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पी चिदंबरम का लेख, दूसरी नजर- जन कल्याण की कसौटी पर

नोटबंदी के एक साल बाद, उस फैसले का औचित्य ठहराने वाला हरेक तर्क खारिज हो गया है और उसका मखौल उड़ा है।
Author November 12, 2017 06:29 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

शब्दांडबर, झांसापट्टी और शेखी की अपनी सीमाएं होती हैं। एक वक्त आता है जब उनसे फायदा मिलना बंद होने लगता है और सच्चाई सामने होती है।
नोटबंदी के एक साल बाद, उस फैसले का औचित्य ठहराने वाला हरेक तर्क खारिज हो गया है और उसका मखौल उड़ा है। नोटबंदी का औचित्य बताने वाले उस तर्क की चर्चा से अपनी बात शुरू करता हूं, जो तर्क एकदम सीधा-सा और खींचने वाला लगता था: जाली मुद्रा का खात्मा।
क्या अब जाली नोट नहीं हैं
एक साल बाद हमें बताया गया है कि 15,28,000 करोड़ (विमुद्रीकृत किए गए नोटों का कुल मूल्य) जो कि रिजर्व बैंक के पास लौट आए, उनमें से केवल 41 करोड़ मूल्य के नोट जाली थे! यह विमुद्रीकृत नोटों के कुल मूल्य का सिर्फ 0.0027 फीसद था। इससे पहले कि इस नगण्य राशि पर आप हैरानी जताएं, यह भी पढ़ें: ‘‘जाली नोटों की शक्ल में हाल में सुधार हुआ है, पहले वे आसानी से पहचान में आ जाते थे, अब वे ऊंची गुणवत्ता के होते हैं।’ यह कहना है उन अफसरों का, जो जाली भारतीय मुद्रा का पता लगाते हैं।
इस साल अगस्त से अक्तूबर के बीच, राजस्व खुफिया निदेशालय ने तीन अलग-अलग मामलों में मुंबई, पुणे और बेंगलुरु से (दो हजार और पांच सौ के नए नोटों में) ऊंची गुणवत्ता वाले जाली नोट बरामद किए, जिनका कुल अंकित मूल्य पैंतीस लाख था। इसी महकमे के अफसरों ने आठ नवंबर को चार लाख मूल्य के बराबर जाली नोट मुंबई से बरामद किए। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने राजस्व खुफिया निदेशालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का यह कथन उद्धृत किया: ‘नोटबंदी के फौरन बाद जो जाली नोट पकड़े गए वे निम्न गुणवत्ता के थे और नंगी आख से पहचाने जा सकते थे, मगर हाल में बरामद किए गए नोटों की गुणवत्ता बेहतर है और कोई आम व्यक्ति तुरंत भांप नहीं सकता कि ये नोट असली हैं या नकली।’
जो लोग भारत में जाली नोटों से निपटने की चुनौती से वाकिफ हैं उनके लिए यह कोई हैरत की बात नहीं है। अगर एक आदमी नोट छापने की तकनीक ईजाद कर सकता है, तो कुछ समय बाद, एक दूसरा आदमी उन नोटों की नकल करने की तकनीक भी निकाल सकता है। लिहाजा, नोटबंदी नकली नोटों का जवाब नहीं थी। अगर ऐसा होता, तो क्या कारण है कि पिछले पचास वर्षों में दुनिया की किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था ने नोटबंदी या विमुद्रीकरण नहीं किया। यह सीधा-सा सबक नवंबर 2016 में भारत सरकार ने भुला दिया था।

भ्रष्टाचार और काला धन
यही बात दो अन्य लक्ष्यों की बाबत भी कही जा सकती है जिनकी घोषणा आठ नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री ने की थी: भ्रष्टाचार का खात्मा और काले धन का उन्मूलन। नोटबंदी के बावजूद भ्रष्टाचार फला-फूला है। घूस देने वाले और घूस लेने वाले बराबर पकड़े जा रहे हैं, अकसर रंगे हाथों। लोकसेवकों की गिरफ्तारियां हुई हैं और उनके खिलाफ न्यायिक कार्यवाही भी शुरू हुई है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि नोटबंदी से निचले स्तर का भ्रष्टाचार- जो इतना व्यापक है कि नागरिक और सरकार के संबंधों में ‘सामान्य’ तत्त्व माना जाता है- खत्म हो गया हो या उस पर रोक लगी हो।
जहां तक काले धन का सवाल है, कर-योग्य आय रोजाना पैदा होती है, उस आय का एक हिस्सा ऐसा होता है जिस पर टैक्स नहीं चुकाया जाता और भिन्न-भिन्न मकसद से उसका इस्तेमाल होता है- जैसे रिश्वत देने, चुनावी चंदा देने, जुआ खेलने, दिहाड़ी मजदूर लगाने आदि में। थोक व्यापार, निर्माण और सर्राफा जैसे सेक्टरों में बेहिसाबी धन का इस्तेमाल लगातार जारी है। कहना न होगा कि बेहिसाबी धन से ही वेश्यावृत्ति, मादक पदार्थों की तस्करी, छोटे पैमाने पर हथियार बनाने और सोने की तस्करी जैसे अवैध धंधे चलते हैं।
विमुद्रीकरण जाली मुद्रा से निपटने या भ्रष्टाचार या काले धन से लड़ने का हथियार नहीं था। फिर भी, सरकार उस हथियार को भांजने में लग गई। यह बिना सोचा-विचारा और उतावली में लिया गया निर्णय था, जो भारी गलती साबित हुआ, इस लिहाज से कि इसने आर्थिक वृद्धि को काफी नुकसान पहुंचाया और करोड़ों साधारण लोगों पर कहर ढाया।

