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दूसरी नजर: सत्तर साल पर अर्थव्यवस्था की हालत-2

यह आर्थिक सर्वे, खंड 2 और 2 अगस्त को आए रिजर्व बैंक के मौद्रिक नीति वक्तव्य के रूप में है। अर्थव्यवस्था की सेहत जांचने के लिए पिछले हफ्ते मेरे डैशबोर्ड पर पांच पैमाने थे।
Author August 20, 2017 05:49 am
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( photo source- PTI)

मुझे खुशी है कि भारत की आजादी के सत्तर साल पूरे होने पर देश की दशा के बारे में, खासकर इसकी अर्थव्यवस्था के बारे में काफी तर्कपूर्ण लेख पढ़ने को मिले। गांवों तथा कस्बों के लोगों से अपनी बातचीत में मैंने पाया कि कीमतों, रोजगार और इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर लोगों में दिलचस्पी बढ़ रही है। राजनीतिक रैलियों में मैंने देखा कि लोग सारहीन राजनीतिक भाषणों, दूसरी पार्टी की खिंचाई या आरोपबाजी पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। वे उन भाषणों को उत्सुकता से सुनते हैं जिनमें अधूरे चुनावी वायदों, कृषि उपज की कीमत, र्इंधन और परिवहन, रोजगार, ढांचागत सुविधा की कमी, शिक्षा ऋण आदि मुद््दों पर फोकस किया जाता है। लिहाजा, मैंने इस हफ्ते भी ‘अर्थव्यवस्था’ की हालत पर ही लिखना तय किया।
देश की अर्थव्यवस्था की वर्तमान दशा पर प्रचुर, आधिकारिक सामग्री उपलब्ध है। यह आर्थिक सर्वे, खंड 2 और 2 अगस्त को आए रिजर्व बैंक के मौद्रिक नीति वक्तव्य के रूप में है।
अर्थव्यवस्था की सेहत जांचने के लिए पिछले हफ्ते मेरे डैशबोर्ड पर पांच पैमाने थे।

रोजगारविहीन और सुस्त वृद्धि
पहला पैमाना था रोजगार। आर्थिक सर्वे में रोजगार पर कोई अलग खंड नहीं है, केवल दो पेज का एक लेख है ‘रोजगार और कौशल विकास’ पर। आर्थिक सर्वे ने सृजित किए गए रोजगार की बाबत कोई आंकड़ा नहीं दिया है, इस दावे को छोड़ कर, कि कौशल-प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों में 4,27,470 लोगों को रोजगार मिला। फिर, इस बारे में भी कुछ नहीं कहा गया है कि 2017-2019 के दौरान कितना रोजगार सृजित होने की संभावना है। सबसे चुनौतीपूर्ण मुद््दे पर खामोशी एक हकीकत को बयान करती है: भारत अपेक्षया धीमे और रोजगारविहीन विकास के दौर में है…
दूसरा पैमाना था जीडीपी की वृद्धि दर का। आर्थिक सर्वे में स्वीकार किया गया है कि जीडीपी की वृद्धि दर 2015-16 के 8 फीसद से गिर कर 2016-17 में 7.1 फीसद पर आ गई। इसमें यह भी स्वीकार किया गया है कि 2016-17 की पहली छमाही में वृद्धि दर 7.7 फीसद थी, जो कि दूसरी छमाही में 6.5 फीसद हो गई। यानी वृद्धि दर 8 फीसद से गिर कर 6.5 फीसद पर आ गई- ठीक वही हुआ, नोटबंदी के फलस्वरूप जिसका अंदेशा मैंने जाहिर किया था। कुल मूल्य वर्धन (जीवीए) के आंकड़े सबसे चिंताजनक हैं: 2016-17 की चौथी तिमाही में यह 5.6 फीसद था। आगे चल कर आर्थिक सर्वे आगाह करता है कि मौजूदा वृद्धि दर (पढ़िए 6.5 फीसद) को बनाए रखने के लिए वृद्धि की सामान्य चालक शक्तियों, जैसे (निजी) निवेश और निर्यात, की बाबत और कदम उठाने होंगे तथा ऋण वृद्धि के लिए बही-खाता दुरुस्त करना होगा।

गिरावट के ग्राफ
तीसरा पैमाना था, निवेश। दो चौंकाने वाले ग्राफ (47 और 48) में आर्थिक सर्वे ने कुल निश्चित पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) की निराशाजनक तस्वीर पेश की है। सरकारी जीएफसीएफ में 2015-16 की दूसरी तिमाही से ही गिरावट का रुख रहा है। उसी समय से निजी क्षेत्र के जीएफसीएफ में भी गिरावट चली आ रही है। 2015-16 की चौथी तिमाही में तो यह नकारात्मक हो गया और पूरे 2016-17 में वैसा ही बना रहा। आगे के बारे में पूर्वानुमान और भी बुरा है: ‘उपलब्ध बजट-सूचना के अनुसार, जीडीपी के अनुपात में सरकारी निवेश व्यय 2017-18 में कम होने की संभावना है।’

