मैं जाता हूं, यही सुनने में आता है कि शिक्षा-ऋण नहीं मिल रहा है। पिछले सालों में इसकी वृद्धि दर महज 5.3 फीसद रही। जब ऐसा कोई कार्यक्रम समेटा जाने लगता है तो इसका सबसे ज्यादा खमियाजा गरीबों को भुगतना पड़ता है, जिनके पास कोई पहुंच या सिफारिश नहीं होती। लगता है यह संदेश दिया जा रहा है कि शिक्षा-ऋण अब कोई प्राथमिकता नहीं है। इसकी साफ वजह यह है कि शिक्षा-ऋण का एनपीए-स्तर अधिक है। लेकिन जो नियंता हैं वे इस तर्क को सुनना नहीं चाहते कि पढ़ाई कर चुकने के बाद भी आवेदक ऋण चुका पाने में असमर्थ हैं, क्योंकि रोजगार-विहीन विकास के इस दौर में उन्हें कहीं काम नहीं मिल रहा है।
एक बार जब बैंकों को संदेश मिल गया, तो वे बर्बर साहूकारों की तरह देनदारों के पीछे पड़ गए- वसूली एजेंट (पढ़िए गुंडे) भेजना, ऋण मंजूरी की शर्तों को लागू करना, जमानत के कागजात भुनाना, मुकदमा दायर करना, आदि।

31-3-2014 31-3-2015 31-3-2016 31-12-2016
शिक्षा ऋणों की संख्या 7,66,314 6,68,889 5,98,187
बकाया रकम 58,551 61,259 68,613
एनपीए के रूप में 3,389 3,670 4,763 6,336

राशि करोड़ रु. में। स्रोत: संसद में प्रश्नोत्तर

सिर्फ धनिकों की फिक्र
मेरे रोष का यही प्रत्यक्ष कारण है। मान लें कि शिक्षा-ऋण के सारे एनपीए खाते नुकसान के खाते में बदल जाएं, तो 31 दिसंबर 2016 तक कुल नुकसान होगा 6,336 करोड़ रु.। इस आंकड़े की तुलना बारह कॉरपोरेट घरानों की उस राशि से करें जो दिवालिया संहिता के तहत दांव पर लगी है; यह राशि है 2,50,000 करोड़ रुपए, जिसका साठ फीसद से अधिक हिस्सा एनपीए है! जब ये बारह मामले दिवालिया संहिता की प्रक्रिया से गुजरेंगे, तो हल निकालने का जो भी तरीका अपनाए जाए, अनुमान है कि बैंकों को कुल राशि के कम से कम तीस से पचास फीसद का नुकसान उठाना पड़ेगा।
ये बारह घराने बैंकों को 75,000 करोड़ रु. से लेकर 1,25,000 करोड़ रु. तक का नुकसान पहुंचाएंगे। इसे ‘वित्तीय समाधान’ कहा जाएगा। ये घराने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी खो बैठेंगे, पर उन्हें बैंकों से कर्ज मिलना फिर शुरू हो जाएगा। जबकि हजारों परिवारों पर बकाया शिक्षा-ऋण से बैंकों को 6,336 करोड़ रु. का नुकसान होगा (या, इसे अधिक से अधिक 10,000 करोड़ रु. तक खींच सकते हैं)। ऐसे ऋणों के लिए समाधान की कोई योजना नहीं है; बल्कि इसे ‘वित्तीय विपदा’ कहा जाएगा और सारे शिक्षा-ऋण रोक दिए जाएंगे। क्या आप विकास-सह-कल्याणकारी राज्य का असली चेहरा देख पा रहे हैं?

 

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