नैतिक सवाल
जले पर नमक छिड़कते हुए, वित्तमंत्री ने दावा किया है कि विमुद्रीकरण एक सैद्धांतिक और नैतिक निर्णय था। मैं इस बहस में शरीक होने को तैयार हूं और कुछ सवालों के जवाब चाहता हूं:
1. क्या करोड़ों लोगों पर, खासकर 15 करोड़ दिहाड़ी मजदूरों पर मुसीबत ढाना एक नैतिक कदम था? यह संख्या देश की कामकाजी आबादी का एक तिहाई है और इसमें कृषि मजदूर, कारीगर, पटरी-दुकानदार और दिहाड़ी मजदूर आते हैं। हफ्तों तक उनकी मजदूरी (या आमदनी) मारी जाती रही, वे कर्ज लेने को मजबूर हुए, और उनमें से बहुत-से लोग गले तक कर्ज में डूबे हैं।
2. क्या जनवरी से अप्रैल 2017 के दरम्यान 15,40,000 नियमित रोजगारों को नष्ट करना एक नैतिक कदम था? सीएमआइई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के द्वारा जारी ताजा आंकड़े बताते हैं कि अन्य 4,20,000 लोग मई से अगस्त, 2017 के दौरान रोजगार से हाथ धो बैठे। उस समय रोजगार गंवाने वालों में से बहुत सारे लोग अब भी बेरोजगार हैं (अगर रोजगार-विहीन लोग चमत्कारिक ढंग से रोजगार-निर्माता के रूप में न बदल गए हों, जैसा कि पीयूष गोयल ने दावा किया है)।
3. क्या हजारों सूक्ष्म व छोटे व्यवसायों को बंद होने के लिए विवश करना एक नैतिक कदम था? यह अब कोई अनुमान पर आधारित निष्कर्ष नहीं है। यह तथ्य है। नोटबंदी का एक साल पूरा होने पर बंद हुए व्यवसायों की कहानियां अखबारों ने विस्तार से छापी हैं। उदाहरण के लिए: तिरुप्पुर ओल्ड बस स्टैंड के पास ऐसी पंद्रह सौ इकाइयां थीं जो बड़े व्यवसायियों के लिए सहायक इकाइयों के तौर पर काम करती थीं; आज उनमें से पांच सौ से भी कम नियमित रूप से काम कर रही हैं; अन्य इकाइयां या तो बंद हो गई हैं या कई महीनों से काम (आॅर्डर) मिलने का इंतजार कर रही हैं। आगरा, जलंधर, सूरत, भिवंडी और कई दूसरे औद्योगिक शहरों से भी ऐसी ही सच्ची कहानियां सामने आई हैं।
4. क्या काले धन को सफेद करने का आसान रास्ता मुहैया कराना, जैसा कि अब खुद सरकार के खुलासे से जाहिर है, एक नैतिक कदम था? सरकार ने कबूल किया है कि विमुद्रीकरण और नोटों की अदला-बदली ने वास्तव में काले धन को सफेद करने में मदद की। सरकार ने ऐसा करने वालों का पता लगाने और उन्हें दंडित करने का वादा किया है, जो कि कहना आसान है करना कठिन। आय कर विभाग एक साल में कितने सारे मामलों की जांच और निपटारा कर सकता है? आय कर अपीलीय न्यायाधिकरण अगस्त, 2017 तक लंबित 94,000 मामलों का निपटारा कब करेगा? लिहाजा, यह कड़वी हकीकत पिंड नहीं छोड़ने वाली कि काला धन सफेद करने वालों को एक आसान रास्ता मिल गया और उनमें से बहुतेरे शायद ही कभी पकड़े जा सकेंगे।
मुझे ‘कुरल’ का 551वां पद याद आता है, जिसमें अपनी जनता का अहित करने वाले राजा का वर्णन है। एक लोकतंत्र में किसी भी निर्वाचित सरकार को लोगों को असह्य मुश्किलों और मुसीबतों में झोंकने का कोई हक नहीं है।

 

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