चौथा पैमाना था, ऋण वृद्धि का। मुझे आर्थिक सर्वे को उद्धृत करने के सिवाय कुछ कहने की जरूरत नहीं है: ‘‘2003-08 के दौरान दर्ज हुई ऊंची आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ ऋण वृद्धि भी जोरदार रही थी, जो कि साल-दर-साल बीस फीसद की दर से बढ़ती रही। वैश्विक वित्तीय संकट से बुरी तरह प्रभावित होने और 2008-10 की अवधि में दिए गए वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज के बाद, ऋण वृद्धि फरवरी 2014 तक 15 फीसद के आसपास बनी रही। उसके बाद यह धीमी हो गई है। 2016-17 के दौरान, कुल बैंक ऋण बकाया लगभग सात फीसद की औसत गति से बढ़ा। ताजातरीन आंकड़ा मई 2017 का है, 4.1 फीसद।’’ गैर-खाद्य ऋण कुल मिलाकर, और साथ ही, कृषि, उद्योग, सेवाओं और व्यक्तिगत जरूरतों के लिए लिये जाने वाले ऋणों में सितंबर 2016 से गिरावट का रुख रहा है। इसका सबसे बुरा असर औद्योगिक क्षेत्र पर पड़ा है, जहां ऋण वृद्धि सितंबर 2016 से नकारात्मक रही है। उद्योगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ऋण तो मार्च 2016 से ही नकारात्मक हैं; केवल निजी बैंकों से उद्योगों को कुछ ऋण मिल पा रहा है।

पांचवां पैमाना था, औद्योगिक उत्पादन। आर्थिक सर्वे के मुताबिक ‘‘औद्योगिक क्षेत्र का प्रदर्शन 2015-16 के 8.8 फीसद से गिर कर 2016-17 में 5.6 फीसद पर आ गया।’’ औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) के आंकड़े उलझन में डालने वाले हैं। पुरानी सिरीज को देखें (आधार वर्ष 2004-05), तो आइआइपी की वृद्धि दर में ‘सुधार’ हुआ, 2016-17 की पहली तिमाही में यह 0.7 फीसद थी और चौथी तिमाही में 1.9 फीसद हो गई। लेकिन नई सिरीज (आधार वर्ष 2011-12) के तहत वद्धि दर 2016-17 की पहली तिमाही के 7.8 फीसद से गिर कर चौथी तिमाही में 2.9 फीसद पर आ गई! नई सिरीज के आंकड़े हालांकि गिरावट का रुख लिये हुए हैं, पर वे पुरानी सिरीज के आंकड़ों से बेहतर हैं! नई सिरीज के आंकड़े एक सुहानी तस्वीर पेश करते हैं जिस पर भरोसा करना किसी के लिए भी जोखिम भरा होगा।

अच्छे दिन नहीं, अब ‘न्यू इंडिया’
रिजर्व बैंक के मौद्रिक नीति वक्तव्य ने कई निष्कर्षों की पुष्टि की है। रिजर्व बैंक के मुताबिक, कारोबारी माहौल बताता है कि 2017-18 की दूसरी तिमाही में सामान्य गतिविधि रहेगी (पढ़िए, पहले से धीमी वृद्धि दर)। औद्योगिक क्षेत्र का प्रदर्शन कमजोर हुआ है और टिकाऊ उपभोक्ता सामान तथा पूंजीगत सामान के उत्पादन में कमी आई है (पढ़िए, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट)। नए निवेश की घोषणाओं की तादाद 2016-17 की पहली तिमाही में बारह साल में सबसे कम रही; और बैंकों तथा कंपनियों के बही-खातों पर भारी दबाव को देखते हुए नए निवेश की उम्मीदें धुंधली पड़ चुकी हैं, और राज्य पूंजीगत व्यय में कटौती कर सकते हैं (पढ़िए, सुस्त निवेश)। रिजर्व बैंक का वक्तव्य रोजगार तथा वृद्धि दर के मुद््दों पर खामोश है। जैसा कि मैंने अंदेशा जताया था, हम आजादी की सत्तरवीं सालगिरह बिना खुशी के मना रहे हैं। सरकार को डैशबोर्ड की तरफ देखते हुए डर लगता है। ऐसा लगता है कि उसने 2019 तक अच्छे दिन आने की आस छोड़ दी है, और 2022 में ‘न्यू इंडिया’ के शब्दाडंबर को चमकाने में जुट गई है!

 

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